Friday, November 21, 2025

Mere laagi ho oor shabd bhaal मेरे लागी हो ऊर शब्द भाल_हरजस पद राग बसन्त (११) 

 मेरे लागी हो ऊर शब्द भाल, क्या करिये जुग किरत ख्याल ॥ टेर ॥ 
 जे मन घेर राखूं ऊर मांय, तो तन टूक टूक होय जाय।
 मेरे बस नहीं ओ मन होय, बिरह धाहा पुकारे जोय ॥ १ ॥ 
 अक बक जीव भयो मन मोय, जुग कुल लाज न कोय। 
रूम रूम कह राम राम, कब हर परसुं निज धाम ॥ २ ॥ 
 ज्यों जग में सेण न दिसे कोय, सबे नर नार जमा सम होय।
 कह सुखराम गुरु धिन कवाय, के राम स्नेही जे जुग मांय ॥ ३ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (11)
 Mere laagi ho oor shabd bhaal, kya kariye jug kirat khyaal. ॥ Ter ॥
 Je man gher raakhu oor maay, to tan took took hoy jaay.
 Mere bas nahin o man hoy, birah dhaaha pukare joy. ॥ 1 ॥
 Ak bak jeev bhayo man moy, jug kul laaj na koy. 
 Room room kah Ram Ram, kab har parsun nij dhaam. ॥ 2 ॥
 Jyon jag mein sen na dise koy, sabe nar naar jama sam hoy. 
 Kah Sukhram guru dhin kavay, ke Ram snehi je jug maay. ॥ 3 ॥

 विरह और भक्ति का भाव जगत की करनियों और क्रियाओं को त्यागकर, हर समय निज नाम की भक्ति में लगना — यही है हृदय में शब्द का भाल (तीर) लगना। जब मैं मन को समझाकर, भक्ति के मार्ग पर टिकाए रखता हूँ, तो शरीर को कष्ट होता है — यही “टूक-टूक होना” है।यह मन मेरे वश में नहीं है, परंतु फिर भी यह रात-दिन विरह भाव से आपका भजन करता रहता है।संसार और कुल की लज्जा छोड़कर, केवल आपकी भक्ति में लग जाना — यही है "अक-बक" होना (लोक-लाज खो देना)।रोम-रोम में राम-राम गूंज रहा है, और मन में केवल यही तड़प है — "कब मुझे केः पद और आः पद की प्राप्ति होगी?"इस संसार में कोई भी सच्चा हितैषी नहीं दिखता, सभी स्त्री-पुरुष भक्ति में विघ्न डालने वाले प्रतीत होते हैं।महाराज अंत में कहते हैं: सतगुरु रामजी महाराज धन्य हैं, और वे सभी सतसंगी भी धन्य हैं जो रामजी की भक्ति में लगे रहते हैं।

जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं

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