नमो नमों गुरूदेव, परम निज भेव बताया। निर्गुण ज्ञान विचार, हंस परम हंस कुवाया ॥
नमों नमों गुरूदेव, समुद्र में डुबत तारया । नमों नमों गुरूदेव, बांहा गहे पार ऊतारया ॥
नमों नमों गुरूदेव, ग्यान मोही निर्भय दिया । नमों नमों गुरूदेव, तिमिर मन का हर लिया ॥
जन सुखिया गुरूदेव जी, शिष के तारणहार । भवसागर में तारज्यों, लिज्यों बांह पसार ॥ १ ॥
गुरूदेवन के देव, सेव किज्यो सब कोई । गुरू जीवां की जहाज, बिन मुक्त न हो।
ब्रह्मा विष्णु महेश, गुरां को शीष निवाये । राम कृष्ण अवतार, गुरां से मोक्ष सिधाये ।
सुखरामदास गुरूदेव का,कहां लग करूं बखाण। अथंग अथाह अपार है, गुरू दरियाव समान ॥ २ ॥
बिन जल मिटे न प्यास, शीत अम्बर बिन सोई। भोजन बिन परसाद, भुख जुग जाय न लोई।
कन्चन कसन सोनार, हार तागा बिन राखे। जुग हुन्नर सब काम, बात सुणिया बिन भाखे।
शील सांच सन्तोष, ज्ञान बिन भरम न जावे। जन सुखिया बिन सूर, तिमर कहो कौन मिटावे ॥ ३ ॥
सतगुरु बिना न मोक्ष, भूप बिन पटा न देवे । बादशाह बन जगत की खबर न लेवे ।
समुद्र न ऊतरयो जाय, नाव काष्ट बिन सोई । हीरा रत्न सर माही, भेद मरजीवा होई ॥
पारस बिन बोहो पाहाण, लोहे कूं आंण लगावे । जन सुखिया सतगुरू बिना, जीव मोख नहीं जावे ॥४॥
गुरू केशो करतार, गुरू गत अकथ कहाणी । शिव सनकादिक शेष, विष्णु बोले मुख बाणी ॥
लख चोरासी जूण जाय, भूगतो तुम सोई । गुरू निंधा को पाप, तोहि ऊतरे नहीं कोई ॥
सिख सतगुरू सुंआ कियो, गुरां दिनों भेद बताय । चौरासी सुखराम कहे, बाता सटे गमाय ॥ ५ ॥
कालू सा गुरूदेव, शिष नारद सा कहिये । गुरु बिन मुक्त न होय, भेद बिन मोक्ष न लहिये ।
वाष्ट मुनि पे आय, राम बज्यो तत सोही । जीव मोख किम जाय, ताहि गत कहिये मोही ॥
जन सुखिया वाष्ट कही रामचन्द्र सुण कान। ईडा पिंगला सुखमणा, ब्रह्म मिलण रो ध्यान ॥ ६॥
राम किया गुरूदेव, कृष्ण शरणागत आया । गोरख समरथ जांण बिन काया ।
तीन देव को अंश, दत्त बोले सत बानी ।गुरू धारण चौबीस, सुख महिमा गुरू जानी ॥
गुरू सम जग में को नहीं, देव विष्णु अवतार । जन सुखिया गुरूदेव के, शरणे रहो विचार ॥ ७॥
शुकदेव जती बखाण, गुरां बिन भेद न आयो । जनक विदेह गुरू भेद, तत्त सुं तत्त मिलायो ।
ऐसा समरथ जांण, आंण हम शरणा लिया। जुगन जुगन की गेल, पलक मे पेंडा किया |
सतगुरू बिरमदासजी, जनक विदेह परमाण । जन सुखिया अमरीष सा, जयदेव दया बखाण ॥ ८ ॥
सतगुरू सता समाध, जाय ब्रह्मण्ड घर किया । परमारथ के काज,देहे जुग वासा लिया ॥
बडभागी सो जीव, शरण सतगुरू की आवे | काग पलट हंस होय, कीट सु भृंग कहावे ॥
जन सुखिया गुरू देव की, महिमा कही न जाय। आप सरिसा कर लिया, शिष कूं चरण लगाय ॥९॥
गुरूशीष का दातार, मोही ऐसा धन दिया । ग्यान ध्यान विवेक, बुद्धि दे निरमल किया |
वायक वचन विचार, हाल गुरूचाल सिखाई । दीन गरीबी प्रेम, भाव सो दया पठाई ॥
अकल अरथ सुनमान,शब्द वाणी सिर गाजे, जन सुखिया गुरूदेव, शीष पर असा निवाजे ॥ १०॥
भक्ति भाव भगवान, तत्त गुरू माही लखाया । खण्ड ब्रह्मण्ड का भेद, सोज गुरूशरणे आया ॥
मत चित्त समता सांच, शरण ओसी विध पाई। शकल अंग शिर पांव, भक्ति गुरूदेव पठाई ॥
असो कर उपकार शिख को प्रकट कियो । जन सुखिया गुरूदेव, राज नवखण्ड शिर दियो ॥ ११॥
सदगुरू बड दातार, ताहि जोडे नहीं कोई । प्रसन्न होय गुरूदेव,दत बगसे नित सोई ॥
धन देवे अनतोल, मोल सो तोल न आवे ।दुख दाद सब जाय, खात छेडो नहीं पावे ॥
अमरलोक शासन दियो, रिद्धि सिद्धि दी बोहो लार । जन सुखिया गुरूदेव जी, असा बड दातार ॥१२॥
चमक चोक मणी लाय, खाल लोहा सब गाल्या । सोगी सोनो सोज, फूस नारया पर जाल्या ॥
नाड पकड गहे हाथ, दर्द अपने मन लिया। औषध मुली बांट, आण रोगी मुख दिया ॥
कसर कोर गुरू सोज,रोग की जड़ा कढाई । जन सुखिया गुरूदेव, वैद पर वैदज भाई ॥ १३ ॥
अमृत सायर सीप, मांहि कण मोती लहिये । गंगा यमुना मध्य,और तीरथ सब कहिये ॥
धातु वस्तु सब होय, जोय सारी गेह लावे। इन्द्रलोक स्थान, ताहि शिर बिध बणावे ॥
अता सब अरपण करे,सुर नर सुख सोय । जन सुखिया गुरूदेव सूं, सिख ऊरण नहीं होय ॥ १४॥
बन में चन्दन रूख, बाग में गुल्ल बिराजे। अष्ट धातु में हेम, रत्न में हीरा छाजे ॥
ज्यु गोपियां में कान, सभापति इन्द्र कहिये । नदियां में ज्यों गंग, धाम में पुष्कर लहिये ॥
सती नगर मध मांय,रैण तारा शशि छाजे । जन सुखिया गुरू बीरम, सभा में ईस्या बिराजे ॥ १५ ॥
गुरू दीर्घ द्रगपाल, मत सुखदेव बखाणो । पृथु प्राक्रम मांही,ध्यान ध्रुव ज्यों थिर जांणो ॥
समता श्याम समान, प्रेम में पदम सरिसा । दाता कर्ण सधीर, ग्यान ऊजियागर ईसा ॥
गहरा बहोत गम्भीर ब्रह्म ज्यों थाह न आवे। जन सुखिया गुरूदेव, ताहि गत बिरला पावें ॥ १६ ॥
रूखमांगज अमरीष, सैन गोतम रिख जानो । वाष्ट शंकर शेष, कपील सी सोज बखाणो ॥
वाल्मीक सी बुध, चित परिक्षीत सो कहिये । अगस्त रूम ऋषि जांण, ताहि गुरू समरथ लहिये ॥
वीर विक्रमा सरिसा, पर उपकारी प्राण | सतगुरू बिरमदास जी, सुखिया है सम जांण ॥ १७॥
पाहडा मज सुमेर, पंख में गरूड कहिये । नरन में ज्यूं भूप,फोज में घेवर लहिये ॥
देही में ज्यों नाक, देव मज अन्न बखाणो । भोजन में पकवान, महल में दीपक जांणो ।।
कश्यप सुत जब ऊगिया, मंड उजाला होय। यूं सभा में सुखराम कह, सदगुरू बिरम जोय ॥ १८ ॥
गुरू ज्यों ब्रह्मस्वरूप, ताहि में फेर न कोई । सता समाधी प्राण, बेण ब्रह्मा सा होई ॥
शीतल विष्णु समान, सांच पाण्डव सुत जांणो । कला कृष्ण कबीर, ग्यान गोरख बखाणो ॥
जन सुखिया गुरू देवजी मेरे इनन समान । बिरमदास गुरूदेव पर वारू वेद कुरान ॥ १९॥
तारण तिरण गुरूदेव, भेद भवसागर दिया। बिन खेवट बिन नांव बांहि गेह बाहर लिया ॥
चिदानन्द महाराज, ब्रह्म पूरण गुरूदेवा । धिन धिन तुम अवतार, धिन दरशण ले भेवा ॥
बन्धी छोड गुरूदेव, दयासागर गुणदाता । जन सुखिया गुरूदेव, ब्रह्म ज्यों बण्या विधाता ॥ २० ॥
गुरू समरथ शिख जांण, निरंजन आद गुसांई । पारब्रह्म गुरूदेव,फेर शिरजण सो सांई ॥
ज्योति स्वरूपी आप, रिजक पुरण गुरूदेवा | घड भंजन करतार, अलख अविनाशी सेवा ॥
जन सुखिया गुरूदेव जी, हर सु अधिक बताय। प्राण पुरूष से अधिक है, बोलत है घट मांय ॥ २१॥
गुरूशरणे गोविन्द, मिलन की किमत आवे । ईन्द्र मेह बरसाय जमी पर साख निपावे ॥
परदेशी पर भोम, गेल बुजे घर आवे । चले आपणे पांव, धिन सो पंथ बतावे ॥
जन सुखिया फल नीर रे, पीवत तरवर मांय । सिमरथ साहिब पाविया, सतगुरु शरणे आय ॥ २२॥
तन मन अरपे धन्न, बोले मिठी मुख बानी । सदगुरू से आधीन,करे महिमा बहु आनि ॥
प्रेम सु पिलंग ढलाय, प्रीत की सोड बिछावे । चित सो चंवर कराय, भाव परसादी लावे ॥
जन सुखिया शिख सांच सो, अष्टमै अंग मां । तन मन दिल को सांच ले, शीष निवाजे आय ॥ २३ ॥
सतगुरू दर्शण जाय, और मन में नहीं लावे । गुरूदेवे निज स्वरूप, रूप निरखत दिन जावे ॥
गुरू बोले सो बैण, चित हृदय धर लिजे । और शकल विध त्याग, मान गुरू वायक लीजे ॥
गुरू गोविन्द जन ओक है, तामे फेर न कोय। सांचा शिष सुखराम के, ज्यांगत असी होय ॥ २४॥
गुरू बेचे बिक जाय, हरष मन मांहि बधावे । आ बिध गाढी मुठ, कदे गोतो नही खावे ॥
अकण अंग रहाय, मत सो मुचे न कोय। दिन दिन दुणी प्रीत, शरण सतगुरू की सोइ ॥
गुरू पत में सुखराम कह, ज्यों शिख सांचा होय । देवल इंडो चढ गयो, पथ प्राक्रम जोय ॥ २५ ॥
साखी :
तीन लोक माया सही, चौथे लोक न जाय ।
जीवां कारण सांईयां, बप धारयो जुग मांय ॥ १॥
असो ग्यान ऊचारियो, निगम वेद गम नांय । तीन गेला छाडकर ऊपराडे हंस जाय ॥ २ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश है, शक्ति धरम परवान । जन सुखिया देखत रहे, हंस पहुंचे निर्वाण ॥ ३ ॥
असा सतगुरू सांईयां, अदभुद ग्यान सुणाय । वेद कतेब न पावसी, स्थिर भया वहां जाय ॥४॥
तीन लोक जावे नहीं, सुर नर धर पाताल । हंस पहुंचा गिगन में, पाप न पुण्य न काल ॥५॥
तीन ताप को मेटकर, सबका अमल उडाय । जन सुखिया गुरूदेव जी, ब्रह्म के मांय मिलाय ॥ ६ ॥
राम सतगुरु देवजी महाराज ने धन्य हो, धन्य हो।
परमदयाल सतगुरु सुखरामजी महाराज ने धन्य हो, धन्य हो।
अनन्त सुखसम्राट्, सतगुरु सुखरामजी महाराज के
ज्ञान - सत्वस्वरूप भगवान ने धन्य हो, धन्य हो।
केवली भगवन्तों ने धन्य हो, धन्य हो।
जीवों तारण जहाज ने धन्य हो, धन्य हो।
मोक्ष के मालकां ने धन्य हो, धन्य हो।
अनन्त कोटि संतों ने धन्य हो, धन्य हो।
रामसभा में राम - जी - राम महाराज।