Thursday, November 20, 2025

Kache man bairaag tyaagकाचे मन बैराग त्याग_ हरजस पद राग मिश्रीत (१४) काचे मन बैराग त्याग, भोले मत किज्यो। घर माया के बीच, मन पचणे ऊर दिजो ।। टेर ।। ज्यूं फल बेली संग, बाल माई संग जोय। तरवर दोली बाड, पाये सेवा हुये मोय ।। १ ।। वैसा हुय तब त्यागियो, पांच न बोले काय। बास चले सुखराम कह, परमल दिशु दिश जाय ।। २ ।। Harjas Pad Raag Mishrit (14) Kache man bairaag tyaag, bhole mat kijyo. Ghar maaya ke beech, man pachhne oor dijo. ॥ Ter ॥ Jyun phal beli sang, baal maai sang joy. Tarvar doli baad, paaye seva huye moy. ॥ 1 ॥ Vaisa huy tab tyaagiyo, paanch na bole kaay. Baas chale Sukhram kah, paramal dishu dish jaay. ॥ 2 ॥ महाराज फरमाते हैं:जब तक सच्चा वैराग्य उत्पन्न न हो, तब तक घर (गृहस्थ) का त्याग नहीं करना चाहिए।गृहस्थ में रहते हुए, गृहस्थ के सुख-दुख का अनुभव करना, यही माया के साथ पचना (मिश्रित हो जाना) है।जैसे बेल का फल बेल में ही लगा रहता है, वैसे ही बालक अपनी माता के साथ रहता है — दोनों का अलगाव सहज नहीं होता।जैसे वृक्ष के चारों ओर बाड़ लगी हो, तो उसकी रक्षा होती रहती है — उसी प्रकार गृहस्थ में रहते हुए मर्यादा और संयम से रहना, आत्मा की रक्षा करता है।जब पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने भोग नहीं मांगतीं, तब ही गृह का त्याग करना चाहिए। यानी इन्द्रियों का वश में आना ही संन्यास के लिए पात्रता है।ऐसे संतों की महिमा चारों ओर होती है, जिन्होंने संयमपूर्वक और सच्चे वैराग्य से गृह का त्याग किया है। तब तक सच्चा बैराग उत्पन्न न हो जब तक घर का त्याग नहीं करना चाहिये। गृहस्थ में रहते हुये गृहस्थ के सुख दुख का अनुभव करना ही माया के साथ पचना है। जैसे बेल के फल लगा हुवा रहता है। ऐसे ही बालक माता के साथ रहता है। जैसे वृक्ष के चारो तरफ बाड लगी हो तो उसकी रक्षा होती रहती है। जब पांचो ईन्द्रिया अपना भोग नहीं मांगती हो तब ही घर का त्याग करना चाहिये। उन्ही संतो की महिमा चारो तरफ होती है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...