संतो भाई सो सत सूर बखाण। घाव झटको सन्मुख झेल, बद बद पोरस आंण ।। टेर ।।
शब्द सिंधू बजे झुंझावू, सुणे सो हरिजन कान। भार अठारे रूम सारे, खडा हुवे सब जान ।। १ ।।
कांच चूडी यो तन भांजे, जुग सब झूठो जांण। आड अटक ना सवण माने, जोतिष झूठो जांण ।। २ ।।
तीरथ बरत मूरत पूजा, परहर जुग सब अंग। जन सुखराम सोई जन सूरा, जीत चले जग जंग ।। ३ ।।
Harjas Pad Raag Mishrit (17)
Santo bhai so sat soor bakhaan.
Ghaav jhatko sanmukh jhel, bad bad poras aan. ॥ Ter ॥
Shabd sindhu baje jhunjhaavu, sune so harijan kaan.
Bhaar athaare room saare, khada huve sab jaan. ॥ 1 ॥
Kaanch choodi yo tan bhaanje, jug sab jhootho jaan.
Aad atak na savan maane, jotish jhootho jaan. ॥ 2 ॥
Teerath barat moorat pooja, parhar jug sab ang.
Jan Sukhram soi jan soora, jeet chale jag jang. ॥ 3 ॥
महाराज संतों से फरमाते हैं
केशरिया बाना यानी शूरवीरता धारण करो। यदि इस जन्म में परमात्मा की प्राप्ति नहीं की,
तो मनुष्य जन्म को व्यर्थ गंवा दोगे।मैं सबको कह रहा हूं कि सतगुरु विधि से राम नाम का भजन करो, यही है “चौड़े लाकर धरना” —
यानी साहस के साथ जीवन को भक्ति में समर्पित करना।हे संतों! जगत में शूरवीरता धारण करके भजन करने वाले हो, तुम सब सुनो — यही "ढिंढोरा" (घोषणा) है।पूर्व के युगों में भी शूरवीरों और संतो की महिमा रही है, और यही नाम जगत में अमर रहते हैं।परियाँ (दैवी शक्तियाँ) लड़ाई के मैदान में छाई रहती हैं, और वे सच्चे शूरवीरों की प्रतीक्षा करती हैं — जो माया के युद्ध में विजय प्राप्त करें।चौरासी लाख योनियों में जहां भी तुम रहे, वहां भी रामजी ने तुम्हारी रक्षा की है।अब जब तुम्हें मनुष्य जन्म मिला है, तो तन-मन से भक्ति कर लो। इस संसार में भी रामजी तुम्हारी रक्षा करेंगे।और कृपा करके, जीते जी सतशब्द की जागृति होना ही ब्रह्मलोक का पटा (द्वार) खुलना और बंधन टूटना है।महाराज अंत में कहते हैं: पहले भी सतशब्द की भक्ति करने वाले हुए हैं, और अब भी मेरे ज्ञान को वही धारण करेंगे जिनके हृदय में रामजी की प्राप्ति की सच्ची इच्छा है।
संतो से महाराज फरमाते हैं कि वो ही सच्चा शूरवीर है जो सामने से वार झेलता है और बढ बढकर दूसरो पर वार करता है। भक्ति करने वालों के जो शब्द की ध्वनि हो रही है वो ही झुंझावू बाजा बजना व भक्ति करने वाले अपने कानो से शब्द सुनते रहते है। जैसे शूरवीर के अठारा भार रोमावली खडी हो जाती है, वैसे ही भजन करने वालो के रग रग रोम रोम में शब्द का अनुभव होता है। शरीर को कांच की चूडी की तरह मिटता हुवा समझे व सब जगत को झूठा जाणे व किसी तरह का आड अटकाव व सूण जोतिष आदि को न मान कर तीर्थ व्रत मूर्ति पूजा व जगत के सब अंगो को छोड दे। महाराज फरमाते हैं कि वही जन शूरवीर है जो जगत में जंग जीतकर जाते है याने परमपद की प्राप्ति करते है।