चालोनी रे हंसा अपणे, राम जना रे देश।
वां पद कूं बंचे सदा रे, शिव सनकादिक शेष ॥ टेर ॥
या जुग में थिर कुछ नहीं रे, सुख दुख बारम्बार ।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश सारा, फिर फिर ले ले अवतार ॥ १ ॥
सुर नर सब सांसे पडया रे, जंवरो मांडयो जाल।
पीर पेगम्बर मुनी जना रे, से नही बचा काल ॥ २ ॥
जामण मरणा जहां नहीं रे, जहां नहीं सांसो सोग।
मोहो माया व्यापे नहीं, म्हारा सतगुराजी रे लोक ॥ ३ ॥
वा घर में नित ऊपजे रे, मुगता मोती हीर।
अनन्त हंस केल्या करे, कोई सुन्न सागर रे तीर ॥ ४ ॥
बोहता हंस बिराजिया रे, अजहूं बोहता जाय।
भय दुख तो तो व्यापे नहीं, म्हारा सतगुराजी रो साथ ॥ ५ ॥
केशर बरणा मारगा रे, आवे अमर बिवाण।
सामा संत बधावसी रे, धिन धिन करता बांण ॥ ६ ॥
अधर दीप वो जिगे मिगे रे, ज्यां में अमर ओवास ।
निरभे संत बिराजिया रे, ज्यां रो नहीं है बिणास ॥ ७ ॥
सदा सरीसी अवस्था रे, अमर संता री देह।
अनंत जुगा नहीं बिछडे रे, म्हारे नित नित नवला नेह ॥ ८ ॥
जन निपजे मरत लोक में रे, जय जय होय सुरलोक ।
बटे बधाया उण लोक में रे, कोई संत पधारे मोख ॥ ९ ॥
अगम अवाजा गेब की रे, गरज रहयो बैराट।
भवन भवन में चानणो रे, वांरो बदन करे भरलाट ॥ १० ॥
बार बार नर देही नहीं रे, करल्यो अपणो काज।
जन सुखिया इण जीव की रे, म्हारा सतगुरांजी ने लाज ॥ ११ ॥
हे हंसा! अपने राम जना के देश चलो — जिस पद की इच्छा शिव, सनकादिक, शेषजी तक रात-दिन करते हैं।इस जुग (युग) में कुछ भी स्थिर नहीं है — सुख-दुख भी बारंबार बारी-बारी से आते रहते हैं।ब्रह्मा, विष्णु, महादेव — जो इस सृष्टि के कर्त्ता हैं — उनकी भी आयु की अवधि है, वे भी आते-जाते रहते हैं।देवता और मनुष्यों सहित सबके जन्म-मरण का साँसा (भय) लगा हुआ है। काल ने सब पर जाल मांड रखा है — यहाँ तक कि पीर, पैग़म्बर, मुनीजन भी काल से नहीं बच सके।इसलिए सतगुरुजी के लोक चलो — जहाँ जन्म, मरण, सोग, मोह, माया कुछ भी नहीं है।उस घर — सतलोक में रोजाना हीरे-मोती उपजते हैं, और अनंत हंस वहां केलियाँ (आनंदमयी लीलाएं) कर रहे हैं।कई हंस वहाँ विराजमान हैं और वहां के आनंद को निरंतर ले रहे हैं। और अनेकों अब वहाँ जा रहे हैं।वहाँ पहुंचने के बाद न कोई भय रहता है, न कोई दुख। जो यहाँ ऐसी सच्ची भक्ति करते हैं, उन्हें लेने के लिए अमर विमान आता है — जो केसर वर्णा मार्ग से उन्हें लेकर जाता है।उस पद में विराजमान संत, ऐसे जाने वाले हंस की अगवानी करते हैं, उसे बधाते हैं, और कहते हैं — “धन्य-धन्य!”
अधर दीप — जो स्वप्रकाशवान देश है — उस पद की प्राप्ति होने पर हंस अमर हो जाता है।वहाँ सदा सरीसी अवस्था रहती है —
अर्थात सभी हंसों का एक ही दिव्य रूप होता है। उस पद की प्राप्ति के बाद हंस कभी बिछड़ता नहीं है।वहाँ सभी की अवस्था एक समान होती है, और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।अनंत युग बीत जाने पर भी हंस वहाँ से नहीं बिछड़ता, बल्कि रोजाना नए-नए आनंद अनुभव करता है।जो मृत्युलोक में आकर ऐसी सच्ची भक्ति करते हैं, उनकी देवलोक में जयजयकार होती है — और केवल पद में बधाइयाँ बाँटी जाती हैं कि: “आज मृत्युलोक से एक संत मोक्ष में पधार रहे हैं।”संतों के मोक्ष पधारने पर सतगुरु पद में अगम आवाज़ें, शब्द की अनहद ध्वनि सुनाई देती रहती है।और जब सारे शरीर में शब्द का अनुभव होता है — यही बेराट का गरजना है।
जब सभी स्थानों और पूरे शरीर में सतशब्द का अखंड अनुभव होता है — तो यही भवन-भवन में चानणो (प्रकाश होना) है,
और बदन का भरलाट करना (पूरा शरीर भर जाना) है।सतगुरु केवली भगवंतों के अणभै ज्ञान से भेद लेकर, सतगुरु पद की प्राप्ति करना ही
अपना काज करना है।सतगुरु केवली संतो की कृपा से ही जीव को उस पद की प्राप्ति हो सकती है।यह मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता — इसलिए अब विलंब न करो।