वारी वारी पोढो राम दियाल, तूं आय तूटे विषे जंजाल ।। टेर ।।
प्रेम पथरणो, ओकत समता की शाल। ज्ञान गदरो शील सीरक, पोढो राम दियाल ।। १ ।।
वारी वारी जींवा के प्रतिपाल, सूरत कामण बाट जोवे, ध्यान ढोल्यो ढाल।
आत्म सुन्दरी बोहत राजी, पोढो राम दियाल ।। २ ।।
छिम्या छंवरी चंवर चेतन, प्रीत पवन ढाल।
जोग निद्रा बाट देखे, पोढो राम दियाल ।। ३ ।।
छिम्या चादर पुनः पगाणो, दया की ओढो दुशाल।
सत सिराणो सरस गीदूं, अब चांपे पांव नित पत, सब सुख जीता काल ।। ४ ।।
दास सुखदेव शरण तुम्हारी, पोढो राम दियाल। जीवां के प्रतिपाल, पोढो राम दियाल ।। ५ ।।
Harjas Pad Raag Mishrit (19)
Vaari vaari podho Ram Diyaal, tu aay toote vishe janjal. ॥ Ter ॥
Prem pathrano, okat samta ki shaal.
Gyaan gadro sheel seerak, podho Ram Diyaal. ॥ 1 ॥
Vaari vaari jeenwa ke pratipaal, surat kaaman baat jove, dhyaan dholyo dhal.
Aatma sundari bohot raaji, podho Ram Diyaal. ॥ 2 ॥
Chhimya chhanwari chanvar chetan, preet pawan dhal.
Jog nidra baat dekhe, podho Ram Diyaal. ॥ 3 ॥
Chhimya chadar punah pagaano, daya ki odho dushal.
Sat siraano saras geedun, ab chaampe paav nit pat, sab sukh jeeta kaal. ॥ 4 ॥
Daas Sukhdev sharan tumhaari, Podho Ram Diyaal.
Jeevaan ke pratipaal, Podho Ram Diyaal. ||5||
महाराज संतों से फरमाते हैं
शरीर में सतशब्द का अनुभव होना ही रामजी का पोढ़ना (प्रकट होना) है। भक्ति करने से ही जगत के विषयों और जंजाल से छुटकारा होता है।समता धारण करना ही "शील की ओढ़नी" है। ज्ञान ही गदरा (कंबल) है, शील ही रजाई है, और प्रेम ही पथरना (बिछावन) है।सूरत (आत्मिक चेतना) रूपी स्त्री परमात्मा का ध्यान कर रही है, यही बाट जोना (प्रतीक्षा करना) और ढोल्या ढालना (विनती करना) है।हे परमात्मा! आप जीवों की रक्षा करने वाले हैं — आपको बारंबार "धिन है, धिन है।"जब आत्मा को आनंद आता है,
तो आत्म-सुंदरी अत्यंत प्रसन्न होती है।क्षमा ही चंवरी (छत्र) है, चिंतन ही चंवर (झलने वाली पंखी) है।प्रीत से भजन करना ही हवा करना है, अर्थात आत्मा को ठंडक और शांति देना।सत्ता समाधि होना ही जोग-निद्रा की बाट देखना है।क्षमा ही चादर है, पुण्य ही पैरों से पोंछने की पगड़ी (पगाना) है।घट में दया रखना ही दुशाला ओढ़ना है, और सतनाम की भक्ति करना ही सिर के नीचे तकिया लगाना है।हर समय आनंद का अनुभव होना ही सभी सुखों का आना, पाँव चापना और काल को जीतना है।महाराज अंत में कहते हैं: "मैं आपकी शरण में हूं,
हे परमात्मा, आप ही जीवों की रक्षा करने वाले हैं।"
शरीर में सतशब्द का अनुभव होना ही रामजी का पोढना है, भक्ति करने से ही जगत के विषयो व जंजाल से छुटकारा होता है। समता धारण करना ही शील का ओडना है। ज्ञान ही गदरा है। शील ही रजाई है व प्रेम ही पथरना है। सूरत रूपी स्त्री आपका ध्यान कर रही है। यही बाट जोना व ढोल्या ढालना है। परमात्मा जीवों की रक्षा करने वाले आपको धिन है धिन है। आत्मा को आनन्द आना ही आत्म सुन्दरी का बहुत राजी होना है। क्षमा ही चंवरी चिंतन ही चंवर है। प्रीत से भजन करना ही हवा करना है। सता समाधि होनी ही जोग निद्रा का बाट देखना है। क्षमा ही चादर है, पुन्न ही पैर पूछने का पगाना है। घट में दया रखना ही दुशाला ओढना है। सत नाम की भक्ति करना ही सिर के नीचे तकिया लगाना है। हर समय आनन्द का अनुभव होना ही सब सुख का आना, पांव चापना व काल का जीतना है। महाराज फरमाते हैं कि मैं आपकी शरण में हूं आप ही जीवों की रक्षा करने वाले है।