Monday, September 15, 2025

aarti आरती अनन्त सुख सम्राट सतगुरु सुखरामजी महाराज की

 





कोटक भाँण हुआ उजियारा, दिल ही में साहिब दीदारा।
 अमृत बूंद झड़े कण मोती, दीपक ज्ञान झिलामिल जोती॥१॥
 मनवा चंवर करे मन मांही, जहां देखूं जहां सतगुरु सांईं। 
सतगुरुजी की मैं बली जाई, ऐसो भेव दियो मुझ आई॥२॥
 तन देवल बिच आतम देवा, निर्गुण भक्ति भजन ऐ भेवा। 
प्रेम फूल मनवो ले आवे, चित्त का चन्दन ले चर चावे॥३॥ 
सेवा वन्दन आरती कीजे, तन मन वार अमीरस पीजे।
 सुरति सेवेग निज मन माला, भाव का भोजन सर्व रसाला॥४॥ 
धूप ध्यान लागो दिन राती, दीपक ज्ञान प्रीत की बाती।
 सुखमण कलश अमी भर लाई, झिगमग–झिगमग मन्दिर मांही॥५॥ 
मुरली बीण बजे सुरणाई, संख री घोर गिगन घर छाई।
 अनहद झालर का झणकारा, रोम रोम बोले ररंकारा॥६॥ 
जन 'सुखराम' सत्ता या जागी, ब्रह्म समाध ब्रहमाण्ड में लागी। 
दसबें द्वार करे हंस केला, अनन्त कोट संतों का मेला॥७॥ 
ऐसो समयो सदा ही हमारे, आठ पोहोर क्या साँझ सवेरे। 
जन 'सुखराम' अमर घर पाया, जामण मरण मोह नहीं माया॥८॥ 

 दोहा :- जन 'सुखिया' सतगुरु सत्ता, मोपे कहीयन जाय। जो मुझ बरती आय के, सो विधि कही सुनाय॥ 

 ‘दरिया' सा गुरु शीश बिराजे, राम नाम मंतर घट गाजे।
 ररंकार चौकी चहूं फेरा, मैला मंत्र न आवे नेड़ा॥५॥ 
मैं देखूं गुरु देव तुम्हारा, गुनाह चूक बग साऊं सारा। 
रायण आयर दरसण कीयो, साधां के विरोटयो आयो॥६॥
 वीर विध्या आंख्यां जो खूटी, हिये लिलाड़ चहूं दिस फूटी।
 ओ नर तन राम भजन के तांई, तूं क्यूं खोवे करमां माई॥७॥ 
ऐसो राम भजन प्रताप, तांती सीली लगे न ताप॥९॥
 एक चैनपुरी पूजे हरसोर अभिमानी मन ही को जोर। 
खीयाजी पर मूठ चलाई, फिर दौड़ी उनही पर आई॥१०॥
 खीयाजी के राम रूखाला, चैनपुरी के लागी ज्वा ला। 
राम नाम ज्यारे टंकसाल, वे क्यूं मरसी मौत अकाल॥११॥
 उण खेमा के रक्षक राम, थे क्यूं किया निकामा काम।
 गांव धणी के सिद्ध गमायो, खेमा को तुझ काज रूखायो॥८॥ 
विनती कर गुन्हा बगसायो, कर स्तुत सारड़ी आयो।
 ऐसो राम भजन प्रताप, तांती सीली लगे न ताप॥९॥
 एक चैनपुरी पूजे हरसोर अभिमानी मन ही को जोर।
 खीयाजी पर मूठ चलाई, फिर दौड़ी उनही पर आई॥१०॥
 खीयाजी के राम रूखाला, चैनपुरी के लागी ज्वा ला। 
राम नाम ज्यारे टंकसाल, वे क्यूं मरसी मौत अकाल॥११॥
 छल छिद्र बल मूठ न लागे, गिरह पनौती सब उठ भागे। 
नो ग्रह जोगाण राहू न केत, डाकण ड्यारी लगे न प्रेत॥१२॥ 
सावण कुसावण विघ्न अनेक, राम जनां नहीं लागे लाके। 
विजासण भेरु अरु भूत, राम कहयां टलसी जमदूत॥१३॥ 

शरणो सतगुरु दयाल को, मुख ह्रदय हरि नाम।

नितपत संगत साध की, आ जीवन मोक्ष ‘सुखराम'।

सब धरती कागज करू, सब वन कलम कटाय।

सात समंदर स्याही करू, सतगुरु गुण लिख्या न जाय॥


 राम गुरुदेव जी कूं, श्री श्री अनन्त बार। बार बार श्री सब, सन्तों कूं प्रणाम रे॥
 परिक्रमा प्रणाम सहित, सिर निवाय पडूं पाय। मेरे चाह राम राय, दिज्यो भक्ति दान रे॥
 कर जोड़ करुणा करूं, करुणा निधान आगे। लागे मीठो राम नाम, मोकू मेहरबान रे॥
 श्रवण सूंणूं तो राम, रसणा गूणूं तो राम। वाणी में करूं तो राम, संतों का बखान रे॥ 
नाम की प्रतीत दिज्यो, नाम को प्रकाश किज्यो।
 नाम की प्रतीत 'सुखसारण' सांची आण रे॥
 नाम की प्रतीत पहुंच्या, पैगम्बर तीर्थंकर। 
नाम की प्रतीत पहुंच्या, जोगी जन औतार।
 नाम की प्रतीत पहुंच्या, हिन्दू मुसलमान रे॥
 नाम की प्रतीत पहुंच्या, साथ सिद्ध मुनि ऋषि। 
नाम की प्रतीत पहुंच्या, और कोई आन रे॥ 
नाम की प्रतीत पहुंच्या, शेष महेश सनकादिक। 
नाम की प्रतीत 'सुखसारण', सांची आण रे॥१॥
 नाम की प्रतीत बिना पहुंच्यो, है न पहुंचे कोऊ।
 मती कोई किज्यो, ऊँच कुल को अभिमान रे॥
 नाम की प्रतीत पहुंच्या, क्षत्री वैश्य ब्रह्म कुल।
 सुदर कुदर कीट, ब्रह्म के समान रे॥
 भक्त बिछल प्रभु, भक्ता आधीन सदा।
 पतित पावन कियो, वेद में बखान रे॥
 ऊँच-नीच भावे कोऊ, नाम सूं कल्याण बाबा।
 नाम की प्रतीत 'सुखसारण', सांची आण रे॥२॥
नाम की प्रतीत, राजा भरत ऋषमदेव। 
जनक जोगेश्वर पहुंच्या, अमर स्थान रे॥
 नाम की प्रतीत हत्तामल, गही ज्ञान मून।
 वशिष्ठ मुनेसर धरि, नाम ही को ध्यान रे॥ 
नाम की प्रतीत सेना, समुद् में तारी राम।
 सीता समझायो, लक्षमण हनुमान रे॥ 
नाम की प्रतीत ऋषि, राम रता राम नाम।
 नाम की प्रतीत 'सुखसारण', सांची आण रे॥४॥ 
नाम की प्रतीत मारकंडे मुनि लियो नाम।
 हरिवर दियो, आवागवण निवारियो॥
 नाम की प्रतीत रानी, चुडेला सीखर भुज। 
पत्नी परमोद पति, आपणो उधारियो॥ 
एक राजा प्राणी, षट मास राम राम भज्यो। 
तज के प्राण, परमधाम कू पधारियो॥ 
काशी राजा पापी अंश, बंश लेर नरकां पड़यो।
 एक बरस भक्ति कर, सप्त गोत तारियो॥ 
नाम की प्रतीत, राजा जनक मरवाई गाय। 
जमपुरी जाय, जमलोक निस तारियो॥
 कौरव कर्म कर, कुम्भी नरकां पड़िया जाय।
 बंश में भक्त राजा, युधिष्ठिर निकारियो॥ 
नाम की प्रतीत राजा, सुबग सर्प घेरियो।
 द्रागणी सिमर राम, कष्ट निवारियो॥
 राम राम जिणा लियो, पाप पुत्र कट रहयो।
 'सुखसारण' सर्व ही को, कारज सुधारियो॥१६॥

राम सतगुरु देवजी महाराज ने धन्य हो, धन्य हो।

परमदयाल सतगुरु सुखरामजी महाराज ने धन्य हो, धन्य हो।

अनन्त सुखसम्राट्, सतगुरु सुखरामजी महाराज के

ज्ञान - सत्वस्वरूप भगवान ने धन्य हो, धन्य हो।

केवली भगवन्तों ने धन्य हो, धन्य हो।

जीवों तारण जहाज ने धन्य हो, धन्य हो।

मोक्ष के मालकां ने धन्य हो, धन्य हो।

अनन्त कोटि संतों ने धन्य हो, धन्य हो।

रामसभा में राम - जी - राम महाराज।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...