Thursday, November 20, 2025

Satguru saancha shirjanhaar सतगुरु सांचा शिरजणहार_ हरजस पद राग मिश्रीत (२०)

 सतगुरु सांचा शिरजणहार। तुम जिम्या शिष सब सुख पावे, पूरण हुवे करपाल ।। टेर ।।
 जीमो ज्ञान कीमत शब्द चीजां, रेण रसोडे पाल। सूरत रांधण मन हजूरी, जिमो राम दयाल ।। १ ।।
 चोखा चेतन प्रेम पुडिया, सेज सोवन थाल। लाडू पेडा नांव निज तत, जिमो राम दयाल ।। २ ।। 
 समझ नारी राख पंखी, मत चकलो ढाल। निरत अंच्छया कवा देवे, जिमो राम दयाल ।। ३ ।।
 झरणा झारी लगन लोटो, चलु बैण बिसाल। प्रीत नारी हाथ पूंछे, जिम्या राम दयाल ।। ४ ।। 
 बेण बादल घटा उलटी, जिम मगन मतवाल । संत डकारे बोल अणभै, जिम्या राम दयाल ।। ५ ।। 
 दास सुखदेव शरण तुम्हारी, खावंद तुम प्रतिपाल । शीत प्रसादी मोहे दिज्यो, जिमो राम दयाल ।। ६ ।।

 Harjas Pad Raag Mishrit (20) Satguru saancha shirjanhaar. Tum jimya shish sab sukh paave, puran huve karpaal. ॥ Ter ॥ Jeemo gyaan keemat shabd cheezan, ren rasode paal. Surat raandhan man hajoori, jimo Ram Dayal. ॥ 1 ॥ Chokha chetan prem pudiya, sej sovan thaal. Laadu peda naam nij tatt, jimo Ram Dayal. ॥ 2 ॥ Samajh naari rakh pankhi, mat chaklo dhal. Nirat anchhyaa kawa deve, jimo Ram Dayal. ॥ 3 ॥ Jharna jhaari lagan loto, chalu bain bisaal. Preet naari haath poonche, jimya Ram Dayal. ॥ 4 ॥ Ben baadal ghata ulti, jim magan matwaal. Sant dakaare bol anbhai, jimya Ram Dayal. ॥ 5 ॥ Daas Sukhdev sharan tumhaari, khavand tum pratipaal. Sheet prasadi mohe dijyo, jimo Ram Dayal. ॥ 6 

 परमात्मा और सतगुरु से प्रार्थना 
हम परमात्मा और सतगुरु से विनम्र प्रार्थना करते हैं कि आपकी पूर्ण कृपा से सभी शिष्यों को सुख की प्राप्ति होती है और वे परम आनन्द का अनुभव करते हैं।शब्द ही वह अमूल्य वस्तु है, जिसका ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा धन है। ज्ञान के अनुसार जीवन जीना ही रसोई का पालन करना है। सूरत लगाकर प्रेमपूर्वक भजन करना ही रांधना कहलाता है। मन ही वह सेवक (चाकर) है, जो आपकी कृपा से नियंत्रित होता है। चित लगाकर, प्रेम से किया गया भजन ही चावल और पूड़ियाँ हैं। सहज भाव में सरलता से किया गया भजन ही सोने का थाल है। आपका निज नाम ही लड्डू और पेड़ा है—यही आपकी सच्ची कृपा है। समझ के साथ भजन करना, ऐसा है जैसे नारी के हाथ में पंखा हो। भक्ति में दृढ़ता रखना ही चकला-बेलन है। निरंतर ध्यान में रहना ही काव देना (परसने का कार्य) है। क्षमा को धारण करना ही झारी (छन्नी) है। लगन से भजन करना ही लोटा है। विस्तृत और मधुर वचन बोलना ही चलू (जल डालने का पात्र) है। प्रीति और श्रद्धा से भजन करना ही जैसे नारी का पूछना (स्नेह दिखाना) है। संतोष और गंभीर वचन ही घटा का उलटना है। भजन करने से जो आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त होती है, वही मगन मतवाला होना है। अणभै (निर्भयता) और सत्य के वचन बोलना ही संतों का डकारना है।महाराज कहते हैं: यह दास आपकी ही शरण में है, आप ही इसके स्वामी हैं। परमपद की प्राप्ति ही शीतल प्रसादी है और वही आपकी कृपा का चरम स्वरूप है। परमात्मा व सतगुरु से प्रार्थना कर रहे है कि आपकी पूर्ण कृपा से सब शिष्यो को सुख की प्राप्ति होती है व पूर्ण परमानन्द मिलता है। शब्द रूपी चीज का ज्ञान ही मूल्य है। ज्ञान के माफिक रहना ही रसोई पाल है। सूरत लगाकर भजन करना ही रांधना है। मन ही चाकर है यही आपकी कृपा है। चित लगा कर प्रेम से भजन करना ही चावल व पूडिये है। सहज में सरलता से भजन होना ही सोने का थाल है। आपका निज नाम ही लाडू पेडा है यही कृपा है। समझ के साथ भजन करना ही नारी का हाथ में पंखी रखना है। भक्ति में दृढता रखना ही चकला बेलन है। निरत याने अखण्ड ध्यान होना ही कवा देना है। क्षमा धारण करना ही झारी है। लग्न से भजन करना ही लोटा है। विशाल बचन बोलना ही चलु करना है। प्रीति के साथ भजन करना ही नारी का पूंछना है। बादल वचन ही, घटा उलटना है। भजन करने से प्रसन्नता होना ही मगन मतवाल है। अणभै के वचन बोलना ही संतो का डकारना है। महाराज फरमाते हैं कि यह दास आपकी शरण में है आप ही इसके स्वामी है। परमपद की प्राप्ति करना ही शीत प्रसादी व आपकी कृपा है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...