म्हारा सतगुरु आया ये सैयां, सब शहरा बटत बधाईयां ।। टेर ॥
नाम नूर वारे मुख पर सोहे, तेज पूंज प्रकाशा।
हंसा काज लिया अवतारा, ब्रह्म देश का वासी ॥ १ ॥
भक्त निशान अडिग ले रोप्या, घूरे अनाहद बाजा।
बेमुख जीव किया सब सनमुख, साध शकल शिर राजा ॥ २ ॥
अणभै ज्ञान अगम परवाना, दूर देशान्तर जावे।
प्रेम भाव पारसद अगवाणी, सूता जीव जगावे ॥ ३ ॥
भरम अंधेरी में सूरज उगा, अमत का मेह बूंठा।
जन सुखराम मिल्या गुरु बीरम, शब्द उजाला दीठा ॥ ४ ॥
(पहले सुखराम जी महाराज के समय उनके गुरु बीरमदास जी थे तब उनके गुरु के प्रति ये भाव थे)
महाराज फरमाते हैं: "आज हमारे गांव में ऐसे ओधाधारी सदगुरु पधारे हैं — पूरे नगर में बधाइयाँ बाँटी जा रही हैं।उनके मुख पर नाम का नूर चमक रहा है — जैसे कोई तेज-पुंज का दिव्य प्रकाश हो।
वे हंसवृत्ति आत्माओं के उद्धार के लिए ही ब्रह्मदेश से अवतार लेकर पधारे हैं।
सताधारी संत केवल केवल की भक्ति का ही उपदेश करते हैं — वही अडिग निशान इस जग में रोपना है।
रटना हो या बिना रटना, शब्द की ध्वनि स्वयं हो रही है — यही अनहद बाजा का घुरना है।
जो इस भक्ति से बेमुख थे, उन्हें ज्ञान के द्वार से जोड़कर भक्ति में सन्मुख किया।
ऐसे संत ही सबसे श्रेष्ठ हैं।सतशब्द का अनुभव और साधन केवल अणभै ज्ञान से ही केवल पद आनंद पद की प्राप्ति कराता है — यही है अगम परवाना और दूर देशांतर जाना।
प्रेम और भाव से भजन करना, और भक्ति में लगना — यही पारसद की अगवानी है और सुता जीव का जागना है।जब केवल ज्ञान का प्रकाश होता है और भ्रम मिटते हैं, तो यही है — सूरज का उगना।जब अखंड आनंद का अनुभव होता है,
तो वही है — अमृत का मेह बूठना।महाराज फरमाते हैं: “सतगुरु बीरमदास जी महाराज की कृपा से ही मुझे सतशब्द के प्रकाश का अनुभव हुआ है।”