संतो काल शिर भारी है। ओ सब कुं खाया जाय, छाडो करम ऊपाय ।। टेर ।।
ब्रह्म बाग में मैं रमू रे, सुन्न शिखर पर जाय। गढ चढ हेला देत हूं रे, बंधी जगत के मांय ।। १ ।।
सतगुरु शरणो लीजिये रे, ब्रह्म ज्ञान सुण आय। काल डरे करतार सूं रे, और शकल कूं खाय ।। २ ।।
ब्रह्मा विष्णु महेश कूं रे, चांद सूर कुंई खाय। पवन पाणी इन्द्र कूं रे, घर आकाश मिटाय ।। ३ ।।
पूरण परमानन्द की रे, सरण गहो तुम आय। काया में करतार सूं रे, मिलो रेण दिन ध्याय ।। ४ ।।
मानव देह तन पावणो रे, सके तो लेखे लाय। सुखदेव हेला देत है रे, पीछे सरे नी काय ।। ५ ।।
Harjas Pad Raag Mishrit (18)
Santo kaal shir bhaari hai.
O sab ku khaya jaay, chhado karam oopay. ॥ Ter ॥
Brahm baag mein main ramu re, sunn shikhar par jaay.
Gadh chadh hela det hoon re, bandhi jagat ke maay. ॥ 1 ॥
Satguru sharano leejye re, Brahm gyaan sun aay.
Kaal dare kartaarsu re, aur shakal ku khay. ॥ 2 ॥
Brahma Vishnu Mahesh ku re, chaand soor kunai khay.
Pavan paani Indra ku re, ghar aakaash mitay. ॥ 3 ॥
Puran parmanand ki re, saran gaho tum aay.
Kaaya mein kartaar su re, milo ren din dhyaay. ॥ 4 ॥
Maanav deh tan paavano re, sake to lekhe laay.
Sukhdev hela det hai re, peeche sare nee kaay. ॥ 5 ॥
महाराज संतों से फरमाते हैं
सिर पर काल खड़ा है — और वह बहुत बलवान है, जो सभी को खा रहा है। इसलिए कर्मों के साधनों को छोड़ो, और सच्चे भजन की ओर बढ़ो।ब्रह्माण्ड व पारब्रह्म को पार कर, दशवें द्वार से ऊपर, सतशब्द का अधर अनुभव होना ही "सुन्न शिखर" पर जाकर ब्रह्म में रमना है।केः पद और आः पद की प्राप्ति करना ही गढ़ पर चढ़कर सारे जगत में हेला देना है — यानी संसार को झकझोर देने वाली चेतना की प्राप्ति।सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण करके, सतस्वरूप आः पद की भक्ति करो, यही सच्चे ब्रह्मज्ञान को सुनना और आत्मसात करना है।काल परमात्मा से डरता है, लेकिन सभी जीवों को समय आने पर नष्ट कर देता है — चाहे वे ब्रह्मा, विष्णु, महादेव हों,
या चंद्रमा, सूर्य, वायु, जल, इन्द्र, पृथ्वी और आकाश — कोई भी काल के प्रहार से बच नहीं सकता।इसलिए अपने शरीर में शब्द ब्रह्म की जागृति करो, और रात-दिन भजन कर, पूर्ण परमानन्द की प्राप्ति करना ही सच्ची शरण है।मनुष्य शरीर स्थायी रहने वाला नहीं है। जहाँ तक सम्भव हो — इस शरीर से भक्ति कर लो।महाराज अंत में चेताते हैं: मनुष्य शरीर छूट जाने के बाद कुछ नहीं होगा। इसलिए जीवन हते-रहते ही परम सत्य को पा लो।
संतो से महाराज फरमाते हैं कि सिर पर काल बडो बली है व सब को खाये जा रहा है, इसलिये कर्मों के साधन को छोडो। ब्रह्मण्ड पारब्रह्म में दशवे द्वार से ऊपर सतशब्द का अधर अनुभव होना ही सुन्न शिखर पर जाकर ब्रह्म में रमना है। केः पद आः पद की प्राप्ति करना ही गढ पर चढकर सारे जगत में हेला देना है। सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण करके सतस्वरूप आः पद की भक्ति करो, यही ब्रह्म ज्ञान का सुनना है। काल परमात्मा से डरता है और सब को खा जाता है। काल ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चांद, सूरज, हवा, पानी, ईन्द्र, पृथ्वी, आकाश को समय से सबको मिटा देता है। शरीर में शब्द ब्रह्म की जागृति कर रात दिन भजन कर पूर्ण परमानन्द की प्राप्ति करना ही शरण लेना है। मनुष्य शरीर स्थायी रहने वाला नहीं है। हो सके जहां तक इससे भक्ति करो। महाराज फरमाते हैं कि मनुष्य शरीर छूट जाने के बाद कुछ नहीं होगा।