Sunday, May 31, 2026

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)



 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।
 म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥
 आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। 
म्हारे आंगणिये ओ साधां रो समाज, संया आवो ओ ॥ १ ॥
 कथा ओ प्रसंग हिलमिल, हरिगुण गास्यां । 
म्हारे मेहेर करी है महाराज, संया आवो भे ॥ २ ॥
 किणीयक सुकरत संया, सतगुरुजी मिलिया। 
कोई किणी ओ मानव तन साज, संया आवो ओ ॥ ३ ॥ 
 ओ मानव तन संया, ब्रह्मादिक बंछे।
 कोई राम शिंवर किज्यो काज, संया आवो ओ ॥ ४ ॥ 
 सोना रो सूरज म्हारे, इण पुल ऊगो।
 म्हारे घर बैठा गंगा आई आज, संया आवो ओ ॥ ५ ॥ 
 लख चौरासी संया, दुखडा री फांसी। 
कोई हुवो ओ बहोत अकाज, संया आवो जे ॥ ६ ॥ 
 इण भवसागर म्हारा, सतगुरु जी तारे। 
कोई आपरा बिडद की है लाज, संया आवो भे ॥ ७ ॥ 
 सुखदेव सुख में म्हारो, मनवो जी झूले। 
म्हारे साथ सदाई शिरताज, संया आवो ॥ ८ ॥

 संतों का आगमन — आत्मा का उत्सव
 महाराज सब सहेलियों से फरमाते हैं: "आज मेरे सतगुरु परमगुरु मेरे घर पधारे हैं। मेरे परमात्मा के जन मेरे द्वार आए हैं — तुम सब आओ, आकर आनंद और बधावा गाओ।आज मेरे घर संतों का समाज आया है — तुम सब आओ। संतों के पधारने से कथा-प्रसंग होगा, हिलमिलकर परमात्मा का गुणानुवाद गाएँगे।मेरे ऊपर पूर्ण कृपा करके मेरे घर पधारे हैं — तुम सब आओ।मनुष्य जन्म बड़े पुण्य के फल से मिलता है। इस मनुष्य जीवन की इच्छा ब्रह्मा, विष्णु, महादेव भी करते हैं। रामजी की भक्ति करके अपना कार्य, अर्थात परमात्मा की प्राप्ति, कर लो।सतगुरु कृपा करके मेरे घर पधारे हैं — यही सोने का सूरज इस फूल के बाग़ में उगा है, और यही घर बैठे गंगा आने जैसा है। तुम सब आओ।चौरासी लाख योनियों का दुख भोगना ही दुखड़ा री फांसी है — बहुत भारी अकाज (अंधकार/कष्ट) हो गया है — तुम सब आओ।इस भवसागर, अर्थात चौरासी से मेरे सतगुरु ही तारेंगे — वे अपनी बिडद की लाज (मर्यादा/प्रतिज्ञा) रखकर चौरासी का दुख मिटाएँगे — तुम सब आओ।महाराज फरमाते हैं: "संतों की कृपा से मेरा मन चौबीसों घंटे सुख और आनंद का अनुभव करता है — यही मन का झूलना है। संत मेरे सदैव शिर के ताज हैं।"

Tuesday, March 31, 2026

Mhaara Guraanji re desh म्हारा गुरांजी रे देश_ हरजस पद राग बधावा (३)



 म्हारा गुरांजी रे देश, चालो ओ संईयां म्हारी।
 म्हारा सुखां रां सागर, म्हारा जीवां रा तारण, सायब वहां बसे थे ॥ टेर ॥
 दूरा सा देश गुरांजी रा छाना, बेद कतेब न जाने कुराणा।
 शिव सनकादिक शेष पुकारे, हां अ तूं तो पूरा गुरु शिर धारी जे ॥ १ ॥ 
 पिव पिव करती या बिरेहन जागी, पांच सखी मिल शिवरण लागी।
 प्रेम बधावा मन घर बाज्या, हां से या तो प्रीतज आंण पुकारी जे ॥२॥ 
 म्हारा हिरदा में झिलमिल शब्द ऊजाला, गुरां म्हारा जोई है दीपक माला। 
 जठे गोऊं सूं तार पोऊं सूं मोतीडा, हां ओ म्हारा हिवडा में हार हजारी ओ ।॥ ३ ॥
 आत्म बीण नाभ घर बागी, संखरी घोर गिगन जाय लागी। 
 अनहद झालर भंवर गुंजारा, हां अ आ तो मुरली री टेर निहारी ओ ॥ ४ ॥ 
 शील सिणगार सजे सन्त सूरा, उलट पिछम दिश बाजे है तूरा। 
 नांव तेज मुख बरसे है नूरा, हो ओ उण सूरत री बलिहारी जे ॥ ५ ॥
 त्रिकुटी तखत पर नोपत बाजे, सब देव तरसे है दरशण काजे। 
 जय जय बांणी बरसे है हीरा, हां से वारां चरण बंधे पुर सारी थे ॥ ६ ॥ 
 अनन्त भाण अविन्यासी री शोभा, सूरत निरत संईयां चाली है जोबा। 
 अला पिंगला सुखमण नारी, हां ये वारो रूप निहारत हारी थे ॥ ७ ॥ 
 अगम देश जहां अविचल थाना, अनन्त कोटि संत धरे है ध्याना। 
 लील बिलास आनन्द सुख नाना, हां अ वा तो सरब सवागण नारी थे ॥ ८॥ 
 अविन्यासी बर आपा ही बरस्यां, अपना गुरांजी री सेवा करस्यां।
 कह सुखराम बीरम गुरुदाता, हां अ मैं तो बेह जाती भवजल तारी जे ॥ ९॥ 

 आत्मा की पुकार 
सतगुरु के देश चलो, आत्मा इन्द्रियों रूपी सहेलियों से कहती है: “मेरे सतगुरु के देश चलो — उस पद में सुखों का सागर है, और वहाँ जीवों के तारणहार परमात्मा का अनुभव होता है।”सतगुरु का देश बहुत दूर है। उस पद की प्राप्ति वेदों या कुरानों के ज्ञान से नहीं होती। शिव, सनकादिक, शेषजी तक उस निज नाम की भक्ति करते हैं — इसलिए तुम भी पूर्ण परमानंद की प्राप्ति का साधन करो।पाँच विषयों को वश में करके, विरह प्रेम से भजन करना ही “पिव पिव” करके विरहन का पुकारना है।जब सारे हृदय और सारे शरीर में शब्द का अनुभव होता है, तो यही हृदय में झिलमिल होना और दीपक माला का जोड़ना है।जहाँ सूरत जाती है, वहाँ ही शब्द का अनुभव होना — यही है: "जठे गऊँ सूँ तार, पोऊँ सूँ मोतीड़ा"।जब हृदय में भीतर से भारी खुशी उठती है, तो यही होता है — "हिवड़ा में हार-हजारी"।जब शब्द नाभी में आता है और ब्रह्मांड तक सारे शरीर में अनुभव होता है, तो यही है — आत्म वीणा का नाभ-घर में बजना।यही संखरी घोर, गगन घर में लगना, अनहद झालर, भंवरों का गुंजार और मुरली की टेर सुनना है।शील-व्रत धारण करके, भजन करते हुए, पश्चिम दिशा में उलटकर शब्द का अनुभव होना — यही है तूर का बाजना।जब शब्द हर समय अनुभव हो, तो नाम तेज बनकर मुख पर नूर बरसता है। ऐसे महापुरुषों की बलिहारी है।त्रिकुटी तख्त, अर्थात ब्रह्मांड, पारब्रह्म से ऊपर केवल पद में जब शब्द का अनुभव होता है, तो यही नोपत का बजना है। देवता तक उस पद की प्राप्ति के लिए तरसते हैं।जब सारे शरीर में सतशब्द का केवल पद में अनुभव होता है — तो यही जय-जय वाणी है, यही हीरों की वर्षा है।सारे शरीर में ध्यान होना — यही है चरण बांधना।अविनाशी पद की शोभा अनंत सूर्यों के प्रकाश के समान है। सूरत-निरत के द्वारा उसका अंतर में अनुभव हो रहा है।अला, पिंगला, सुषुम्ना में जब भजन होता है, और इनसे अलग होकर पूर्ण परमानंद में लय होना — तो वही है उस पद को निहारना।केवल पद, आनंद पद ही अविचल थान है। अनंत संतों ने उस पद की प्राप्ति की है। पूर्ण आनंद का अनुभव होना ही गुरु की सेवा करना है और अविनाशी वर को वरना है।महाराज फरमाते हैं: “बीरमदासजी, सतगुरु की कृपा से ही मुझे उस पद की प्राप्ति हुई — नहीं तो मैं भी संसार की धारा में बह जाता।”

Monday, March 30, 2026

Aaj bhalai din oogiyo आज भलाई दिन ऊगीयो_ हरजस पद राग बधावा Harjas Pad Raag Badhawa (४)



आज भलाई दिन ऊगीयो, म्हारा सतगुरु मिलिया आय हो महाराज ॥ टेर ॥
 आंणद ऊछाव बधावणा, सामा मिलसां जाय महाराज। 
 केसर लूंग इलायची, बहोत चडाऊं जाय महाराज ॥ १ ॥ 
 ढोल बजावत गावता, लेसां बधाय बधाय महाराज।
 प्रदिक्षणा प्रणाम सूं, लुललुल लागू पांय महाराज ॥ २ ॥ 
 अगर चन्दन सो कुम कुमा, मिंदर ढुलाऊंली आय महाराज। 
फूल मंगाऊली जाफना, सेज बिछाऊंली आय महाराज ॥ ३ ॥ 
 भोजन बोहो प्रकार का, लेसूं इधक बणाय महाराज। 
 सतगुरु जीमें आंगणे, पंखा ढुलाऊं बाव महाराज ॥ ४॥ 
 ज्ञान कथे बांणी करे, करसी अरथ अनेक महाराज।
 कह सुखदेवजी भरम भानसी, नाना विध का जाण महाराज ॥ ५ ॥

आज का दिन श्रेष्ठ है — सतगुरु दर्शन का उत्सव आज श्रेष्ठ दिन उगा है, क्योंकि सतगुरु के दर्शन हुए हैं।आनन्द और उल्लास के साथ हम उनके सामने जाकर दर्शन करेंगे। केसर, लूंग, और ईलायची ले जाकर हम उन्हें भेंट करेंगे।ढोल बजाते, गाते, उन्हें बधाकर और उत्सवपूर्वक हम अपने घर लेकर आएंगे।प्रदक्षिणा करके, प्रणाम करके, हम उनके चरणों में गिरेंगे।अगर, चन्दन, और कुमकुम से हम मकान को सजाएँगे, सुगंधित फूल मंगवाकर उनकी सेज बिछाएँगे।अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन बनाकर उन्हें मेरे घर में भोजन कराएँगे, और पंखा ढुलाएँगे।वे ज्ञान की कथा कहेंगे, बाणी का उपदेश देंगे, और वाणी के निरपक्ष निरणे की महिमा समझाएँगे।वे अनेक प्रकार से हमारे भरमों (भ्रमों) को मिटाएँगे।महाराज फरमाते हैं: "सतगुरु इसी तरह अपने अणभै ज्ञान से हमारे अज्ञान, भरम और कष्टों का नाश करते हैं।"

Today is the Supreme Day — The Celebration of Satguru’s Darshan

Today a magnificent day has dawned, for we have been blessed with the darshan  of the Satguru. With hearts full of joy and enthusiasm, we shall go before him to seek his sight. Carrying offerings of saffron, cloves, and cardamom, we shall present them to him in reverence.

To the beating of drums and the singing of hymns, we will welcome him and bring him to our home with great festivity. Performing circumambulation (Pradakshina) and bowing low, we will surrender ourselves at his holy feet.

We shall decorate our home with Agar (aloeswood), sandalwood, and Kumkum (vermillion), and arrange a bed of fragrant flowers for him. Preparing a variety of delicious sanctified foods, we will serve him in our home and fan him with devotion.

He will narrate the discourses of wisdom, impart the teachings of the holy Baani (sacred word), and explain the glory of the impartial discernment of Truth. In countless ways, he will dispel our doubts and delusions.

Maharaj declares: > "In this very way, the Satguru destroys our ignorance, delusions, and sufferings through his Anbhai (experiential and fearless) divine knowledge."


Sunday, March 29, 2026

Dhin dhin ho dhin param dhaam धिन धिन हो धिन परम धाम_ हरजस पद राग बसन्त Harjas Pad Raag Basant (१३)



धिन धिन हो धिन परम धाम, जांसे किशन देव चल आवे राम ।। टेर ॥ 
 सरब शिष्ट की बाय मूल है, पांच तत की शून्य चूल।
 शून्य मूल से ब्रह्म होय, ताय शीश नहीं अवर कोय ॥ १ ॥
 ब्रह्मा, विष्णु,  महेश, देव, अष्ट पोर हर आई सेव ।
 शेष लोक पंयाल होय, नित आठ पोहोर लवलीन जोय ॥ २ ॥
 पीर जैन अवतार जोय, ब्रह्म ब्रह्म कर रहे रोय। 
आकार धार त्रिलोक मांय, समझवान रहे ब्रह्म गाय ॥ ३ ॥ 
 शिष्ट सेंग तुज मांही होय, काल जम सब जख लोय। 
कह सुखदेव कहा कहूं आय, बडा बडा तुज पुकारया जाय ॥ ४ ॥
 
 परमधाम और ब्रह्म की महिमा
 परमधाम अर्थात पारब्रह्म परमात्मा — धन्य है, जहां से राम, कृष्ण जैसे अवतार भी प्रकट होते हैं।सारा संसार जिसका आधार है — वह है श्वांस। और पाँच तत्वों का आधार है — शून्य, अर्थात निरंजन, निराकार, सत् चेतन। वही शून्य — निराकार, सत् चेतन स्वरूप — ही ब्रह्म है। उससे ऊपर कोई नहीं है।ब्रह्मा, विष्णु, महादेव और सारे देवता — आठों पहर (रात-दिन) ब्रह्म की ही भक्ति करते हैं।शेषजी, पाताल लोक में हर समय भजन में लीन रहते हैं। पीर (मुसलमान संत), जैन अवतार — सब ब्रह्म की भक्ति करते हैं।तीनों लोकों में जितने भी आकारी, जितने भी ज्ञानी और विवेकी हैं — वे सब ब्रह्म की ही भक्ति करते हैं। पूरी सृष्टि, काल, यम, राक्षस — सब आपके ही भीतर समाए हैं।महाराज अंत में कहते हैं: कहां तक कहूं? जितने भी बड़े-बड़े ज्ञानी, अवतारी, महाशक्तियां हैं, वे सब रात-दिन आपको ही पुकारते हैं, आपकी भक्ति ही करते हैं।

The Glory of Paramdham and the Supreme Brahma

Paramdham is the Supreme Absolute God—blessed is that eternal abode, for it is the source from which incarnations like Rama and Krishna manifest.

The foundation of the entire universe is the Breath (Prana/Shwans). The foundation of the five elements is the Void (Shunya)—the Stainless, Formless, and Eternal Consciousness. That very Void—the Formless, Conscious Essence—is Brahma. There is nothing superior to it.

Lord Brahma, Lord Vishnu, Lord Mahadev, and all the deities worship Brahma throughout the eight watches of the day (day and night).

Sheshnag remains eternally immersed in hymns in the netherworld (Patal Lok). The Peers (Saints), Jain Avatars—all offer their devotion to Brahma.

In all three worlds, every embodied being, every sage, and every discerning soul worships Brahma. The entire creation, Time (Kaal), Death (Yam), and even the demons are contained within You.

The Master concludes:

"To what extent shall I describe it? All the great enlightened souls, incarnations, and supreme powers call upon You and worship You day and night."

Saturday, March 28, 2026

Mhaara Satguru aaya ye Saiyaan म्हारा सतगुरु आया ये सैयां_ हरजस पद राग बधावा (५)



 म्हारा सतगुरु आया ये सैयां, सब शहरा बटत बधाईयां ।। टेर ॥ 
 नाम नूर वारे मुख पर सोहे, तेज पूंज प्रकाशा।
हंसा काज लिया अवतारा, ब्रह्म देश का वासी ॥ १ ॥ 
 भक्त निशान अडिग ले रोप्या, घूरे अनाहद बाजा।
 बेमुख जीव किया सब सनमुख, साध शकल शिर राजा ॥ २ ॥
 अणभै ज्ञान अगम परवाना, दूर देशान्तर जावे।
प्रेम भाव पारसद अगवाणी, सूता जीव जगावे ॥ ३ ॥ 
 भरम अंधेरी में सूरज उगा, अमत का मेह बूंठा।
 जन सुखराम मिल्या गुरु बीरम, शब्द उजाला दीठा ॥ ४ ॥

 (पहले सुखराम जी महाराज के समय उनके गुरु बीरमदास जी थे तब उनके गुरु के प्रति ये भाव थे) 
महाराज फरमाते हैं: "आज हमारे गांव में ऐसे ओधाधारी सदगुरु पधारे हैं — पूरे नगर में बधाइयाँ बाँटी जा रही हैं।उनके मुख पर नाम का नूर चमक रहा है — जैसे कोई तेज-पुंज का दिव्य प्रकाश हो।
वे हंसवृत्ति आत्माओं के उद्धार के लिए ही ब्रह्मदेश से अवतार लेकर पधारे हैं। 
सताधारी संत केवल केवल की भक्ति का ही उपदेश करते हैं — वही अडिग निशान इस जग में रोपना है।
 रटना हो या बिना रटना, शब्द की ध्वनि स्वयं हो रही है — यही अनहद बाजा का घुरना है।
जो इस भक्ति से बेमुख थे, उन्हें ज्ञान के द्वार से जोड़कर भक्ति में सन्मुख किया। ऐसे संत ही सबसे श्रेष्ठ हैं।सतशब्द का अनुभव और साधन केवल अणभै ज्ञान से ही केवल पद आनंद पद की प्राप्ति कराता है — यही है अगम परवाना और दूर देशांतर जाना।
प्रेम और भाव से भजन करना, और भक्ति में लगना — यही पारसद की अगवानी है और सुता जीव का जागना है।जब केवल ज्ञान का प्रकाश होता है और भ्रम मिटते हैं, तो यही है — सूरज का उगना।जब अखंड आनंद का अनुभव होता है, तो वही है — अमृत का मेह बूठना।महाराज फरमाते हैं: “सतगुरु बीरमदास जी महाराज की कृपा से ही मुझे सतशब्द के प्रकाश का अनुभव हुआ है।”

Friday, November 21, 2025

Chaloni re hansa apne चालोनी रे हंसा अपणे_ हरजस पद राग बधावा (२)



चालोनी रे हंसा अपणे, राम जना रे देश। 
वां पद कूं बंचे सदा रे, शिव सनकादिक शेष ॥ टेर ॥
 या जुग में थिर कुछ नहीं रे, सुख दुख बारम्बार । 
ब्रह्मा, विष्णु, महेश सारा, फिर फिर ले ले अवतार ॥ १ ॥
 सुर नर सब सांसे पडया रे, जंवरो मांडयो जाल। 
पीर पेगम्बर मुनी जना रे, से नही बचा काल ॥ २ ॥ 
 जामण मरणा जहां नहीं रे, जहां नहीं सांसो सोग।
 मोहो माया व्यापे नहीं, म्हारा सतगुराजी रे लोक ॥ ३ ॥ 
 वा घर में नित ऊपजे रे, मुगता मोती हीर। 
अनन्त हंस केल्या करे, कोई सुन्न सागर रे तीर ॥ ४ ॥ 
 बोहता हंस बिराजिया रे, अजहूं बोहता जाय। 
भय दुख तो तो व्यापे नहीं, म्हारा सतगुराजी रो साथ ॥ ५ ॥
 केशर बरणा मारगा रे, आवे अमर बिवाण। 
सामा संत बधावसी रे, धिन धिन करता बांण ॥ ६ ॥
 अधर दीप वो जिगे मिगे रे, ज्यां में अमर ओवास ।
 निरभे संत बिराजिया रे, ज्यां रो नहीं है बिणास ॥ ७ ॥ 
 सदा सरीसी अवस्था रे, अमर संता री देह। 
अनंत जुगा नहीं बिछडे रे, म्हारे नित नित नवला नेह ॥ ८ ॥ 
 जन निपजे मरत लोक में रे, जय जय होय सुरलोक ।
 बटे बधाया उण लोक में रे, कोई संत पधारे मोख ॥ ९ ॥ 
 अगम अवाजा गेब की रे, गरज रहयो बैराट। 
भवन भवन में चानणो रे, वांरो बदन करे भरलाट ॥ १० ॥ 
 बार बार नर देही नहीं रे, करल्यो अपणो काज। 
जन सुखिया इण जीव की रे, म्हारा सतगुरांजी ने लाज ॥ ११ ॥ 

 
 हे हंसा! अपने राम जना के देश चलो — जिस पद की इच्छा शिव, सनकादिक, शेषजी तक रात-दिन करते हैं।इस जुग (युग) में कुछ भी स्थिर नहीं है — सुख-दुख भी बारंबार बारी-बारी से आते रहते हैं।ब्रह्मा, विष्णु, महादेव — जो इस सृष्टि के कर्त्ता हैं — उनकी भी आयु की अवधि है, वे भी आते-जाते रहते हैं।देवता और मनुष्यों सहित सबके जन्म-मरण का साँसा (भय) लगा हुआ है। काल ने सब पर जाल मांड रखा है — यहाँ तक कि पीर, पैग़म्बर, मुनीजन भी काल से नहीं बच सके।इसलिए सतगुरुजी के लोक चलो — जहाँ जन्म, मरण, सोग, मोह, माया कुछ भी नहीं है।उस घर — सतलोक में रोजाना हीरे-मोती उपजते हैं, और अनंत हंस वहां केलियाँ (आनंदमयी लीलाएं) कर रहे हैं।कई हंस वहाँ विराजमान हैं और वहां के आनंद को निरंतर ले रहे हैं। और अनेकों अब वहाँ जा रहे हैं।वहाँ पहुंचने के बाद न कोई भय रहता है, न कोई दुख। जो यहाँ ऐसी सच्ची भक्ति करते हैं, उन्हें लेने के लिए अमर विमान आता है — जो केसर वर्णा मार्ग से उन्हें लेकर जाता है।उस पद में विराजमान संत, ऐसे जाने वाले हंस की अगवानी करते हैं, उसे बधाते हैं, और कहते हैं — “धन्य-धन्य!” अधर दीप — जो स्वप्रकाशवान देश है — उस पद की प्राप्ति होने पर हंस अमर हो जाता है।वहाँ सदा सरीसी अवस्था रहती है — अर्थात सभी हंसों का एक ही दिव्य रूप होता है। उस पद की प्राप्ति के बाद हंस कभी बिछड़ता नहीं है।वहाँ सभी की अवस्था एक समान होती है, और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।अनंत युग बीत जाने पर भी हंस वहाँ से नहीं बिछड़ता, बल्कि रोजाना नए-नए आनंद अनुभव करता है।जो मृत्युलोक में आकर ऐसी सच्ची भक्ति करते हैं, उनकी देवलोक में जयजयकार होती है — और केवल पद में बधाइयाँ बाँटी जाती हैं कि: “आज मृत्युलोक से एक संत मोक्ष में पधार रहे हैं।”संतों के मोक्ष पधारने पर सतगुरु पद में अगम आवाज़ें, शब्द की अनहद ध्वनि सुनाई देती रहती है।और जब सारे शरीर में शब्द का अनुभव होता है — यही बेराट का गरजना है। जब सभी स्थानों और पूरे शरीर में सतशब्द का अखंड अनुभव होता है — तो यही भवन-भवन में चानणो (प्रकाश होना) है, और बदन का भरलाट करना (पूरा शरीर भर जाना) है।सतगुरु केवली भगवंतों के अणभै ज्ञान से भेद लेकर, सतगुरु पद की प्राप्ति करना ही अपना काज करना है।सतगुरु केवली संतो की कृपा से ही जीव को उस पद की प्राप्ति हो सकती है।यह मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता — इसलिए अब विलंब न करो।

Samjho ho nar samajh naar समझो हो नर समझ नार_ हरजस पद राग बसन्त Harjas Pad Raag Basant (१२)



समझो हो नर समझ नार, बिन भक्ति धरक जिवो संसार ॥ टेर ॥
 भजन बिना नर सरब ओम, कीट श्वान पशु पंछी जेम।
 राज पाट सुरलोक कहाय, हर नांव बिना सुण जम खाय ॥ १ ॥ 
 सावधान बुद्ध अकल जोर, निरख परख कहे सब ठौर।
 द्रव्य अपार अखूट होय, भजन बिना नर चल्यो है रोय ॥ २ ॥
 करत तन बोहो जोग जुग, लेत बीज सरब शुभ चुग। 
कसर कोर नहीं रखी मांय, पण बिना नांव नहीं मोख जाय ॥ ३ ॥
 कह सुखदेव विचार विमेक, सब हार चले नर नार देख।
 मिनख जन्म अमोलक पाय, गुरु के भेद बिना चले गमाय ॥ ४ ॥ 

 भक्ति के बिना जीवन व्यर्थ है महाराज सभी स्त्री-पुरुषों से कहते हैं: बिना भक्ति के संसार में जीना — धिक्कार है।बिना भजन के मनुष्य भी कीट, कुत्ते, पशु-पक्षियों के समान हो जाता है। चाहे उसके पास राजपाट हो, या वह स्वर्ग लोक का अधिकारी क्यों न बन जाए — लेकिन यदि निज नाम की भक्ति नहीं की, तो जन्म-मरण का चक्र नहीं टूटता — यही है "जम का खाना"।चाहे किसी के पास असीम बुद्धि हो, बड़ी सावधानी हो, अद्भुत बल और सुसंस्कृत वाणी हो — वह सारा जगत देखकर बोलता हो, और उसके पास ऐसा धन हो जो कभी समाप्त न हो — फिर भी यदि भजन नहीं किया, तो अंत में रोकर ही जाना पड़ेगा, क्योंकि कुछ भी साथ नहीं जाएगा। कुछ लोग कठोर तपस्या करते हैं, जुगों तक योग-साधना में लगे रहते हैं, और सब शुभ करम करते हैं — किसी शुभ कार्य में कोई कसर नहीं छोड़ते।लेकिन, यदि उन्होंने निज नाम की भक्ति नहीं की, तो मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती।महाराज अंत में कहते हैं: "सब कुछ विवेक से विचारो। सब स्त्री-पुरुषों को देखो — यदि उन्होंने सतगुरु का अणभै ज्ञान न पाया, और मनुष्य जन्म पाकर भी परमात्मा की प्राप्ति नहीं की, तो वही उनकी हार है — और हारकर ही चलना है।"

The Futility of Life Without Devotion

Life is meaningless without devotion. The Great Master (Maharaj) addresses all men and women, saying: "To live in this world without devotion is a matter of shame and reproach." Without worship (Bhajan), a human being is no different from insects, dogs, animals, or birds.

The Illusion of Worldly Success

Even if a person possesses a vast kingdom or becomes worthy of the heavenly realms—if they have not practiced devotion to the Divine Name (Nij Nam), the cycle of birth and death remains unbroken. This is what it means to be "food for the Lord of Death" (Jam ka Khana).

One may possess:

  • Infinite intellect and extreme caution.

  • Extraordinary strength and refined, cultured speech.

  • The ability to speak with the experience of having seen the entire world.

  • Inexhaustible wealth that never ends.

Yet, if they have not engaged in worship, they will ultimately depart this world in tears, for nothing of this world goes with them.

The Limits of External Rituals

Some people undergo severe penance, engage in Yogic practices for ages, and perform every possible virtuous deed—leaving no stone unturned in their pursuit of good karma. However, if they have not practiced devotion to the Inner Name, liberation (Moksha) can never be attained.

The Final Conclusion

In conclusion, the Master says:

"Contemplate everything with spiritual discernment (Vivek). Look at all people—if they have not attained the Fearless Wisdom (Anbhai Gyan) of the True Guru (Satguru), and despite being blessed with a human birth, they fail to realize the Divine, then that is their ultimate defeat. In the end, they must depart as ones who have lost the battle of life."

Mere laagi ho oor shabd bhaal मेरे लागी हो ऊर शब्द भाल_हरजस पद राग बसन्त (११) 

 मेरे लागी हो ऊर शब्द भाल, क्या करिये जुग किरत ख्याल ॥ टेर ॥ 
 जे मन घेर राखूं ऊर मांय, तो तन टूक टूक होय जाय।
 मेरे बस नहीं ओ मन होय, बिरह धाहा पुकारे जोय ॥ १ ॥ 
 अक बक जीव भयो मन मोय, जुग कुल लाज न कोय। 
रूम रूम कह राम राम, कब हर परसुं निज धाम ॥ २ ॥ 
 ज्यों जग में सेण न दिसे कोय, सबे नर नार जमा सम होय।
 कह सुखराम गुरु धिन कवाय, के राम स्नेही जे जुग मांय ॥ ३ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (11)
 Mere laagi ho oor shabd bhaal, kya kariye jug kirat khyaal. ॥ Ter ॥
 Je man gher raakhu oor maay, to tan took took hoy jaay.
 Mere bas nahin o man hoy, birah dhaaha pukare joy. ॥ 1 ॥
 Ak bak jeev bhayo man moy, jug kul laaj na koy. 
 Room room kah Ram Ram, kab har parsun nij dhaam. ॥ 2 ॥
 Jyon jag mein sen na dise koy, sabe nar naar jama sam hoy. 
 Kah Sukhram guru dhin kavay, ke Ram snehi je jug maay. ॥ 3 ॥

 विरह और भक्ति का भाव जगत की करनियों और क्रियाओं को त्यागकर, हर समय निज नाम की भक्ति में लगना — यही है हृदय में शब्द का भाल (तीर) लगना। जब मैं मन को समझाकर, भक्ति के मार्ग पर टिकाए रखता हूँ, तो शरीर को कष्ट होता है — यही “टूक-टूक होना” है।यह मन मेरे वश में नहीं है, परंतु फिर भी यह रात-दिन विरह भाव से आपका भजन करता रहता है।संसार और कुल की लज्जा छोड़कर, केवल आपकी भक्ति में लग जाना — यही है "अक-बक" होना (लोक-लाज खो देना)।रोम-रोम में राम-राम गूंज रहा है, और मन में केवल यही तड़प है — "कब मुझे केः पद और आः पद की प्राप्ति होगी?"इस संसार में कोई भी सच्चा हितैषी नहीं दिखता, सभी स्त्री-पुरुष भक्ति में विघ्न डालने वाले प्रतीत होते हैं।महाराज अंत में कहते हैं: सतगुरु रामजी महाराज धन्य हैं, और वे सभी सतसंगी भी धन्य हैं जो रामजी की भक्ति में लगे रहते हैं।
Dhin dhin ho dhin Ram naam धिन धिन हो धिन राम नाम_ हरजस पद राग बसन्त (१०) 

 धिन धिन हो धिन राम नाम, तासे अखण्ड अधर पर सहज धाम ॥ टेर ॥ 
 प्रथम धिन सतसंग होय, ज्यां गुरुदेव मिलाया मोय। 
भांत भांत सो भरम जांण, निरभै ज्ञान दिया ऊर आंण ॥ १ ॥ 
 पूरब जन्म हमारो धिन, सुखरत शुभ किया इण मन।
 तां की विध अब मिली आय, राम धुन लागी ऊर मांय ॥ २ ॥
 धिन धिन भाग हमारो जांण, ताके मीत राम सा हुवा आंण। 
दुख सुख भरम मिटाया दोय, सुरग नरक सांसो नहीं कोय ॥ ३ ॥
 धिन धिन मन हमारो होय, जिन हरि भक्ति संभाई जोय। 
आठ पोहोर रटयो निज नाम, कह सुखराम सरे सब काम ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (10) 
Dhin dhin ho dhin Ram naam, taase akhand adhar par sahaj dhaam. ॥ Ter ॥
 Pratham dhin satsang hoy, jyaan Gurudev milaya moy.
 Bhaant bhaant so bharam jaan, nirbhai gyaan diya oor aan. ॥ 1 ॥
 Poorab janm hamaro dhin, sukhrat shubh kiya in man.
 Taan ki vidh ab mili aay, Ram dhun lagi oor maay. ॥ 2 ॥
 Dhin dhin bhaag hamaro jaan, taake meet Ram sa huwa aan. 
 Dukh sukh bharam mitaaya doy, surg narak saanso nahin koy. ॥ 3 ॥
 Dhin dhin man hamaro hoy, jin Hari bhakti sambhai joy. 
 Aath pohor ratyo nij naam, kah Sukhram sare sab kaam. ॥ 4 ॥

 राम नाम और सतगुरु की कृपा का महात्म्य 
राम नाम को धिन (धन्य) है, जिसके द्वारा खण्ड-पिण्ड, ब्रह्माण्ड और पारब्रह्म से भी ऊपर — अधर शब्द का अनुभव होता है। सबसे पहले तो सत्संग को धिन है, जिससे मुझे सतगुरु के अणभै (निर्भय/गूढ़) ज्ञान की प्राप्ति हुई। जिसके द्वारा अनेक प्रकार के भ्रम मिटे, और मुझे केः पद और आः पद का साक्षात ज्ञान हुआ।मेरा पूर्व जन्म भी धिन है, जिसमें इस मन ने शुभ कर्म किए थे — उन्हीं का फल है कि आज यह आत्मा रटने और बिना रटने, दोनों अवस्थाओं में सतशब्द की अखण्ड ध्वनि का अनुभव कर रही है।हमारा भाग्य धिन है, जिसके कारण रामजी की प्राप्ति हुई। सुख-दुख, स्वर्ग-नरक के भय, और सभी भ्रमों का अंत हो गया।हमारा मन धिन है, जो अब रामजी की भक्ति में ही लगा हुआ है।महाराज फरमाते हैं: जो आठों पहर (रात-दिन निरंतर) निज नाम की भक्ति करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।यही है वह सच्चा कार्य, जिसे पूर्ण करना ही जीवन का सार है।
Mat bhoolo ho man maaya sang मत भूलो हो मन माया संग_हरजस पद राग बसन्त (९) 

 मत भूलो हो मन माया संग, समझ सोच कर रहो अभंग ॥ टेर ॥ 
 भगत बिना नर धरक कहाय, कोट अकल बुध ओली जाय। 
नांव बिना सब आल जंजाल, सुणज्यो शिष्ट, संत, सर्ब ग्वाल ॥ १ ॥ 
 आन धरम सब माया होय, यां कुं पूज तिरियो सुणयो नहीं कोय।
 तारणहार ब्रह्म राम राय, गुरु गम भेदज लहिजे आय ॥ २ ॥ 
 जिण जिण प्रीत लगाई आय, तिरता बार न लागी काय। 
ऐसो नांव नकेवल होय, तिरिया संत अनेकूं लोय ॥ ३ ॥
 छाडो झूठ, कर सांच संग, पाको रंग चढावो अंग। 
कह सुखदेव बजाय बजाय, ईमरत छाड बिसे मत खाय ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (9)
 Mat bhoolo ho man maaya sang, samajh soch kar raho abhang. ॥ Ter ॥
 Bhagat bina nar dharak kahay, kot akal budh oli jaay. 
 Naam bina sab aal janjal, sunjyo shisht, sant, sarb gvaal. ॥ 1 ॥
 Aan dharam sab maaya hoy, yaa ku pooj tiriyo sunyo nahin koy. 
 Taranhaar Brahm Ram raay, guru gam bhedaj lahije aay. ॥ 2 ॥ 
Jin jin preet lagai aay, tirta baar na laagi kaay.
 Aiso naam na keval hoy, tiriya sant anekun loy. ॥ 3 ॥
 Chhado jhooth, kar saanch sang, paako rang chadhavo ang.
 Kah Sukhram bajay bajay, imrat chhad bise mat khaay. ॥ 4 ॥ 
माया को त्यागकर आत्मधर्म ग्रहण करो महाराज मन से कहते हैं: "हे मन! शरीर रूपी माया का साथ करके परमात्मा को मत भूल, माया से अलग रह — उसमें न फँस।"भक्ति के बिना मनुष्य जीवन धिक्कार के योग्य है। चाहे करोड़ों की बुद्धि क्यों न हो, यदि वह परमात्मा के नाम से रहित है, तो वह व्यर्थ है — केवल जंजाल है।सभी संतों और समस्त सृष्टि के प्राणियों से कहता हूँ: जो भी धर्म प्रकृति और माया के आधार पर चलता है, वह सब मायिक धर्म है — और ऐसे किसी भी "आन धर्मी" का मोक्ष नहीं हुआ।उद्धारकर्ता तो केवल ब्रह्मस्वरूप रामजी ही हैं। जब कोई सतगुरु का अणभै (निर्भय और पारमार्थिक) ज्ञान धारण करता है, तभी उसे उनका वास्तविक भेद मिलता है।जो हंस आत्माएं साँस-उसाँस में राम का स्मरण करती हैं, उनमें आत्मचेतना से सतशब्द का अनुभव होता है — यही आत्मधर्म है।जिन-जिन ने प्रेम से भजन किया, उनका उद्धार कभी विलंबित नहीं हुआ।केवल का "निराधार नाम" — यानी वह नाम जो माया, मन, वाणी से परे है — वही नाम है जिसने अनेक संतों का उद्धार कर दिया।इसलिए — असत को छोड़कर सत का साथ करो। पक्का ज्ञान धारण करो, अर्थात असत्य को छोड़कर सत्य का विवेक ग्रहण करो।महाराज बार-बार कहते हैं: "हे मन! अमृत को छोड़कर विष मत खा। मैं तुझसे यह बात पुनः-पुनः कह रहा हूँ।"
Kon shabd se kon hoy कोण शब्द से कोण होय_ हरजस पद राग बसन्त (८) 

 कोण शब्द से कोण होय, जन सोच सोध कहो अरथ मोय ॥ टेर।
 बावन हरफ सब सोज बीर, कौन शब्द को कोण चीर।
 तत पांच गुण तीन जांण, सतशब्द मूल मुज ज कहो आंण ॥ १ ॥ 
 हो ररंकार में बडो कोण, सुण ओऊं सोऊं कहो मोण।
 या च्यार शब्द को करो न्याव, कोण शब्द सो कोण आय ॥ २ ॥
 पांच तत्त गुण तीन जांण, ईण ओऊं शब्द से बणया आंण।
 सुण सोऊं शब्द का हरफ सेंग, जे जीभ पढत मुख करे बेग ॥ ३ ॥ 
 च्यार हरफ को मूल एक, यो शीश शब्द सोई इधक देख। 
कह सुखदेव कहे सो सोध जोय, सुण सतशब्द सो अधिक होय ॥ ४ ॥ 

 Harjas Pad Raag Basant (8)
 Kon shabd se kon hoy, jan soch sodh kaho arth moy. ॥ Ter ॥ 
Bawan harf sab soj beer, kaun shabd ko kon cheer. 
 Tatt paanch gun teen jaan, satshabd mool muj j kaho aan. ॥ 1 ॥
 Ho rarkaar mein bado kon, sun oon soon kaho mon. 
 Ya chaar shabd ko karo nyaav, kon shabd so kon aay. ॥ 2 ॥ 
Paanch tatt gun teen jaan, in oon shabd se banaya aan. 
 Sun soon shabd ka harf seng, je jeebh padat mukh kare beg. ॥ 3 ॥
 Chaar harf ko mool ek, yo sheesh shabd soi idhak dekh.
 Kah Sukhram kahe so sodh joy, sun satshabd so adhik hoy. ॥ 4 ॥ 

भक्ति करने वालों से महाराज कहते हैं — "जिस शब्द से जो कुछ भी होता है, उसे सोच-समझकर कहो, केवल रटने से कुछ नहीं होता। बावन (५२) हरफों को पहचानो, और समझो कि कौन-सा शब्द कितनी दूर तक पहुँच रखता है।पाँच तत्व और तीन गुणों को जानो — और यह भी बताओ कि सतशब्द का मूल क्या है? ररंकार में बड़ा कौन है? ओऊं और सोऊं का स्थान क्या है?इन चारों शब्दों (ररंकार, ओऊं, सोऊं, सतशब्द) का खुलासा (विवेचन) करो — कि कौन-सा शब्द किस स्तर तक कार्य करता है, और कहां तक ले जा सकता है। महाराज आगे कहते हैं:पाँच तत्व और तीन गुण — ये सब आत्मा और ब्रह्म से बने हैं।"सोऊं" शब्द का अर्थ है — स्वाँस। इसी स्वाँस से ही सब अक्षर (हरफ) बनते हैं, जिन्हें जीभ से बोला जाता है।इन सभी चारों शब्दों का मूल आधार है — "ओक", अर्थात स्वाँस।लेकिन इन सबसे ऊपर और श्रेष्ठ जो है, वह है सतशब्द।निष्कर्ष:महाराज कहते हैं — "सतशब्द" इन सभी शब्दों से अधिक महान है। तुम स्वयं इसका अनुभव करके देखो, तभी इसकी सत्यता और गहराई समझ में आएगी।
Dhirag dhirag so nar naar kavay धिरग धिरग सो नर नार कवाय_ हरजस पद राग बसन्त (७) 

 धिरग धिरग सो नर नार कवाय, हर पथ छाड जम गेल जाही ।। टेर ॥
 जन संग छाड ठग संग कीन, लाडूज तज मुख भीष्ट लीन। 
नर अमर बेल कूं खिणे आय, जल तुछ बेल कूं पावे है जाय ॥ १ ॥
 परण्यो पीव पर हरयो संग, नीच यार संग रची रंग। 
गज से उतर चढ्यो खर आय, ईमरत छाड विषे मत खाय ॥ २ ॥
 सांच छाड गहे झूठ कोय, धन गांठ भव ज्यां हां हरे सोय।
 जन केत देव सुखदेव आंण, फिट शुभ छाड गहे अशुभ जांण ॥ ३ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (7)
 Dhirag dhirag so nar naar kavay, har path chhad jam gel jaahi. ॥ Ter ॥
 Jan sang chhad thag sang keen, laaduj taj mukh bhisht leen.
 Nar amar bel ku khine aay, jal tuchh bel ku paave hai jaay. ॥ 1 ॥
 Paranyo peev par haryo sang, neech yaar sang rachi rang.
 Gaj se utar chadhyo khar aay, imrat chhad vishe mat khaay. ॥ 2 ॥
 Saanch chhad gahe jhooth koy, dhan gaanth bhav jyaan haan hare soy.
 Jan ket dev Sukhdev aan, phit shubh chhad gahe ashubh jaan. ॥ 3 ॥ 

सत को त्यागने वालों के लिए धिक्कार महाराज कहते हैं — उन सभी स्त्री-पुरुषों को धिक्कार है, धिक्कार है जो परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग को त्यागकर, जन्म-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं।जो संतों का साथ छोड़कर, ठगों और मायावियों का संग करते हैं — उन्हें फिटकार है।जो लड्डुओं जैसे अमृत रूपी सत्संग को छोड़कर, मुंह में मैल भरते हैं, अर्थात मिथ्या और विषय-वासना को ग्रहण करते हैं — वे विनाश को बुलाते हैं।जो मनुष्य अमर बेल (अविनाशी साधना) को नष्ट करते हैं, और साधारण बेल (मायिक क्रियाएं) को सींचते हैं — वे अपनी बुद्धि खो चुके हैं।जो स्त्रियाँ अपने धर्मपरायण पति को त्यागकर, नीच पुरुषों का संग करती हैं — वह गंभीर पतन को प्राप्त होती हैं।जो हाथी जैसे सतगुरु ज्ञान को छोड़, गधे जैसे झूठे आडंबर पर चढ़ते हैं, वो आत्मा को नीच योनि में ले जाते हैं।जो अमृत (सतशब्द) को त्यागकर, जहर (माया) को अपनाते हैं — वे **खुद अपना नाश करते हैं।जो सत्य को छोड़कर, झूठ को पकड़ते हैं, वे साक्षात अंधकार की ओर बढ़ते हैं।जो अपनी गांठ (साधना व आत्मा की पूंजी) को चुराने वालों का साथ करते हैं, और लालच, भ्रम, व मोह में फँसते हैं — वे मोक्ष से दूर हो जाते हैं। महाराज अंत में कहते हैं: जो लोग जान-बूझकर शुभ को छोड़कर अशुभ को अपनाते हैं, उन्हें बार-बार फिटकार, धिक्कार, और पछतावा ही मिलता है।
Koi osa hai jan sant sujaan कोई ओसा है जन संत सुजाण_ हरजस पद राग बसन्त (६) 

 कोई ओसा है जन संत सुजाण, निज निरगुण सेव बतावे आंण ॥ टेर ॥ 
 जप तप तीरथ धाम सोय, पुर जिग्य ज्योग सब बास जोय ।। 
ओ सबे रीत सुरगुण मांय जांण, चरच पूजकर जप ठांण ॥ १ ॥ 
 सुण पढत ज्ञान अदभूत कोय, सुणबाय बेण बोहो विध होय।
 जप जाप सूरत मन करे सेव, धुन ध्यान ज्याहां लग माया देव ॥ २ ॥
 ओऊं शब्द के सोऊं सोय, सुरगुण मूल तो ओज होय। 
ममंकार सो माया जांण, मन जीभ चढे सो सरब ठांण ॥ ३ ॥ 
 करद शब्द के अरथ सोय, मन सूरत पढत सो माया होय।
 चित क्रिया होय बात ठांण, जब लग सुरगुण असल बखाण ॥ ४ ॥
 भजन पूर कर राम गाय, सत निरगुण शब्द है सहज मांय।
 मत भूल केवता सुणे जोय, सुण अरध शब्द गम रटया होय ॥ ५ ॥
 जब ओर आंण कर कहे कोय, मन जीभ समझ ज्यों तुरत होय।
 जन कहत देव सुखदेव जान, ऊ अरध शब्द नहीं भरम मान ॥ ६ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (6)
 Koi osa hai jan sant sujaan, nij nirgun sev batave aan. ॥ Ter ॥ 
Jap tap teerath dhaam soy, pur jigy jyog sab baas joy.
 O sabe reet surgun maay jaan, charach poojkar jap thaan. ॥ 1 ॥
 Sun padat gyaan adbhut koy, sunbaay ben boho vidh hoy. 
 Jap jaap surat man kare sev, dhun dhyaan jyaah lag maaya dev. ॥ 2 ॥
 Oon shabd ke soon soy, surgun mool to oj hoy.
 Mammkaar so maaya jaan, man jeebh chadhe so sarb thaan. ॥ 3 ॥
 Karad shabd ke arth soy, man surat padat so maaya hoy.
 Chit kriya hoy baat thaan, jab lag surgun asal bakhaan. ॥ 4 ॥ 
Bhajan pur kar Ram gaay, sat nirgun shabd hai sahaj maay. 
 Mat bhool kevta sune joy, sun ardh shabd gam ratya hoy. ॥ 5 ॥ 
Jab or aan kar kahe koy, man jeebh samajh jyon turat hoy. 
 Jan kahat dev Sukhdev jaan, oo ardh shabd nahin bharam maan. ॥ 6 ॥

 निर्गुण भक्ति और सतशब्द का रहस्य कोई ऐसा सच्चा समझदार संत हो, जो निर्गुण भक्ति का वास्तविक भेद बताए — वह भक्ति जो आत्म-चेतना के आधार से, आत्मा को निरंजन, निराकार पद में स्थित करती है, जहाँ वाणी और बिना वाणी के भी शब्द अखण्ड रूप से चलता है। जो जप, तप, तीर्थ-यात्रा, पुरियों में जाना, जीग (यज्ञ), योग, उपवास आदि करते हैं — वह सब सगुण भक्ति की विधियाँ हैं। पूजा करना, चन्दन चढ़ाना, जप करना — यह सब भी सगुण (मूर्त रूप) की उपासना है।कुछ लोग अद्भुत-अद्भुत ज्ञान ग्रंथ पढ़ते हैं, और विभिन्न विधियों से भाषण करते हैं। कुछ सूरत और मन को लगाकर जप-जाप, ध्यान और धुन करते हैं — परंतु यह सभी माया के पद में आते हैं।ओंकार (ओऊं) और सोहं (सोऊं) का जपा-अजपा करना भी सगुण भक्ति का मूल है।“ममंकार” (मैंपन) भी माया है, मन से ज्ञान करना, जीभ से बोलना — यह सब भी माया का कार्य है।चित लगाकर भजन करना, या किसी भी प्रकार की क्रिया-साधना करना, यह सब भी सगुण सेवा है।किन्तु, जब कोई सतगुरु की विधि से, पूर्ण प्रेम और श्रद्धा से रामजी का भजन करता है, तभी उसे सतशब्द का अखण्ड अनुभव होता है — और यही अनुभव 'निर्गुण शब्द' कहलाता है।महाराज चेतावनी देते हैं: दूसरों की कही बातों को सुनकर मत भटको। जो केवल “अर्ध शब्द” का रटना है, उससे वास्तविक ज्ञान नहीं होता।अगर कोई व्यक्ति आकर यह कहे कि "ज्ञान मन, वाणी और समझ के आधार पर होता है, और वही ररंकार है" — तो महाराज कहते हैं — यह भ्रम है, भरम है।
Dhirag dhirag ho man dhirag toy धिरग धिरग हो मन धिरग तोय_हरजस पद राग बसन्त (५)

 धिरग धिरग हो मन धिरग तोय, गुरु गम छाड जग बश होय ।। टेर ।।
 लिव भजन छाड कर कथे है ज्ञान, जप धरम करत नर बंधे मान ।। 
हर सुख छाड माया मन चाय, तज ध्यान ठौर जग रमण जाय ॥ १॥ 
 अष्ट पोहर रट राम राय, पल निमक एक नहीं ढील खाय। 
सुण एक लेस ऊर मांही जांण, जुग जुग पूजे सो मोही आंण ॥ २ ॥
 देह भांग भख भूर कीन, सब सुख छाड कर भयो है लीन।
 सुण एक पंथ ऊर अरथ चाय, फिट भगत बीच आरे हो संभाय ॥ ३ ॥
 धिरग धिरग हो मन तोय, गुरु देव छाड शिष बस होय। 
कह सुखराम कजी सो काढ, कसर कोरनो शीश बाढ ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (5) 
Dhirag dhirag ho man dhirag toy, guru gam chhad jag bash hoy. ॥ Ter ॥
Liv bhajan chhad kar kathe hai gyaan, jap dharam karat nar bandhe maan.
 Har sukh chhad maaya man chaay, taj dhyaan thaur jag raman jaay. ॥ 1 ॥
 Asht poher rat Ram raay, pal nimak ek nahin dheel khaay. 
 Sun ek les oor maahi jaan, jug jug pooje so mohi aan. ॥ 2 ॥ 
Deh bhaang bhakh bhoor keen, sab sukh chhad kar bhayo hai leen.
 Sun ek panth oor arth chaay, phit bhagat beech aare ho sambhaay. ॥ 3 ॥
 Dhirag dhirag ho man toy, guru dev chhad shish bas hoy.
 Kah Sukhram kaji so kaadh, kasar korno sheesh baadh. ॥ 4 ॥
 मन को उपदेश: 
सच्चे भजन का मार्ग महाराज मन से कहते हैं: "हे मन! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है, जो तू सतगुरु के अणभै ज्ञान को त्यागकर जगत की माया के अधीन हो गया है।तू सच्चे भजन की लिव (एकाग्रता) को छोड़कर, अन्य ज्ञानों में उलझा हुआ है। जप, तप और धर्म करके तू मान और प्रतिष्ठा चाहता है।तू परमात्मा के सुखों को छोड़कर, माया की तुच्छ इच्छाओं को अपनाना चाहता है। परमात्मा के ध्यान को त्यागकर जगत में भटकता फिरता है।रात-दिन आठों पहर, रामजी का भजन कर — एक पल भी ढील मत दे। इस एक बात को हृदय में दृढ़ता से धारण कर — कि युगों-युगों से लोग पूज्य बनने के लिए तन को कष्ट देकर कर्म करते आ रहे हैं, परंतु यदि भक्ति नहीं है, तो वह सब अर्थहीन है — केवल धिक्कार है।हे मन! तुझे धिक्कार है, जो तू सत की भक्ति को त्यागकर, असत (मायिक) भक्ति करता है। यह तो वैसा ही है जैसे गुरुदेव को छोड़कर शिष्य के वश में होना।महाराज कहते हैं: जो भी भ्रम, गलती और भक्ति में जो भी कसर बाकी है, उन्हें निकाल फेंक — और रामजी के भजन में पूर्ण रूप से लग जा।
Kah Geeta ho sun ved chaar कह गीता हो सुण वेद चार_ हरजस पद राग बसन्त (४)

 कह गीता हो सुण वेद चार, हर नांव तत सुंई तत सार ।। टेर ॥ 
 पुराण अठारे भरत साख, शिव शेष संत सो केहे भाख ॥ 
ग्रन्थ और सब जोय जोय, सब मांही बीज कण नांव होय ॥ १ ॥ 
 आन धरम सब मिटे है सोय, सुण राम नाम जुग अटल जोय।
 परापरी लग संत कवाय, सत राम नाम जन केत जाय ॥ २ ॥ 
 चवदे पूरब कथा जोय, हर रामायण सा ग्रन्थ होय । 
बांच बांच सो कहे, धाम सत स्वरूप सम नहीं किशन राम ॥ ३॥
 केत देव सुखदेव पेख, निज नाम सम नहीं अवर देख ॥ ४ ॥ 
 Harjas Pad Raag Basant (4)
Kah Geeta ho sun ved chaar, Har naam tatt suni tatt saar. ॥ Ter ॥
 Puran athaare Bharat saakh, Shiv Shesh sant so kehe bhaakh.
 Granth aur sab joy joy, sab maahi beej kan naam hoy. ॥ 1 ॥
 Aan dharam sab mite hai soy, sun Ram naam jug atal joy.
 Paraapari lag sant kavay, sat Ram naam jan ket jaay. ॥ 2 ॥ 
Chavde poorab katha joy, Har Ramayan sa granth hoy. 
 Baanch baanch so kahe, dhaam sat swaroop sam nahin Kishan Ram. ॥ 3 ॥
 Ket dev Sukhdev peikh, nij naam sam nahin avar dekh. ॥ 4 ॥ 

राम नाम की महिमा और शास्त्रों की साक्षी 
महाराज फरमाते हैं: इस संसार में सभी जीव मरते हैं, चाहे वे लोकपाल, सूर (देवता), शेषनाग, या कोई महान योद्धा ही क्यों न हों। जप, तप, योग और व्रत — जिन्हें लोग बड़े साधन समझते हैं — ये सब भी काल के प्रभाव में नष्ट हो जाते हैं।गीता और चारों वेद भी यही कहते हैं — कि "परमात्मा का नाम ही सबसे श्रेष्ठ है।" और इसकी पुष्टि अठारहों पुराण भी करते हैं।शिवजी, शेषजी, और समस्त संतों का भी यही मत है — कि राम नाम ही सत्य है, शाश्वत है।जब सभी ग्रंथों का अवलोकन किया गया, तो पाया कि — हर ग्रंथ में "राम नाम" ही कण और बीज की तरह उपस्थित है।अन्य धर्म, जो केवल माया पर आधारित हैं, वे समय के साथ मिट जाते हैं। परंतु राम का नाम, अनेक युगों से अटल और अडोल बना हुआ है।"परापरी", अर्थात आदि युगों के संतों ने भी राम नाम को ही "सत" (सत्य) कहा है।चौदह भाषाओं में जो भी कथाएँ कही गई हैं, उनका भी जब विवेचन किया गया, तो यही पाया कि — रामायण जैसे महान ग्रंथ भी, बार-बार यही दोहराते हैं कि — "राम" ही सत्स्वरूप हैं, और उनके बराबर राम और कृष्ण जैसे अवतार भी नहीं ठहरते।तीनों लोकों में, जो भी साधन जप, जाप, तप कहे जाते हैं — उन सभी का मूल्य तभी है जब वे परम ब्रह्म के निज नाम से जुड़ें।महाराज अंत में कहते हैं: "सबको देखो, सबको परखो — पर ब्रह्म के नाम और निज नाम के बराबर कोई भी साधन नहीं है।"
Man bhajiye ho nit Ram naam मन भजिये हो नित राम नाम_ हरजस पद राग बसन्त (३)

मन भजिये हो नित राम नाम, ज्यां से शकल मनोरथ सजे काम ॥ टेर ॥
 व्यास किशन रघुनाथ जांण, धूव नारद शनकाद आंण।
 ब्रह्मा विष्णु महेश देव, नित पारब्रह्म की लग सेव ॥ १ ॥ 
 रूखमांगद अर्जुन जांण, भीष्म द्रोण सुख संजेय बखाण।
 प्रहलाद पांडव अमरीष होय, ओ भी भज्यो नित राम जोय ॥ २ ॥
 पाराशर रिष रूम जांण, पृथु साल जन भरत मान।
 हंस ध्वज जुग रूप सूर, हर गाय परसिया ब्रह्म नूर ॥ ३ ॥ 
 पिपलाद हरि किवलाद होय, रिष रिषभ देव अवतार जोय। 
जन केत देव सुखदेव जान, सब समझवान भये लीन आन ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (3)
 Man bhajiye ho nit Ram naam, jyaan se shakal manorath saje kaam. ॥ Ter ॥
 Vyaas Kishan Raghunath jaan, dhuv Narad Shankad aan.
 Brahma Vishnu Mahesh Dev, nit Parbrahm ki lag sev. ॥ 1 ॥
 Rukhmaangad Arjun jaan, Bhishm Dron sukh sanjey bakhaan.
 Prahlad Pandav Amrish hoy, o bhi bhajyo nit Ram joy. ॥ 2 ॥ 
Parashar rish room jaan, Prithu saal jan Bharat maan.
 Hans dhwaj jug roop soor, har gaay parsya Brahm noor. ॥ 3 ॥
 Piplaad Hari Kivlaad hoy, rish rishabh dev avatar joy.
 Jan ket dev Sukhdev jaan, sab samajhwaan bhaye leen aan. ॥ 4 ॥

 राम नाम का भजन और उसकी सिद्धि
 महाराज मन से उपदेश देते हैं — "राम नाम का निरंतर भजन करो," जिससे तेरे सभी मनोरथ (इच्छाएँ) और सभी कार्य सिद्ध हो जाएंगे। यह कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि पारब्रह्म का निज नाम है, जिसकी भक्ति देव, ऋषि और राजाओं ने भी की है। व्यासजी, श्रीकृष्ण, श्रीरामचन्द्रजी, ध्रुवजी, नारदजी, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी पारब्रह्म के इस नाम की भक्ति करते हैं। रूखमांगद, महाबली अर्जुन, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, सुखदेवजी, संजय, प्रह्लाद, पांडव, राजा अम्बरीष — ये सब राम नाम के उपासक थे।पराशर ऋषि, लोमश ऋषि, राजा पृथु,राजा भरत, पिपलाद हरि, किवलाद ऋषि, ऋषभदेवजी तथा अन्य अवतार — इन सभी ने राम नाम में ही तन्मयता प्राप्त की। महाराज अंत में कहते हैं: "इन सभी ने समझ-बूझकर, ज्ञान और श्रद्धा से, स्वयं को राम में लीन कर लिया है।"
Sant sunjyo ho satshabd vichaar संत सुणज्यो हो सतशब्द विचार_हरजस पद राग बसन्त (२) 

 संत सुणज्यो हो सतशब्द विचार, अखण्ड शब्द सोई तत सार ।। टेर ॥ 
 बोले बेण जीभ मुख मांय, से सब क्षिण खुट जम खाय।
 मंत्र विध अनेकूं होय, माया सरूपी है शब्द दोय ॥ १ ॥
 कही सुणी कया सुंई होय, तहां लग चार काल की जोय। 
सूरत समझ मन के बस थाय, जब लग काल धरे मुख मांय ॥ २ ॥
 मन सुं गहया नेक न थुमे जोय, जो भी शब्द नही असल थाय।
यो इतना को कहिये मूल, तहां लग काल करम की चूल ॥ ३ ॥
 कह सुखदेव राम सो गाय, अरध शब्द देख्याज मांय। 
सूरत निरत मन बस नांय, सो सुण शब्द अखण्ड हम मांय ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (2)
 Sant sunjyo ho satshabd vichaar, akhand shabd soi tatt saar. ॥ Ter ॥
 Bole ben jeebh mukh maay, se sab kshin khut jam khaay.
 Mantra vidh anekun hoy, maaya sarupi hai shabd doy. ॥ 1 ॥
 Kahi suni kaya suni hoy, tahan lag chaar kaal ki joy. 
 Surat samajh man ke bas thaay, jab lag kaal dhare mukh maay. ॥ 2 ॥ 
Man sun gahaya nek na thume joy, jo bhi shabd nahi asal thaay.
 Yo itna ko kahiye mool, tahan lag kaal karam ki chool. ॥ 3 ॥
 Kah Sukhram Ram so gaay, ardh shabd dekhyaaj maay. 
 Surat nirat man bas naay, so sun shabd akhand hum maay. ॥ 4 ॥

 संतों से महाराज फरमाते हैं — सतशब्द का गहन विचार सुनो, जो शब्द अखण्ड (अनवरत, अविनाशी) है, वही ब्रह्म का "निज नाम" है। जो भी शब्द जीभ और मुख से उच्चरित होते हैं, वे केवल ध्वनि मात्र हैं — उनसे जन्म और मरण का चक्र समाप्त नहीं होता।अनेक प्रकार के मंत्रों के जप, ओंकार (ओऊं) और सोहं (सोऊं) जैसे साधन — ये सब माया के पद में आते हैं, इनसे मुक्ति नहीं मिलती।कथाएँ सुनना और कहना, या किसी भी धार्मिक कार्य को केवल परंपरा के अनुसार करना — ये सब भी काल के अधीन हैं।यहाँ तक कि जो लोग समझदारी और मन-ध्यान के आधार से साधन करते हैं, उन्हें भी काल निगल जाता है।जो शब्द मन को थामने से थोड़ी देर ठहर जाए, वह भी अस्थायी है — वह सतशब्द नहीं है।इन सब साधनों का आधार श्वांस (प्राणवायु) है, और जब तक साधन श्वांस के अधीन है, तब तक काल और कर्म से छुटकारा संभव नहीं।महाराज कहते हैं — जब मैंने सतगुरु की विधि से रामजी का भजन किया, तब मुझे उस आधे शब्द, अर्थात "ररंकार" का अनुभव हुआ।वह शब्द ऐसा है, जो सूरत, निरत और मन — तीनों के वश में नहीं आता। यह शब्द अनुभव से प्रकट होता है, किसी क्रिया या अभ्यास से नहीं।अब मुझे उस अखण्ड शब्द का लगातार अनुभव हो रहा है, जो सतशब्द है — वही सच्चा और अनन्त ध्वनि रूप परम तत्व है।इस अनुभव में ब्रह्माण्ड की सारी सीमाएं पार होती हैं, और चेतना पारब्रह्म से भी ऊपर,उसके अधर स्थान तक पहुँचने लगती है।यह अनुभव वही कर सकता है, जो सतगुरु की विधि से, मन और इन्द्रियों से परे शब्द की ध्वनि में लीन हो जाए। संतो से महाराज फरमाते हैं कि सतशब्द का विचार सुणो, जो शब्द अखण्ड है वो ही ब्रह्म का निज नाम है। मुंह से जीभ के द्वारा जो भी बचन बोलने में आते है उनसे जन्म मरण नहीं मिटता। अनेक तरह के मंत्रो से जप करने की विधि है व ओऊं सोऊं का साधन ये सब माया के पद में है। कथा करना व सुनना, कहे माफिक कोई भी काम करना, ये सब काल के वश में है, समझ कर सूरत व मन के आधार से साधन करने वालो को भी काल खा जाता है। मन के ठहराने से जो शब्द थोडी देर ठहर जाता है वो शब्द भी असत है, सतशब्द नहीं है। ये साधन श्वांसा के आधार से होते है। इन साधनो से काल कर्म से छुटकारा नहीं होता। महाराज फरमाते हैं कि सतगुरु विधि से रामजी का भजन कर उस आधे शब्द याने ररंकार का अनुभव किया, वो शब्द सूरत निरत मन के वश में नहीं है। उस शब्द का मुझे अखण्ड अनुभव हो रहा है। वो ही सतशब्द है। ब्रह्मण्ड व अनुभव हो रहा है। पार ब्रह्म से ऊपर अधर
Nahin ho in naam sam नहीं हो इण नांव सम_ हरजस पद राग बसन्त (१)

 नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥ 
 बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण। 
आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥ 
 करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।
 कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥ 
 पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।
 कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
 जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय। 
कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (1)
 Nahin ho in naam sam, bina guru bhed na tobhi paave gam. ॥ Ter ॥
 Ban madh jaay kar dharat dhyaan, chhode jagat got kul sarb aan.
 Aasan saaj aneka khud, nav dwaar rakhe sarvam moond. ॥ 1 ॥
 Karavrat jhaap deh kamla chad, parvat biche gufa tan baad.
 Kathhan tap deh ang gaal, phode bharam bhraant so agyaan paal. ॥ 2 ॥
 Padhe chahu ved so pandit hoy, sarodha saajh agam kahe koy.
 Kar le maand binaase aay, jo sunai shakal oor maay. ॥ 3 ॥ 
Jap tap kare aneka koy, punn ghar daya alekhe hoy.
 Kah Sukhram kaha kahun jod, bina Hari naam nahin kahun thod. ॥ 4 ॥

 निज नाम के बिना मोक्ष नहीं
 कोई भी साधन, परमात्मा के निज नाम के बराबर नहीं हो सकता। 
बिना सतगुरु द्वारा दिए गए अणभै ज्ञान के, इस सच्चे नाम की पहचान नहीं हो सकती।
इस संसार में अनेक लोग अपने गोत्र, कुल, परिवार को त्यागकर वनों में चले जाते हैं और वहां ध्यान करते हैं।
विभिन्न प्रकार के आसन लगाते हैं, नौ द्वारों को (इन्द्रियों को) बंद कर लेते हैं। 
कोई यह व्रत लेता है कि मैं नींद नहीं लूंगा, कोई अपने शरीर को काटकर उसे अपने ईष्ट को अर्पण कर देता है।कठिन तपस्या करके अपने शरीर को सुखा डालते हैं, कुछ पर्वतों की गुफाओं में निवास करते हैं।
कोई अपनी भ्रम-भ्रांति और अज्ञानता को छोड़ देता है, चारों वेदों को पढ़कर पंडित कहलाने लगता है।
कोई सरोधा साधता है (ज्योतिष विद्या) और भविष्यवाणी करने लगता है, कुछ लोग संसार को बनाने और बिगाड़ने का दावा करने लगते हैं। 
कोई ऐसा होता है जो एक बार सुनकर ही हृदय में सब कुछ धारण कर लेता है।
कोई जप-तप, व्रत-उपवास, और घर-घर में पुण्य, धर्म, दया और अक्षय फल की बात करता है।
महाराज फरमाते हैं — संसार में अनेक साधन हैं, उनकी गिनती संभव नहीं, लेकिन यदि उनमें परमात्मा का निज नाम न हो, तो मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।
ऐसे जीव चौरासी लाख योनियों में घूमते रहते हैं, और सच्चा उद्धार उन्हें कभी नहीं होता।
 

Thursday, November 20, 2025

Santo bhai o kyon mokh na jaave संतो भाई ओ क्यों मोख न जावे_हरजस पद राग मिश्रीत (२३) 

 संतो भाई ओ क्यों मोख न जावे, नांव बिना गत पावे ।। टेर ।। 
 गडरी सरभर गरीब न कोई, सिंघ सम नहीं सेंठा। वैश्या आस शकल की राखे, कोडी जुग सुं रूठा ॥ १ ॥
 कवो कडवी बांण बोले, मैना बैण सुं प्यारा। रासब रोडी ज्यां त्यां लोटे, अजिया कीच तज गारा ॥ २ ॥ 
 लुंकी बाघ बघेरा बन में, स्याल सुषा बोहो होई। बस्ती बीच स्वान रहे मिनकी, अर जगत रह लोई ॥ ३ ॥ 
 तिरिया समझ रमे सुख सेजा, कोही भोलप हुवे संगा। कह सुखराम थके गुण नांही, गरभ बंधे घट चंगा ॥ ४॥ 

Harjas Pad Raag Mishrit (23)
 Santo bhai o kyon mokh na jaave, naam bina gat paave. ॥ Ter ॥ 
Gadri sarbhar gareeb na koi, singh sam nahin sentha. 
 Vaishya aas shakal ki rakhe, kodi jug sun rootha. ॥ 1 ॥ 
Kavo kadvi baan bole, maina bain sun pyaara.
 Raasab rodi jyaan tyaan lote, ajia keech taj gaara. ॥ 2 ॥
 Lunki baagh baghera ban mein, syaal sushah boho hoi.
 Basti beech swaan rahe minki, ar jagat rah loi. ॥ 3 ॥
 Tiriya samajh rame sukh seja, kohi bholap huve sanga.
 Kah Sukhram thake gun naahee, garbh bandhe ghat changa. ॥ 4 ॥ 

मोक्ष की राह और सतगुरु भक्ति का रहस्य संतों से महाराज फरमाते हैं —
 लोग मोक्ष को क्यों नहीं प्राप्त कर पाते? क्योंकि बिना "निज नाम" (अंतरात्मा का सत्य ज्ञान) के किसी को भी मोक्ष नहीं मिलता।उदाहरण स्वरूप:गाड़र (भेड़) जैसा नम्र और सीधा प्राणी कोई नहीं।सिंह जैसा बलशाली भी कोई नहीं होता।वैश्या सदैव शरीर की सुंदरता पर आश्रित रहती है — उसी में उसकी आशा बंधी होती है।कोढ़ी मनुष्य को यह संसार और जीवन अच्छा नहीं लगता — उसे विकार से घृणा हो जाती है।कौवा कर्कश और कड़वी वाणी बोलता है, जबकि मैना मीठा बोलती है।गधा गंदगी (रोटी और कूड़े) पर कहीं भी लौटता फिरता है।बकरी कभी कीचड़ या गीली मिट्टी में खड़ी नहीं रहती — स्वभाव से साफ-सुथरी होती है।महाराज आगे संकेत देते हैं:जंगल में लोमड़ी, बाघ, बघेरा, श्याल, सुस्या आदि हिंसक जीव रहते हैं। लेकिन गांव के अंदर कुत्ता-बिल्ली और संसारी जीव रहते हैं — जो घर के वातावरण में रहते हुए भी भक्ति से दूर हैं।फिर महाराज एक गूढ़ संकेत देते हैं:स्त्री और पुरुष जब सुख की सेज (शारीरिक मिलन) में एक होते हैं, तो गर्भ की इच्छा न रखने पर भी गर्भ ठहर जाता है — क्योंकि संग (संपर्क) का प्रभाव प्रकट होकर ही रहता है।ठीक उसी तरह, जब सतगुरु की विधि से भजन किया जाता है, तो शब्द की जागृति होती है, और फिर आत्मा को "केः पद" व "आः पद" — अर्थात परम स्थिति और अमर ज्ञान — की प्राप्ति होती है।इसका सच्चा अनुभव केवल वही कर सकता है — जो वास्तव में भजन करता है, सतगुरु की बताई विधि से। संतो से महाराज फरमाते हैं कि ये मोक्ष क्यों नहीं जाते है। बिना निज नांव के किसी को भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। गाडर की बराबर कोई गरीब (नम्र) जानवर नहीं है, सिंह के बराबर कोई बलशाली नहीं है। वैश्या शकल की आशा रखती है। कोडी मनुष्य को जीना जगत में अच्छा नहीं लगता। कौवा कडवी व मैना मीठी वाणी बोलती है। गधा जहां तहां रोडी पर लौटता है। बकरी कीचड व गीली मिट्टी में खडी नहीं रहती है। जंगल में लोमडी बाघ बघेरा श्याल सुस्या बहुत होते है। गांव के अन्दर कुता बिल्ली व संसारी रहते है। स्त्री के साथ सुख सेज में गर्भ की इच्छा नहीं करते हुये भी गर्भ रह जाता है। महाराज फरमाते हैं कि साथ करने का गुण प्रकट हुये बिना नहीं रहता। ऐसे ही सतगुरु विधि से भजने पर शब्द की जागृति होकर केः पद आः पद की प्राप्ति होती है। इसका अनुभव भजन करने वालो को होता है।
Santo bhai bhev milya gam aave संतो भाई भेव मिल्या गम आवे_हरजस पद राग मिश्रीत (२२) 

 संतो भाई भेव मिल्या गम आवे, परम मोख पद पावे ॥ टेर ।। 
 राम नाम सब लोय कहत है, दर्शण भेष ऊचारे।
 हिकमत बिन तो राछ सुंरे, सबे पचे पच हारे ॥ १ ॥
 नित उठ दौड करत है भारी, गांव गेल नहीं जांणे।
 उजड गांव तोड पग बैठा, नगर सुख क्यूं मांणे ॥ २ ॥ 
 देह बिध धार सकल आवे, सब बाता सुणिया बिना ही आवे।
 कह सुखराम मोख राह झीणी, सतगुरु बिन क्यों पावे ॥ ३ ॥
 Harjas Pad Raag Mishrit (22) 
Santo bhai bhev milya gam aave, param mokh pad paave. ॥ Ter ॥ 
Ram naam sab loy kehat hai, darshan bhesh uchhaare. 
 Hikmat bin to raach sunre, sabe pache pach haare. ॥ 1 ॥
 Nit uth daud kart hai bhaari, gaav gel nahin jaane.
 Ujad gaav tod pag baitha, nagar sukh kyu maane. ॥ 2 ॥ 
Deh bidh dhaar sakal aave, sab baata suniya bina hi aave.
 Kah Sukhram mokh raah jheeni, satguru bin kyon paave. ॥ 3 ॥ 

भजन का भेद और मोक्ष की प्राप्ति संतों से महाराज फरमाते हैं कि — 
भजन करने का वास्तविक भेद और उसका सच्चा ज्ञान जब प्राप्त होता है, तभी परम मोक्ष की प्राप्ति संभव है।इस संसार में अनेक लोग राम-राम करते हैं, दरशनधारी हैं, बाह्य वेशधारी हैं — किन्तु राम-राम कैसे करना है, इसका भेद वे नहीं जानते। इसीलिए उन्हें सतशब्द की जागृति नहीं होती।यह स्थिति ऐसी ही है जैसे — बिना हिकमत (बुद्धिमत्ता) के राक्षस से बार-बार हार जाना। अर्थात — बिना विवेक और ज्ञान के जीवन व्यर्थ चला जाता है।जैसे कोई किसी गाँव में जाना चाहता है, लेकिन रास्ता ही नहीं जानता, तो चाहे वह कितना भी चलता रहे, वह गाँव कभी नहीं पहुँच सकता। वह तो उजाड़ (निर्जन) मार्ग में भटक रहा है — तो फिर गाँव तक पहुँचना और वहाँ का सुख कैसे पाएगा? ठीक वैसे ही, हर आत्मा शरीर धारण करके संसार में आती है, और जगत के सभी कार्यों में उलझ जाती है, बिना यह सुने, समझे कि उसका असली कार्य क्या है।महाराज कहते हैं: मोक्ष का मार्ग अत्यंत सूक्ष्म और झीना (सूक्ष्म/कोमल) है। बिना सतगुरु द्वारा दिया गया अणभै (निर्भय) ज्ञान धारण किए, उस राह पर चलना और मोक्ष पाना संभव नहीं है। संतो से महाराज फरमाते हैं कि भजन करने का भेद व उसका ज्ञान मिलने पर परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। सारा संसार दरसणी व सब भेखधारी राम राम करते है। राम राम कैसे करना चाहिये इसका भेद नहीं जानते, इसलिये सतशब्द की जागृति नहीं होती। यही बिना हिकमत के राछ से पच पच कर हारना है। जिस गांव में जाना है उसका रास्ता नहीं जानते। हमेशा चलते रहने पर भी नहीं पहुंचते है। उजाड में जा रहे है गांव में कैसे पहुंचेंगे व गांव में पहुंचने का सुख कैसे मिलेगा। शरीर धारण करके सब आते है व जगत के सब काम बिना सुणे ही आ जाते है। महाराज फरमाते हैं कि मोक्ष प्राप्ति का रास्ता तो बहुत झीणा है। सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण किये बिना उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है।
Shabd chetan deh chamke शब्द चेतन देह चमके_हरजस पद राग मिश्रीत (२१) 

 शब्द चेतन देह चमके, ईमरत मीठी सीर, नाड नाड न्यारी। 
सरब बोले जागो सहेर गंभीर, मूरली बाजे सुषमण तीर ।। १ ।। 
 हिरदे हल चल नाभ गूंजे, नेणा बंठा नीर।
 छेद प्याल पिछम कूं देख्या, परस्या जम का पीर ।। २ ।।
 बंध पिछम बोहोत भारी, मन मध मीठी पीर।
खांच खेंच कबाण चढे छतियां, फाटे चुव चीर ।। ३ ।। 
 अला पिंगला सुखमणा जागी, मिल तिरवेणी तीर। 
प्राण उलट आद घर आये, थके बैराट शरीर ।। ४ ।। 
 ध्यान लागो जोत देखी, सुषमण टपक्या हीर।
 दास सुखदेव अमर घर में, पीवे ईमरत सीर ।। ५ ।।
 Harjas Pad Raag Mishrit (21) 
Shabd chetan deh chamke, imrat meethi seer, naad naad nyaari. 
 Sarab bole jaago saher gambhir, murli baje sushman teer. ॥ 1 ॥ 
Hirde hal chal naabh goonje, nena bantha neer. 
 Ched pyaal pichham ku dekhiya, parsya jam ka peer. ॥ 2 ॥
 Bandh pichham bohot bhaari, man madh meethi peer.
 Khaan khench kabaan chadh chhatiyaan, faate chuv cheer. ॥ 3 ॥
 Ala pingla sukhmana jaagi, mil tirveni teer.
 Praan ulat aad ghar aaye, thake bairaat shareer. ॥ 4 ॥ 
Dhyaan laago jot dekhi, sushman tapkya heer. 
 Daas Sukhdev amar ghar mein, peeve imrat seer. ॥ 5 ॥ 

शब्द की जागृति और उसका अनुभव 
शब्द की जागृति जब चेतन (चैतन्य आत्मा) के द्वारा होती है, तो देह में प्रकाश (चमक) उत्पन्न होता है, और उस अनुभव से जो आनन्द आता है, वही ईमरत की मीठी सीर (अमरता की मधुर धारा) कहलाती है।जब समूचे शरीर की नाड़ियों-नाड़ियों में शब्द का अनुभव होता है, तो यह सभी इन्द्रियों का बोलना माना जाता है। शब्द की ध्वनियाँ जब भीतर गूंजती हैं, तो वह जैसे मुरली बजने के समान होती हैं।प्रेमभाव से किया गया भजन, हृदय में हलचल उत्पन्न करता है — यह अंदरूनी जागरण का प्रतीक है।नाभि में जब शब्द गूंजता है, तो यही “नाभि गुंजे” कहलाता है।विरह भाव से जब भजन होता है, तो नेत्रों से अश्रुधारा बहती है — यही "नेणा बुठा नीर" (आँखों से बहता प्रेम का जल) है।शेषजी और गणेशजी के स्थानों (ऊर्जा केन्द्रों) को छेदकर जब चेतना पश्चिम दिशा की ओर जाती है, तो इसे “पिछम को देखना” कहते हैं — अर्थात चेतना का सूक्ष्म मार्ग में प्रवेश।मेरुदण्ड (spinal cord) में जब शब्द का अनुभव होता है, तो वही “परस्या जम का पीर” (काल के दुख का अंत) कहलाता है।उत्तान पाद बंद (योग की क्रिया) से जब मेरुदण्ड पर प्रभाव पड़ता है, तो शरीर कमान की तरह खिंचता है, और यही अनुभूति है “छातियाँ फाटे, चुव चीर” — अर्थात हृदय विदीर्ण हो उठता है आनंद के वेग से।उस स्थिति में जब भीतर मन में आनन्द उठता है, तो वही “मन मध मीठी पीर” कहलाती है — एक मधुर दर्द, जो विरह और मिलन का संगम होता है।मेरुदण्ड में इड़ा और पिंगला दो धाराएँ चलती हैं, बीच में सुषुम्ना ऊपर सिर की ओर जाती है, और त्रिकुटी में इनका संगम होता है — यही सूक्ष्म ध्यान की संधि बिंदु है।जब प्राण, स्वांस और शरीर से चेतना अलग हो जाती है, तो जीव को "केः पद" (परम स्थिति) की प्राप्ति होती है — इसे ही “आद घर” (मूल निवास) कहा गया है। उस समय विराट शरीर (स्थूल देह) थक जाता है और छूटने लगता है।सुषुम्ना में शब्द का ध्यान ही “जोती का देखना” है — अर्थात अंतर की दिव्य ज्योति का दर्शन।इस अनुभव से जो आनन्द उठता है, वह “हीर टपकना” है — अमूल्य सुख-रूप मोती जैसे टपकते हैं।महाराज फरमाते हैं: जब आः पद (परम अवस्था) की प्राप्ति होती है, तो वही “ईमरत की सीर पीना” कहलाता है — अर्थात अमरता के अमृत का स्वाद प्राप्त होना। शब्द की जागृति का चेतन द्वारा अनुभव होना ही देह चमकना व उसका आनन्द आना ही ईमरत मीठी सीर है। सारे शरीर में नाड नाड में शब्द का अनुभव होना ही सबका बोलना है व शब्द की ध्वनियां होना ही मूरली बाजना है। प्रेम भाव से भजन करना ही हिरदे में हलचल होना है। नाभी में शब्द का गुंजार होना ही नाभ गुंजे है। विरह के साथ भजन करने से नेत्रो में पानी आना ही नेणा बुठा नीर है। शेषजी व गणेशजी के स्थानो को छेदकर पिछम में आना ही पिछम को देखना है। मेरूडण्ड पर शब्द का अनुभव होना ही परस्या जम का पीर है। पिछम में उतान पाद बंद मेरूडण्ड पर लगता है जिससे शरीर कबाण की तरह खिंचना ही छातियां फाटे चुव चीर है। उससे मन में खुशी होना ही मन मध मीठी पीर है। मेरूडण्ड से अला पिंगला चलती है, बीच में सुखमणा सिर पर होकर जाती है व त्रिकुटी में संगम हो जाता है। प्राणो व स्वांसा व शरीर से अलग होकर केः पद की प्राप्ति होना ही आद घर की प्राप्ति होना व बैराट शरीर का थकना है। शब्द का सुखमणा में ध्यान होना ही जोती का देखना है। आनन्द आना ही हीर टपकना है। महाराज फरमाते हैं कि आः पद की प्राप्ति होना ही ईमरत की सीर पीना है।
Satguru saancha shirjanhaar सतगुरु सांचा शिरजणहार_ हरजस पद राग मिश्रीत (२०)

 सतगुरु सांचा शिरजणहार। तुम जिम्या शिष सब सुख पावे, पूरण हुवे करपाल ।। टेर ।।
 जीमो ज्ञान कीमत शब्द चीजां, रेण रसोडे पाल। सूरत रांधण मन हजूरी, जिमो राम दयाल ।। १ ।।
 चोखा चेतन प्रेम पुडिया, सेज सोवन थाल। लाडू पेडा नांव निज तत, जिमो राम दयाल ।। २ ।। 
 समझ नारी राख पंखी, मत चकलो ढाल। निरत अंच्छया कवा देवे, जिमो राम दयाल ।। ३ ।।
 झरणा झारी लगन लोटो, चलु बैण बिसाल। प्रीत नारी हाथ पूंछे, जिम्या राम दयाल ।। ४ ।। 
 बेण बादल घटा उलटी, जिम मगन मतवाल । संत डकारे बोल अणभै, जिम्या राम दयाल ।। ५ ।। 
 दास सुखदेव शरण तुम्हारी, खावंद तुम प्रतिपाल । शीत प्रसादी मोहे दिज्यो, जिमो राम दयाल ।। ६ ।।

 Harjas Pad Raag Mishrit (20) Satguru saancha shirjanhaar. Tum jimya shish sab sukh paave, puran huve karpaal. ॥ Ter ॥ Jeemo gyaan keemat shabd cheezan, ren rasode paal. Surat raandhan man hajoori, jimo Ram Dayal. ॥ 1 ॥ Chokha chetan prem pudiya, sej sovan thaal. Laadu peda naam nij tatt, jimo Ram Dayal. ॥ 2 ॥ Samajh naari rakh pankhi, mat chaklo dhal. Nirat anchhyaa kawa deve, jimo Ram Dayal. ॥ 3 ॥ Jharna jhaari lagan loto, chalu bain bisaal. Preet naari haath poonche, jimya Ram Dayal. ॥ 4 ॥ Ben baadal ghata ulti, jim magan matwaal. Sant dakaare bol anbhai, jimya Ram Dayal. ॥ 5 ॥ Daas Sukhdev sharan tumhaari, khavand tum pratipaal. Sheet prasadi mohe dijyo, jimo Ram Dayal. ॥ 6 

 परमात्मा और सतगुरु से प्रार्थना 
हम परमात्मा और सतगुरु से विनम्र प्रार्थना करते हैं कि आपकी पूर्ण कृपा से सभी शिष्यों को सुख की प्राप्ति होती है और वे परम आनन्द का अनुभव करते हैं।शब्द ही वह अमूल्य वस्तु है, जिसका ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा धन है। ज्ञान के अनुसार जीवन जीना ही रसोई का पालन करना है। सूरत लगाकर प्रेमपूर्वक भजन करना ही रांधना कहलाता है। मन ही वह सेवक (चाकर) है, जो आपकी कृपा से नियंत्रित होता है। चित लगाकर, प्रेम से किया गया भजन ही चावल और पूड़ियाँ हैं। सहज भाव में सरलता से किया गया भजन ही सोने का थाल है। आपका निज नाम ही लड्डू और पेड़ा है—यही आपकी सच्ची कृपा है। समझ के साथ भजन करना, ऐसा है जैसे नारी के हाथ में पंखा हो। भक्ति में दृढ़ता रखना ही चकला-बेलन है। निरंतर ध्यान में रहना ही काव देना (परसने का कार्य) है। क्षमा को धारण करना ही झारी (छन्नी) है। लगन से भजन करना ही लोटा है। विस्तृत और मधुर वचन बोलना ही चलू (जल डालने का पात्र) है। प्रीति और श्रद्धा से भजन करना ही जैसे नारी का पूछना (स्नेह दिखाना) है। संतोष और गंभीर वचन ही घटा का उलटना है। भजन करने से जो आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त होती है, वही मगन मतवाला होना है। अणभै (निर्भयता) और सत्य के वचन बोलना ही संतों का डकारना है।महाराज कहते हैं: यह दास आपकी ही शरण में है, आप ही इसके स्वामी हैं। परमपद की प्राप्ति ही शीतल प्रसादी है और वही आपकी कृपा का चरम स्वरूप है। परमात्मा व सतगुरु से प्रार्थना कर रहे है कि आपकी पूर्ण कृपा से सब शिष्यो को सुख की प्राप्ति होती है व पूर्ण परमानन्द मिलता है। शब्द रूपी चीज का ज्ञान ही मूल्य है। ज्ञान के माफिक रहना ही रसोई पाल है। सूरत लगाकर भजन करना ही रांधना है। मन ही चाकर है यही आपकी कृपा है। चित लगा कर प्रेम से भजन करना ही चावल व पूडिये है। सहज में सरलता से भजन होना ही सोने का थाल है। आपका निज नाम ही लाडू पेडा है यही कृपा है। समझ के साथ भजन करना ही नारी का हाथ में पंखी रखना है। भक्ति में दृढता रखना ही चकला बेलन है। निरत याने अखण्ड ध्यान होना ही कवा देना है। क्षमा धारण करना ही झारी है। लग्न से भजन करना ही लोटा है। विशाल बचन बोलना ही चलु करना है। प्रीति के साथ भजन करना ही नारी का पूंछना है। बादल वचन ही, घटा उलटना है। भजन करने से प्रसन्नता होना ही मगन मतवाल है। अणभै के वचन बोलना ही संतो का डकारना है। महाराज फरमाते हैं कि यह दास आपकी शरण में है आप ही इसके स्वामी है। परमपद की प्राप्ति करना ही शीत प्रसादी व आपकी कृपा है।
Vaari vaari podho Ram Diyaal वारी वारी पोढो राम दियाल_हरजस पद राग मिश्रीत (१९)

 वारी वारी पोढो राम दियाल, तूं आय तूटे विषे जंजाल ।। टेर ।। 
 प्रेम पथरणो, ओकत समता की शाल। ज्ञान गदरो शील सीरक, पोढो राम दियाल ।। १ ।।
 वारी वारी जींवा के प्रतिपाल, सूरत कामण बाट जोवे, ध्यान ढोल्यो ढाल। 
आत्म सुन्दरी बोहत राजी, पोढो राम दियाल ।। २ ।। 
 छिम्या छंवरी चंवर चेतन, प्रीत पवन ढाल। 
जोग निद्रा बाट देखे, पोढो राम दियाल ।। ३ ।।
 छिम्या चादर पुनः पगाणो, दया की ओढो दुशाल।
 सत सिराणो सरस गीदूं, अब चांपे पांव नित पत, सब सुख जीता काल ।। ४ ।।
 दास सुखदेव शरण तुम्हारी, पोढो राम दियाल। जीवां के प्रतिपाल, पोढो राम दियाल ।। ५ ।। 
 Harjas Pad Raag Mishrit (19)
 Vaari vaari podho Ram Diyaal, tu aay toote vishe janjal. ॥ Ter ॥
 Prem pathrano, okat samta ki shaal. Gyaan gadro sheel seerak, podho Ram Diyaal. ॥ 1 ॥ 
Vaari vaari jeenwa ke pratipaal, surat kaaman baat jove, dhyaan dholyo dhal.
 Aatma sundari bohot raaji, podho Ram Diyaal. ॥ 2 ॥
 Chhimya chhanwari chanvar chetan, preet pawan dhal.
 Jog nidra baat dekhe, podho Ram Diyaal. ॥ 3 ॥ 
Chhimya chadar punah pagaano, daya ki odho dushal.
 Sat siraano saras geedun, ab chaampe paav nit pat, sab sukh jeeta kaal. ॥ 4 ॥
 Daas Sukhdev sharan tumhaari, Podho Ram Diyaal.
 Jeevaan ke pratipaal, Podho Ram Diyaal. ||5|| 

महाराज संतों से फरमाते हैं
शरीर में सतशब्द का अनुभव होना ही रामजी का पोढ़ना (प्रकट होना) है। भक्ति करने से ही जगत के विषयों और जंजाल से छुटकारा होता है।समता धारण करना ही "शील की ओढ़नी" है। ज्ञान ही गदरा (कंबल) है, शील ही रजाई है, और प्रेम ही पथरना (बिछावन) है।सूरत (आत्मिक चेतना) रूपी स्त्री परमात्मा का ध्यान कर रही है, यही बाट जोना (प्रतीक्षा करना) और ढोल्या ढालना (विनती करना) है।हे परमात्मा! आप जीवों की रक्षा करने वाले हैं — आपको बारंबार "धिन है, धिन है।"जब आत्मा को आनंद आता है, तो आत्म-सुंदरी अत्यंत प्रसन्न होती है।क्षमा ही चंवरी (छत्र) है, चिंतन ही चंवर (झलने वाली पंखी) है।प्रीत से भजन करना ही हवा करना है, अर्थात आत्मा को ठंडक और शांति देना।सत्ता समाधि होना ही जोग-निद्रा की बाट देखना है।क्षमा ही चादर है, पुण्य ही पैरों से पोंछने की पगड़ी (पगाना) है।घट में दया रखना ही दुशाला ओढ़ना है, और सतनाम की भक्ति करना ही सिर के नीचे तकिया लगाना है।हर समय आनंद का अनुभव होना ही सभी सुखों का आना, पाँव चापना और काल को जीतना है।महाराज अंत में कहते हैं: "मैं आपकी शरण में हूं, हे परमात्मा, आप ही जीवों की रक्षा करने वाले हैं।" शरीर में सतशब्द का अनुभव होना ही रामजी का पोढना है, भक्ति करने से ही जगत के विषयो व जंजाल से छुटकारा होता है। समता धारण करना ही शील का ओडना है। ज्ञान ही गदरा है। शील ही रजाई है व प्रेम ही पथरना है। सूरत रूपी स्त्री आपका ध्यान कर रही है। यही बाट जोना व ढोल्या ढालना है। परमात्मा जीवों की रक्षा करने वाले आपको धिन है धिन है। आत्मा को आनन्द आना ही आत्म सुन्दरी का बहुत राजी होना है। क्षमा ही चंवरी चिंतन ही चंवर है। प्रीत से भजन करना ही हवा करना है। सता समाधि होनी ही जोग निद्रा का बाट देखना है। क्षमा ही चादर है, पुन्न ही पैर पूछने का पगाना है। घट में दया रखना ही दुशाला ओढना है। सत नाम की भक्ति करना ही सिर के नीचे तकिया लगाना है। हर समय आनन्द का अनुभव होना ही सब सुख का आना, पांव चापना व काल का जीतना है। महाराज फरमाते हैं कि मैं आपकी शरण में हूं आप ही जीवों की रक्षा करने वाले है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...