मेरे लागी हो ऊर शब्द भाल, क्या करिये जुग किरत ख्याल ॥ टेर ॥
जे मन घेर राखूं ऊर मांय, तो तन टूक टूक होय जाय।
मेरे बस नहीं ओ मन होय, बिरह धाहा पुकारे जोय ॥ १ ॥
अक बक जीव भयो मन मोय, जुग कुल लाज न कोय।
रूम रूम कह राम राम, कब हर परसुं निज धाम ॥ २ ॥
ज्यों जग में सेण न दिसे कोय, सबे नर नार जमा सम होय।
कह सुखराम गुरु धिन कवाय, के राम स्नेही जे जुग मांय ॥ ३ ॥
Harjas Pad Raag Basant (11)
Mere laagi ho oor shabd bhaal, kya kariye jug kirat khyaal. ॥ Ter ॥
Je man gher raakhu oor maay, to tan took took hoy jaay.
Mere bas nahin o man hoy, birah dhaaha pukare joy. ॥ 1 ॥
Ak bak jeev bhayo man moy, jug kul laaj na koy.
Room room kah Ram Ram, kab har parsun nij dhaam. ॥ 2 ॥
Jyon jag mein sen na dise koy, sabe nar naar jama sam hoy.
Kah Sukhram guru dhin kavay, ke Ram snehi je jug maay. ॥ 3 ॥
विरह और भक्ति का भाव
जगत की करनियों और क्रियाओं को त्यागकर, हर समय निज नाम की भक्ति में लगना — यही है हृदय में शब्द का भाल (तीर) लगना।
जब मैं मन को समझाकर, भक्ति के मार्ग पर टिकाए रखता हूँ, तो शरीर को कष्ट होता है — यही “टूक-टूक होना” है।यह मन मेरे वश में नहीं है, परंतु फिर भी यह रात-दिन विरह भाव से आपका भजन करता रहता है।संसार और कुल की लज्जा छोड़कर, केवल आपकी भक्ति में लग जाना — यही है "अक-बक" होना (लोक-लाज खो देना)।रोम-रोम में राम-राम गूंज रहा है, और मन में केवल यही तड़प है — "कब मुझे केः पद और आः पद की प्राप्ति होगी?"इस संसार में कोई भी सच्चा हितैषी नहीं दिखता, सभी स्त्री-पुरुष भक्ति में विघ्न डालने वाले प्रतीत होते हैं।महाराज अंत में कहते हैं: सतगुरु रामजी महाराज धन्य हैं, और वे सभी सतसंगी भी धन्य हैं जो रामजी की भक्ति में लगे रहते हैं।