Wednesday, October 14, 2026

जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं


हरजस पद राग मिश्रीत (५)  


संत सुखराम जी महाराज का यह हरजस अत्यंत तार्किक, दार्शनिक और सुरति-शब्द योग के सबसे बड़े रहस्य का उद्घाटन करने वाला है। इस पद में महाराज ने अद्वैत वेदांतियों और ज्ञानियों से सीधे और चुभते हुए सवाल किए हैं। यदि आत्मा 'ब्रह्म' ही है, तो वह सबसे पहले संसार में आई ही क्यों? यदि वह पहले ब्रह्म से अलग होकर जन्म-मरण में आ सकती है, तो साधना करके वापस ब्रह्म में मिलने के बाद भी वह पुनः संसार में क्यों नहीं आएगी? इस तर्क से महाराज सिद्ध करते हैं कि 'ब्रह्म-पद' अंतिम मोक्ष नहीं है; परम मोक्ष 'सतशब्द' (सार शब्द) से मिलने वाला 'आनंद पद' है, जहाँ से जीव कभी लौटकर नहीं आता।


संतो अरथ करे सो पूरा। सार शब्द कूं नहीं रे पिछाणे, रहे मोख सूं दूरा ।। टेर ।।

हे संतों! जो इस अणभै वाणी (सच्चे ज्ञान) का निरपेक्ष और यथार्थ 'अर्थ' (निर्णय) करता है, वही वास्तव में पूरा (पूर्ण ज्ञानी) है। जो साधक 'सार शब्द' (सतशब्द / निज नाम) की महिमा और शक्ति को नहीं पहचानता, वह चाहे कितना भी शास्त्र पढ़ ले या तपस्या कर ले, परम मोक्ष से हमेशा दूर ही रहता है।

पहला पद (सृष्टि के आरंभ का मूल प्रश्न)

आद पुरुष सूं हंस बिछडयो, क्या पाप पुन्न किया।

किण आधार गरभ में आया, तो ताड किणी ने दिया ।। १ ।।

महाराज ज्ञानियों से सृष्टि के आदि (शुरुआत) का सबसे बड़ा प्रश्न पूछते हैं— जब यह जीवात्मा (हंस) सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं, फिर उसने ऐसा कौन-सा पाप या पुण्य किया था जिसके कारण उसे संसार में आना पड़ा? किस आधार पर उसे पहली बार माता के गर्भ में भेजा गया? या फिर उसे वहाँ से किसने धक्का देकर (ताड़ कर) निकाल दिया?


दूसरा पद (कर्मों की उत्पत्ति का रहस्य)

करम वहां किया के यहां आय किया, के नेः करमी चल आयो।

कोण सो करम किणी ने लागे, तो काल किणी ने खायो ।। २ ।।

तर्क को आगे बढ़ाते हुए महाराज पूछते हैं कि उस जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था? क्या उसने परमात्मा के पास (ब्रह्म लोक में) रहकर कर्म किया, या इस संसार में आने के बाद पहला कर्म किया? या फिर वह 'निःकर्मी' (बिना किसी कर्म के) ही अपनी मर्जी से संसार में चला आया?

यदि वह अपनी मर्जी से आया, तो फिर कौन-सा कर्म किस आत्मा को लगा और 'काल' (मृत्यु) ने किसको अपना ग्रास बनाया? (अर्थात् ब्रह्म-ज्ञानियों के पास इस बात का कोई स्पष्ट और तार्किक उत्तर नहीं है)।


तीसरा और चौथा पद (ज्ञानियों के भ्रम पर प्रहार)

अती गम ज्ञानिया कूं नांही, समझ बिहूणा सारा।

काली त्रिया नार ने ब्याही, सो तुम करो विचारा ।। ३ ।।

सो ही वस्तु शकल घर मांही, सोई हाट में होई।

क्यूं पच-मरे मुक्त ने मूरख, रात दिवस मिल दोई ।। ४ ।।

महाराज स्पष्ट कहते हैं कि इन गूढ़ रहस्यों की 'गम' (समझ) साधारण ज्ञानियों को बिल्कुल नहीं है। वे सब बिना सच्ची समझ (समझ बिहूणा) के ही व्यर्थ का तर्क कर रहे हैं।

महाराज एक गहरा व्यंग्य (रूपक) देते हैं— "काली त्रिया नार ने ब्याही।"

ज्ञानियों का यह कहना कि 'आत्मा स्वयं ब्रह्म है और वह साधना करके वापस ब्रह्म में ही मिल जाएगी', यह बात बिल्कुल वैसी ही बेतुकी है जैसे कोई पागल स्त्री किसी दूसरी स्त्री से ही विवाह (ब्याह) रचा ले! (जब दोनों एक ही स्वरूप हैं, तो विवाह कैसा?)

महाराज कहते हैं कि जो वस्तु (ब्रह्म-स्वरूप) तुम्हारे घर (भीतर) पहले से ही मौजूद है, उसी को तुम हाट (बाजार / बाहरी साधनों) में क्यों ढूँढ रहे हो? यदि आत्मा स्वयं ब्रह्म ही है, तो फिर हे मूर्ख जीव! तू दिन-रात 'मुक्त' होने के लिए (साधना में) क्यों पच-पच कर मर रहा है?

अंतिम निष्कर्ष और परम सत्य (भावार्थ का सार)

इस पूरे हरजस का मूल सिद्धांत यह है कि यदि वेदों और ज्ञानियों के मतानुसार 'आत्मा ब्रह्म से आई है और वापस ब्रह्म में ही समा जाएगी', तो महाराज का अकाट्य तर्क है कि "जब वह पहले बिना किसी कर्म के ब्रह्म से बिछड़कर संसार में आ गई थी, तो साधना करके वापस ब्रह्म में मिलने के बाद, वह दोबारा संसार में क्यों नहीं आएगी?" (अर्थात् आवागमन का चक्र तो ब्रह्म-पद में भी चलता ही रहेगा)।

इसलिए, महाराज यह सिद्ध करते हैं कि ब्रह्म-पद भी परम विश्राम नहीं है। आवागमन को हमेशा के लिए मिटाने का एकमात्र उपाय 'सार शब्द' (सतस्वरूप / आनंद पद) की प्राप्ति है। जो सुरति सतशब्द के द्वारा उस केवल पद में समा जाती है, वह वहाँ से लौटकर फिर कभी संसार या माता के गर्भ में नहीं आती।


Tuesday, October 13, 2026

जन्मों-जन्मों के कर्मों का पहाड़ कैसे नष्ट होगा?

 


 सुखराम जी महाराज ने अध्यात्म के सबसे जटिल विषय— 'कर्म-सिद्धांत' (Law of Karma)— को एक बहुत ही अद्भुत और ठेठ ग्रामीण दृष्टांत (किसान और अनाज के उदाहरण) के माध्यम से समझाया है।


साधकों का सबसे बड़ा प्रश्न होता है कि जन्मों-जन्मों के कर्मों का पहाड़ कैसे नष्ट होगा? महाराज यहाँ स्पष्ट करते हैं कि कर्मों को एक-एक करके नहीं काटा जा सकता; उन्हें नष्ट करने के लिए केवल 'अखंड भजन' की बाढ़ लानी पड़ती है।


भजना रे प्राणियां, क्या अरथ विचारे। पढिया गुणया माने नहीं, जम जंवरो मारे ॥ टेर ॥

हे प्राणी! तू केवल उस राम-नाम का 'भजन' कर। शास्त्रों के पन्ने पलट कर तू और क्या व्यर्थ के 'अर्थ' (तर्क-वितर्क) विचार रहा है?


जो लोग केवल पोथियां पढ़कर स्वयं को ज्ञानी (पढ़िया-गुण्या) मान लेते हैं, लेकिन भजन (प्रैक्टिकल साधना) नहीं करते, उनकी इस थोथी विद्या को यमराज नहीं मानता। अंत समय में उन्हें यमदूतों (जंवरो) की भयंकर मार खानी ही पड़ती है। ज्ञान यदि आचरण (भजन) में न उतरे, तो वह व्यर्थ है।


पहला और दूसरा पद (कर्मों का जाल और मुक्ति की शर्त)

तीन ताछ का करम है, जीवन के लारा। चवदा तीनूं लोक में, करमा बस सारा ॥ १ ॥

प्रालब्द क्रिये सही, संचित बोहो भारी। या तीनां ने काटसी, तब मिले मुरारी ॥ २ ॥


 इस ब्रह्मांड के चौदह भुवनों और तीन लोकों (स्वर्ग, मृत्यु, पाताल) में जो भी प्राणी है, वह सब 'कर्मों के वश' में है। हर जीव के पीछे (लारा) तीन प्रकार के कर्म लगे हुए हैं:

प्रारब्ध (Destiny): वह कर्म जो इस जन्म में सुख-दुःख के रूप में भोगने के लिए मिला है।

संचित (Accumulated): पिछले अनंत जन्मों के कर्मों का वह भारी गोदाम, जो अभी भोगने के लिए परिपक्व नहीं हुआ है (अंतर्मन में दबा है)।

क्रियमाण (Current Actions): वे नए कर्म जो हम वर्तमान में अपने संकल्प-विकल्प और शरीर से कर रहे हैं।

जब तक जीव इन तीनों कर्मों के जाल को पूरी तरह 'काट' (नष्ट) नहीं देता, तब तक उसे 'मुरारी' (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं हो सकती।


तीसरा से पाँचवाँ पद (किसान का दृष्टांत - कर्मों का संचय)

काटण की बिद सांभलो, दिष्टांग बताऊं। ओक मोटो कृष्यण थो, तांको धन गाऊं ॥ ३ ॥

एक साल में निपनो, मण एक हजारा। तां धरबा के कारणे, ऐसे विध विचारा ॥ ४ ॥

सो मण घरां पठावियो, नव सो मण लारा। ताकूं खो में गाडियो, असा जतन विचारा ॥ ५॥


अब महाराज कर्म काटने की 'विधि' एक किसान (कृष्यण) के 'दृष्टांत' (उदाहरण) से समझाते हैं:

एक किसान के खेत में 1000 मण अनाज पैदा हुआ। उसने उसे सँभालने की एक युक्ति निकाली। उसने 100 मण अनाज अपने खाने के लिए 'घर' भेज दिया और बचे हुए 900 मण अनाज को भविष्य के लिए एक 'खो' (गहरी खाई) में गाड़ कर सुरक्षित कर दिया।

(यौगिक अर्थ: यहाँ 100 मण अनाज हमारा 'प्रारब्ध' है जो इस जन्म में भोगने के लिए मिला है। और 900 मण अनाज हमारा 'संचित कर्म' है जो कारण-शरीर (खाई) में अनंत जन्मों के लिए दबा पड़ा है)।


छठा से आठवाँ पद (अखंड वर्षा और बीजों का नाश)

धुर अषाढा ओलरियो, बिरखा बोह भारी। चार महिना बरसियो, नहीं आंख उगाडी ॥ ६ ॥

खो को खो में गल गयो, हल जूत न पाया। घर को घर में पीस के, सब खाय खुटाया ॥ ७ ॥

एक कण नहीं निबरियो, टोटा भल आया। इस विध करम कटावज्यो, पांडे सुण भाया ॥ ८ ॥


आषाढ़ के महीने में अत्यंत भयंकर 'बरखा' (बारिश) शुरू हुई। लगातार चार महीने तक ऐसी झड़ी लगी कि आसमान ने आँख ही नहीं खोली (सूरज नहीं निकला)।

इस अखंड बारिश का परिणाम क्या हुआ?

संचित नष्ट: जो 900 मण अनाज खाई (खो) में दबा था, वह पानी भर जाने से वहीं 'गल' (सड़) गया, उग नहीं पाया।

क्रियमाण रुका: खेत में इतना कीचड़ हो गया कि किसान नया हल जोत ही नहीं पाया (नया बीज नहीं बो सका)।

प्रारब्ध समाप्त: जो 100 मण अनाज घर में था, बारिश में घर बैठे-बैठे उसे पीसकर खा लिया।

अंत में किसान के पास एक 'कण' (दाना) भी नहीं बचा। महाराज कहते हैं कि हे ज्ञानी भाई! इसी विधि से तुम्हें भी अपने कर्म कटवाने हैं।


नवाँ पद (भजन की अखंड झड़ी)

आठ पोहर चौसठ घडी, रसना जड लागे। सुण पांडे सुखराम कह, तब तीनूं भागे ॥ ९ ॥


अब महाराज उस दृष्टांत का रहस्य (Application) खोलते हैं। जिस प्रकार बादलों ने चार महीने की अखंड झड़ी लगाई, उसी प्रकार हे साधक! जब तेरी 'रसना' (जिह्वा और सुरति) आठों प्रहर और चौंसठों घड़ी (अर्थात् 24/7) सतशब्द रूपी राम-नाम की 'झड़ी' (अखंड रटन/भजन) लगा देगी, तब क्या होगा?

भीतर सतशब्द की अखंड वर्षा से तेरा 'संचित कर्म' कारण-शरीर में ही जलकर भस्म हो जाएगा। तेरी सुरति परमात्मा में ऐसी लीन होगी कि संसार का कोई नया 'क्रियमाण' कर्म बनेगा ही नहीं। और बचा हुआ 'प्रारब्ध' इस शरीर के रहते-रहते कट जाएगा। तब ये तीनों कर्म तुझे छोड़कर हमेशा के लिए 'भाग' जाएंगे और मोक्ष मिल जाएगा।

सार:

कर्मों को एक-एक करके भोगा नहीं जा सकता, उन्हें केवल 'नाम की अग्नि/वर्षा' (अखंड रटन/भजन) में सामूहिक रूप से नष्ट (Delete) किया जा सकता है।

Wednesday, October 7, 2026

औसा जन कोई। होणकाल ईश्वर सूं आगे, ज्ञान बतावे मोई

 


अधिकांश साधक 'सृष्टि के रचयिता' (ईश्वर/ब्रह्मा) तक पहुँचने को ही मोक्ष मान लेते हैं। परंतु महाराज इस पद में यह परम सत्य उद्घाटित करते हैं कि जो ईश्वर सृष्टि बनाता है, वह स्वयं 'काल' (समय और महाप्रलय) के अधीन है। सच्चा मोक्ष (आनंद पद) ब्रह्मा, काल और माया—इन तीनों की सीमाओं से पार जाने पर ही मिलता है।

औसा जन कोई। होणकाल ईश्वर सूं आगे, ज्ञान बतावे मोई ।। टेर ।।

 महाराज एक सच्चे साधक की तड़प को व्यक्त करते हुए पूछते हैं कि क्या इस संसार में ऐसा कोई पूर्ण संत (केवली भगवंत) है, जो मुझे उस 'ईश्वर' (सृष्टि कर्ता) और 'काल' (महाप्रलय/समय) से भी आगे (परे) के लोक का ज्ञान बता सके? अर्थात्, मुझे वह ज्ञान चाहिए जो जन्म-मरण के इस पूरे चक्र से ही हमेशा के लिए बाहर निकाल दे।

पहला पद (त्याग और वैराग्य की सीमा)

राजा है जे कोई ज्ञान त्याग ले ध्यावे, तिके काल मुख मांई।

                                             वांकी संगत परम मोक्ष नहीं, हंसो किस विध जाई ।। १ ।।

 महाराज (संबोधन करते हुए) कहते हैं कि हे राजा! यदि कोई संन्यासी केवल घर-बार का 'त्याग' करके ज्ञान और ध्यान की बातें करता है, तो याद रखना कि केवल बाहरी त्याग से जन्म-मरण नहीं मिटता; वह साधक अभी भी 'काल के मुख' (मृत्यु के चक्र) में ही बैठा है। ऐसे ज्ञानियों की संगति करने से कभी 'परम मोक्ष' नहीं मिल सकता। बिना सतशब्द के, यह जीवात्मा रूपी 'हंस' उस परम धाम तक किस विधि से जा सकता है? (अर्थात् नहीं जा सकता)।

दूसरा पद (सृष्टिकर्ता की भक्ति की सीमा)

जे कोई ज्ञान बतावे करता, पैदा करंदा भाई। 

 ओ सब ज्ञान काल का मुख में, न्याव करो ओ आई ।। २ ।।

 जो गुरु तुम्हें केवल उस 'कर्ता' (ब्रह्मा/ईश्वर) की भक्ति का ज्ञान बताते हैं, जो इस संसार को 'पैदा' (उत्पन्न) करता है, वह ज्ञान भी अपूर्ण है। क्योंकि जो पैदा करता है, वह नष्ट भी करता है, और जहाँ उत्पत्ति-विनाश है, वहाँ काल (मृत्यु) का राज है। इसलिए यह सृष्टिकर्ता का ज्ञान भी 'काल के मुख' में ही है। अपने विवेक से इस बात का सच्चा न्याय (विचार) करके देखो।

तीसरा पद (हठयोग और तपस्या की सीमा)

क्रिया कला जप तप साधन, कुंची मुद्रा गावे। पेलो छेह काल का मुख में, परम मोक्ष नहीं जावे ।। ३ ।।

 जो लोग शारीरिक क्रियाएँ, जप, तप, कठोर साधन और हठयोग की 'कुंची मुद्रा' (खेचरी, मूलबंध आदि यौगिक मुद्राएँ) लगाकर साधना करते हैं, वे सिद्धियाँ पाकर अपने शरीर की आयु तो बढ़ा लेते हैं, परंतु महाप्रलय आने पर उन्हें भी शरीर छोड़ना ही पड़ता है (पेलो छेह)। ये सारी क्रियाएँ भी अंततः काल के मुख में ही समा जाती हैं; इनसे आत्मा परम मोक्ष (आनंद पद) में नहीं जा सकती।

चौथा पद (ब्रह्म और माया का सत्य)

घणी बात थोडी में केवं, सुण लिज्यो नर नारी। ब्रह्म काल माया सब चारो, देखो ज्ञान बिचारी ।। ४ ।।

महाराज कहते हैं कि मैं बहुत लंबी-चौड़ी बात को थोड़े से शब्दों में समेट कर कह रहा हूँ, हे संसार के नर-नारियों, ध्यान से सुन लो! यह परब्रह्म (निराकार सत्ता), काल (समय/परिवर्तन) और माया (प्रकृति)—ये सब के सब एक दायरे में बँधे हुए हैं और इनमें जीव का आवागमन (जन्मना-मरना) बना रहता है। अपने शुद्ध ज्ञान और विवेक से विचार करके देखो, तो तुम्हें यह सत्य समझ आ जाएगा।

पाँचवाँ पद (परम मोक्ष / केवल पद का मार्ग)

कह सुखराम काल सूं बारे, जे जन सत पद पावे। 

हद कूं छाड तजे बेहद कूं, ब्रह्म ऊलंग हंस जावे ।।५।।

 अंत में संत सुखराम जी महाराज उस सर्वोच्च मंजिल का वर्णन करते हैं जो 'काल की पहुँच से बाहर' (काल सूं बारे) है। जन्म-मरण से पूर्णतः मुक्त वही जन होता है, जो 'सत पद' (सतस्वरूप / आनंद पद) की प्राप्ति कर लेता है। इस अवस्था तक पहुँचने के लिए जीवात्मा (हंस) को पहले 'हद' (तीन लोक / भौतिक और सूक्ष्म जगत) को छोड़ना पड़ता है, फिर 'बेहद' (ब्रह्म लोक / शून्य और निराकार अवस्था) का भी त्याग करना पड़ता है। जब सुरति इस ब्रह्म-पद को भी लांघकर (ऊलंग कर) आगे निकल जाती है, तब वह परम मोक्ष (केवल पद) में विलीन होती है।

यह हरजस सुरत-शब्द योग का वह सर्वोच्च शिखर है, जहाँ पहुँचकर साधक को यह स्पष्ट हो जाता है कि सिद्धियाँ, स्वर्ग, यहाँ तक कि ब्रह्म-लोक भी अंतिम पड़ाव नहीं हैं; अंतिम विश्राम केवल 'सतस्वरूप' में है।

  


नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥ 
  बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण।                                                                आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥
 करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।                                                                            कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥
 पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।                                                                             कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय।                                                                                      कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥ 
 
  

यह पद उन योगियों, तपस्वियों और विद्वानों के कठोर साधनों का वर्णन करता है, जिन्हें संसार बहुत ऊँचा मानता है। परंतु महाराज स्पष्ट करते हैं कि बिना 'सतगुरु के भेद' और 'सतशब्द' (निज नाम) की कमाई के, ये सारे महान लगने वाले साधन भी परम मोक्ष देने में पूरी तरह असमर्थ हैं।

नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥
हे साधकों! इस संसार या परलोक का कोई भी साधन, तप या पुण्य इस 'निज नाम' (सतशब्द) के बराबर नहीं है। और सबसे बड़ी शर्त यह है कि यह निज नाम बिना पूर्ण सतगुरु के 'भेद' (सत्य-विधि) के प्राप्त नहीं किया जा सकता, न ही इसकी सच्ची 'गम' (रहस्य और अनुभव) भीतर प्रकट हो सकती है।

पहला पद (हठयोग और वैराग्य का खंडन)
बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण।
आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥
लोग संसार, अपना गोत्र, परिवार और समाज की सारी मर्यादाओं (आण) को छोड़कर घने जंगलों (वन) में जाकर ध्यान लगाते हैं। वे स्वयं को कष्ट देकर अनेक प्रकार के कठिन 'आसन' सिद्ध करते हैं और हठयोग के द्वारा अपने शरीर के नौ द्वारों (आँख, कान, नाक, गुदा आदि) को पूरी तरह से बंद (मूंद) कर लेते हैं, ताकि प्राण बाहर न जाएं। (परंतु सतशब्द के बिना यह शारीरिक कष्ट मोक्ष नहीं दे सकता)।

दूसरा पद (कठोर तपस्या और शरीर गलाने की व्यर्थता)
करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।
कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥
कोई साधक नींद न लेने का कठोर व्रत धारण कर लेता है, या अपने शरीर के अंगों को काटकर अपने इष्ट देव पर चढ़ा देता है (कमला चाड़)। कोई ऊंचे पर्वतों की कंदराओं (गुफाओं) में अपने शरीर को कैद (बाड़) कर लेता है। वे इतनी कठोर तपस्या करते हैं कि उनका शरीर सूख कर गल जाता है, यह सोचकर कि ऐसा करने से उनके अज्ञान, भरम और भ्रांति की 'पाल' (दीवार) टूट जाएगी। (परंतु अज्ञान शरीर को सुखाने से नहीं, बल्कि नाम की जागृति से मिटता है)।

तीसरा पद (वेद-ज्ञान, भविष्य-कथन और सिद्धियों की सीमा)
पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।
कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
कोई व्यक्ति चारों वेदों को पढ़कर बहुत बड़ा ज्ञानी (पंडित) बन जाता है। कोई 'स्वरोदय विज्ञान' (सरोधा / श्वासों का योग) या ज्योतिष साधकर 'अगम' (भविष्य) की बातें बताने लगता है।
किसी के पास ऐसी चमत्कारी सिद्धियाँ आ जाती हैं कि वह अपने वचन मात्र से संसार की रचना कर दे या उसे मिटा (बिणासे) दे। या कोई इतना तीव्र बुद्धि वाला श्रुतिधर बन जाए कि जो कुछ एक बार सुने, उसे ज्यों का त्यों अपने हृदय (उर) में धारण कर ले। (ये सब सिद्धियाँ और ज्ञान माया के ही दायरे में हैं, मोक्ष के नहीं)।

चौथा पद (कर्मकांड और निज नाम की अनिवार्यता)
जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय।
कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥
संसार में लोग अनेक प्रकार के जप, तप करते हैं। घर-घर में असीमित (अलेखे) दान, पुण्य, धर्म और जीवों पर दया करते हैं।
अंत में संत सुखराम जी महाराज दोनों हाथ जोड़कर कहते हैं कि मैं और कहाँ तक गिनती करूँ? सच्चाई केवल इतनी है कि परमात्मा के 'हरि नाम' (सतशब्द) की कमाई के बिना, इन सब कर्मों से चौरासी लाख योनियों से बचने का कोई 'ठौर' (ठिकाना या मोक्ष) नहीं है।
सार:
यह हरजस सुरत-शब्द योग की सर्वोच्चता का परम उद्घोष है। हठयोग, शरीर को सुखाना, वेदों का ज्ञान, भविष्य बताना, दान-पुण्य और चमत्कारी सिद्धियाँ—ये सब 'शुभ कर्म' या 'माया के खेल' तो हो सकते हैं, परंतु मोक्ष का सीधा पासपोर्ट केवल 'सतगुरु का भेद' और भीतर 'सतशब्द का प्रकटीकरण' ही है।

हरजस पद राग बसन्त (१) नहीं हो इण नांव सम

 

नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥ 
  बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण।                                                                आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥
 करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।                                                                            कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥
 पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।                                                                             कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय।                                                                                      कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥ 
 
  

यह पद उन योगियों, तपस्वियों और विद्वानों के कठोर साधनों का वर्णन करता है, जिन्हें संसार बहुत ऊँचा मानता है। परंतु महाराज स्पष्ट करते हैं कि बिना 'सतगुरु के भेद' और 'सतशब्द' (निज नाम) की कमाई के, ये सारे महान लगने वाले साधन भी परम मोक्ष देने में पूरी तरह असमर्थ हैं।

नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥
हे साधकों! इस संसार या परलोक का कोई भी साधन, तप या पुण्य इस 'निज नाम' (सतशब्द) के बराबर नहीं है। और सबसे बड़ी शर्त यह है कि यह निज नाम बिना पूर्ण सतगुरु के 'भेद' (सत्य-विधि) के प्राप्त नहीं किया जा सकता, न ही इसकी सच्ची 'गम' (रहस्य और अनुभव) भीतर प्रकट हो सकती है।

पहला पद (हठयोग और वैराग्य का खंडन)
बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण।
आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥
लोग संसार, अपना गोत्र, परिवार और समाज की सारी मर्यादाओं (आण) को छोड़कर घने जंगलों (वन) में जाकर ध्यान लगाते हैं। वे स्वयं को कष्ट देकर अनेक प्रकार के कठिन 'आसन' सिद्ध करते हैं और हठयोग के द्वारा अपने शरीर के नौ द्वारों (आँख, कान, नाक, गुदा आदि) को पूरी तरह से बंद (मूंद) कर लेते हैं, ताकि प्राण बाहर न जाएं। (परंतु सतशब्द के बिना यह शारीरिक कष्ट मोक्ष नहीं दे सकता)।

दूसरा पद (कठोर तपस्या और शरीर गलाने की व्यर्थता)
करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।
कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥
कोई साधक नींद न लेने का कठोर व्रत धारण कर लेता है, या अपने शरीर के अंगों को काटकर अपने इष्ट देव पर चढ़ा देता है (कमला चाड़)। कोई ऊंचे पर्वतों की कंदराओं (गुफाओं) में अपने शरीर को कैद (बाड़) कर लेता है। वे इतनी कठोर तपस्या करते हैं कि उनका शरीर सूख कर गल जाता है, यह सोचकर कि ऐसा करने से उनके अज्ञान, भरम और भ्रांति की 'पाल' (दीवार) टूट जाएगी। (परंतु अज्ञान शरीर को सुखाने से नहीं, बल्कि नाम की जागृति से मिटता है)।

तीसरा पद (वेद-ज्ञान, भविष्य-कथन और सिद्धियों की सीमा)
पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।
कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
कोई व्यक्ति चारों वेदों को पढ़कर बहुत बड़ा ज्ञानी (पंडित) बन जाता है। कोई 'स्वरोदय विज्ञान' (सरोधा / श्वासों का योग) या ज्योतिष साधकर 'अगम' (भविष्य) की बातें बताने लगता है।
किसी के पास ऐसी चमत्कारी सिद्धियाँ आ जाती हैं कि वह अपने वचन मात्र से संसार की रचना कर दे या उसे मिटा (बिणासे) दे। या कोई इतना तीव्र बुद्धि वाला श्रुतिधर बन जाए कि जो कुछ एक बार सुने, उसे ज्यों का त्यों अपने हृदय (उर) में धारण कर ले। (ये सब सिद्धियाँ और ज्ञान माया के ही दायरे में हैं, मोक्ष के नहीं)।

चौथा पद (कर्मकांड और निज नाम की अनिवार्यता)
जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय।
कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥
संसार में लोग अनेक प्रकार के जप, तप करते हैं। घर-घर में असीमित (अलेखे) दान, पुण्य, धर्म और जीवों पर दया करते हैं।
अंत में संत सुखराम जी महाराज दोनों हाथ जोड़कर कहते हैं कि मैं और कहाँ तक गिनती करूँ? सच्चाई केवल इतनी है कि परमात्मा के 'हरि नाम' (सतशब्द) की कमाई के बिना, इन सब कर्मों से चौरासी लाख योनियों से बचने का कोई 'ठौर' (ठिकाना या मोक्ष) नहीं है।
सार:
यह हरजस सुरत-शब्द योग की सर्वोच्चता का परम उद्घोष है। हठयोग, शरीर को सुखाना, वेदों का ज्ञान, भविष्य बताना, दान-पुण्य और चमत्कारी सिद्धियाँ—ये सब 'शुभ कर्म' या 'माया के खेल' तो हो सकते हैं, परंतु मोक्ष का सीधा पासपोर्ट केवल 'सतगुरु का भेद' और भीतर 'सतशब्द का प्रकटीकरण' ही है।

Sunday, October 4, 2026

जीव बसे किस ठौड, निकस कहां जायगो।हरजस पद (१३)हरजस पद (१४)

 


संत सुखराम जी महाराज के साहित्य में यह 'प्रश्नोत्तरी' (Question-Answer) शैली अत्यंत अनूठी और तत्व-ज्ञान से परिपूर्ण है। यहाँ हरजस १३ में एक सच्चे जिज्ञासु (अथवा स्वयं साधक की अंतरात्मा) ने मोक्ष-मार्ग के सबसे गूढ़ और मूलभूत प्रश्न उठाए हैं। साथ ही यह चुनौती भी दी है कि जो गुरु इन प्रश्नों का सटीक उत्तर न दे सके, वह सच्चा सतगुरु नहीं हो सकता। इसके तुरंत बाद हरजस १४ में महाराज ने अपने पूर्ण अनुभव (अणभै ज्ञान) के आधार पर इन सभी रहस्यों का पर्दाफाश किया है।

          भाग १: हरजस पद (१३) - जिज्ञासु के परम प्रश्न

      (जीवात्मा का रहस्य)

जीव बसे किस ठौड, निकस कहां जायगो।

ओ तन छाड्या हंस, कहो काहा खायगो ।। १ ।।

 हे गुरुदेव! यह जीवात्मा (जीव) इस शरीर में किस स्थान (ठौर) पर निवास करती है? जब यह शरीर से निकलती है, तो कहाँ जाती है? और इस स्थूल शरीर को छोड़ने के बाद यह 'हंस' (आत्मा) वहाँ सूक्ष्म लोक में क्या खाता है (अर्थात् इसका पोषण कैसे होता है)?

               दूसरा पद (परमात्मा का रहस्य):

यांको अरथ विचार, भगत सो कीजिये।

शीव बसे किण जाग, भेद ओ दीजिये ।। २ ।।

 हे साधक! पहले इन बातों का अर्थ और विचार कर, फिर भक्ति में लग। हे गुरुदेव! मुझे यह गूढ़ भेद (रहस्य) बताइए कि वह परम 'शिव' (पारब्रह्म परमात्मा) इस शरीर में किस जगह (जाग) निवास करता है?

                               तीसरा पद       

           (सतशब्द का स्वरूप और सच्चे गुरु की कसौटी):

शब्द कोहो किण रूप, अरथ ओ कीजिये।

नितर करूं गुरु और, समझ गम लीजिये ।। ३ ।।

 मुझे यह समझाइए कि जिस 'सतशब्द' (निज नाम) की आप महिमा करते हैं, उसका 'रूप' (आकार/स्वरूप) कैसा है? एक सच्चे जिज्ञासु की भाँति वह कहता है कि मेरे इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दीजिए, 'नहीं तो मैं कोई और गुरु धारण कर लूँगा' (नितर करूं गुरु और)। अर्थात्, जो गुरु इन आध्यात्मिक रहस्यों का ज्ञाता न हो, उसकी शरण में जाने से मोक्ष नहीं मिल सकता।

              चौथा पद (सिमरन की विधि)

शिवरण को घर कोण, किसी राह ध्याइये।

कह सुखराम हरि नाम, निरख किम पाइये ।। ४ ।।

 परमात्मा के सिमरन (भजन) का असली 'घर' (आधार/स्थान) कौन सा है? और किस 'रास्ते' से उस परमात्मा का ध्यान करना चाहिए? संत सुखराम जी कहते हैं कि उस हरि के नाम को भीतर कैसे खोजकर (निरख) प्राप्त किया जा सकता है?

                   भाग २: हरजस पद (१४)   

                       सतगुरु द्वारा परम समाधान (उत्तर)

संत सुखराम जी महाराज ने इन सभी प्रश्नों के अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक (योग-सम्मत) उत्तर दिए हैं:

१. जीव का निवास, गमन और आहार (पहले प्रश्न का उत्तर):

जीव को कंठ स्थान है, निकस वासना जहां जावेगा। 

     ओ तन छोड़ जीव, कीयो फल खावसी ।।

निवास: जाग्रत अवस्था में इस जीवात्मा (जीव) का मुख्य निवास 'कंठ कमल' (गले के चक्र) में होता है (जहाँ से वाणी और संकल्प उठते हैं)।

गमन: मृत्यु के बाद यह जीव वहीं जाता है, जहाँ इसकी 'वासना' (इच्छाएँ और मोह) अटकी होती है। यदि धन में वासना है तो साँप बनेगा, परिवार में है तो उसी घर में पशु-पक्षी बनेगा। वासना ही इसकी अगली योनि तय करती है।

आहार: शरीर छोड़ने के बाद यह आत्मा स्थूल भोजन नहीं खाती, बल्कि जीवन भर जो इसने पाप-पुण्य रूपी कर्म किए हैं, यह उन्हीं कर्मों का 'फल खाती है' (अर्थात् स्वर्ग-नरक या चौरासी लाख योनियों का सुख-दुःख भोगती है)।

२. परमात्मा (शिव) का निवास (दूसरे प्रश्न का उत्तर):

शीव बसे सो जाग दशवों द्वार छे।

परमात्मा का स्थान:वह परम शिव (परमात्मा/कैवल्य सत्ता) इस शरीर के भीतर सबसे ऊँचे शिखर अर्थात् 'दशम द्वार' (ब्रह्मरंध्र / भृकुटी के ऊपर गगन मंडल) में निवास करता है। जब सुरति नौ द्वारों (आँख, कान, नाक आदि) को छोड़कर दसवें द्वार में प्रवेश करती है, तभी उस परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

३. सतशब्द का स्वरूप (तीसरे प्रश्न का उत्तर):

शबद सो रूप, पोप वास जैसो है।।

शब्द का स्वरूप: यह योग-साधना का सबसे सुंदर रूपक है। महाराज कहते हैं कि उस 'सतशब्द' (निज नाम) का स्वरूप वैसा ही है जैसे किसी फूल (पोप/पुष्प) में बसी हुई सुगंध (वास)। जिस प्रकार फूल की सुगंध को देखा या पकड़ा नहीं जा सकता, उसका कोई रंग-रूप नहीं होता, परंतु उसे 'महसूस' (अनुभव) अवश्य किया जा सकता है; ठीक उसी प्रकार 'सतशब्द' निर्गुण और निराकार है, परंतु जब भीतर अनहद नाद प्रकट होता है, तो उसका स्पष्ट अनुभव और आनंद साधक को प्राप्त होता है।

४. सिमरन का घर और मार्ग (चौथे प्रश्न का उत्तर):

शिवरण को घर प्रेम, पवन की राहा ध्याइये।  

      भजन कर नांव उलटे सुरत मन आ फेहेर पावसी।

सिमरन का घर: सिमरन का सच्चा घर (स्थान) कोई मंदिर, मस्जिद या बाहरी आसन नहीं है, बल्कि हृदय का 'सच्चा प्रेम' है। जहाँ असीम प्रेम और विरह है, वहीं सच्चा सिमरन टिकता है।

ध्यान का मार्ग: ध्यान किस रास्ते से करें? महाराज बताते हैं कि 'पवन की राह' (श्वास-उच्छ्वास के मार्ग) से ध्यान करो। आती-जाती श्वास के साथ नाम (सतशब्द) को जोड़ दो।

प्राप्ति कैसे हो: जब साधक श्वास-उच्छ्वास से नाम का भजन करता है, तो संसार की ओर भागने वाले उसके 'मन' और 'सुरति' (चेतना) वहाँ से उलट (रिवर्स होकर) जाते हैं और भीतर गगन मंडल की ओर चढ़ने लगते हैं। इसी उल्टी चाल  उस पारब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति होती है।

सार:

यह दोनों हरजस मिलकर  पूरा का पूरा शास्त्र (Manual) बन जाते हैं। इनमें बताया गया है कि वासनाओं से मुक्त होकर, प्रेम को आधार बनाकर, श्वासों के मार्ग से अपनी चेतना को उलटकर दशम द्वार तक ले जाना ही जीव का अपने शिव (परमात्मा) से मिलने का एकमात्र मार्ग है।

सब सुं निरसा होय, राम गुण गाइये।


 भक्ति के मूलभूत नियम।अहंकार-शून्यता, जीवों पर दया, और सतगुरु व परमात्मा में अभेद दृष्टि (दोनों को एक मानना) ही वह नींव है, जिस पर मोक्ष का महल खड़ा होता है।


सब सुं निरसा होय, राम गुण गाइये।
ज्युं तेरा रीजे श्याम, परमपद पाइये ।। १ ।।

हे जीव! संसार की सभी भौतिक इच्छाओं और आशाओं से मुक्त होकर (निरसा होय) तथा समाज में सबसे छोटा और नम्र (अकिंचन) बनकर उस परब्रह्म परमात्मा (राम) के गुणों का गान कर (अखंड सिमरन कर)। इस प्रकार की निष्काम और निरहंकार भक्ति से ही तेरा स्वामी (श्याम/परमात्मा) तुझ पर प्रसन्न (रीझेगा) होगा, और तभी तुझे आवागमन से मुक्त होकर उस 'परम पद' (केवल पद / आनंद पद) की प्राप्ति होगी।


अहूं पद में दुख होय, नरक में दीजिये।
बिन शिवरण करतार, परथ नहीं रिजीये ।। २ ।।

यदि तूने 'अहं-पद' (अहंकार / मैं-पन) को धारण किया, तो वह तुझे केवल दुःख ही देगा और अंततः नरक की भयंकर यातनाओं में धकेल देगा। यह शाश्वत नियम है कि उस कर्ता-पुरुष (करतार/परमात्मा) के सत्य-नाम के सिमरन के बिना, वह परमात्मा किसी अन्य बाहरी कर्मकांड या दिखावे से कभी प्रसन्न (रिजीये) नहीं होता।


परमेश्वर कूं जांण, संता कूं मानिये।
हरि गुरु बिच अंतराय, कबू नहीं आनिये ।। ३ ।।

सच्ची भक्ति का रहस्य यह है कि पूर्ण संतों (केवली भगवंतों) द्वारा बताई गई सत्य-विधि (सतशब्द के भेद) के अनुसार भजन करना ही 'परमेश्वर को जानना' और 'संतों को मानना' है। इसलिए अपने मन में 'हरि' (परमात्मा) और 'गुरु' (ब्रह्म-निष्ठ संत) के बीच कभी भी कोई 'अंतराय' (भेदभाव या अंतर) मत लाना। जो ज्ञान-स्वरूप गुरु हैं, वही साक्षात् परमात्मा हैं।


जीव दया दिल राख, धरम सो कीजिये।
मत कर डावा डोल, राम रस पीजिये ।। ४ ।।

अपने हृदय में संसार के सभी जीवों के प्रति दया का भाव रख और यही तेरा सच्चा 'धर्म' है।  गृहस्थ जीवन में रहते हुए दान से देव ऋण, कर्तव्यों से पितृ ऋण, और भजन से ऋषि ऋण चुकाना ही सच्चा धर्म है। अपने मन को सांसारिक संकल्प-विकल्पों में 'डावाँडोल' (अस्थिर) मत होने दे। बस एकाग्रचित्त होकर भीतर गूँजने वाले अनहद नाद और सतशब्द रूपी 'राम-रस' (अमृत) का पान करता रह।


कसर कोर सब काड, भक्त सो कीजिये।
तन मन धन सुखराम, गुरां कूं दीजिये ।। ५ ।।

अपने भीतर की सारी 'कसर-कोर' (कमियों, खोट और विकारों) को पूरी तरह निकाल दे और फिर निर्मल होकर उस पारब्रह्म की भक्ति कर।
अंत में संत सुखराम जी महाराज फरमाते हैं कि अपना "तन, मन और धन" सब कुछ अपने सतगुरु को समर्पित कर दे।
(यहाँ परमार्थिक दृष्टि से 'तन' का अर्थ है शरीर से निरंतर रटन करना, 'मन' का अर्थ है मन का अपनापन/अहंकार छोड़ देना, और 'धन' का अर्थ है अपनी आयु की एक-एक 'श्वास रूपी अनमोल पूँजी' को सतगुरु के बताए ज्ञान के अनुसार भजन में लगा देना। यही सच्चा समर्पण है।)

जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं

हरजस पद राग मिश्रीत (५)   संत सुखराम जी महाराज का यह हरजस अत्यंत तार्किक, दार्शनिक और सुरति-शब्द योग के सबसे बड़े रहस्य का उद्घाटन करने व...