Friday, November 21, 2025

Koi osa hai jan sant sujaan कोई ओसा है जन संत सुजाण_ हरजस पद राग बसन्त (६) 

 कोई ओसा है जन संत सुजाण, निज निरगुण सेव बतावे आंण ॥ टेर ॥ 
 जप तप तीरथ धाम सोय, पुर जिग्य ज्योग सब बास जोय ।। 
ओ सबे रीत सुरगुण मांय जांण, चरच पूजकर जप ठांण ॥ १ ॥ 
 सुण पढत ज्ञान अदभूत कोय, सुणबाय बेण बोहो विध होय।
 जप जाप सूरत मन करे सेव, धुन ध्यान ज्याहां लग माया देव ॥ २ ॥
 ओऊं शब्द के सोऊं सोय, सुरगुण मूल तो ओज होय। 
ममंकार सो माया जांण, मन जीभ चढे सो सरब ठांण ॥ ३ ॥ 
 करद शब्द के अरथ सोय, मन सूरत पढत सो माया होय।
 चित क्रिया होय बात ठांण, जब लग सुरगुण असल बखाण ॥ ४ ॥
 भजन पूर कर राम गाय, सत निरगुण शब्द है सहज मांय।
 मत भूल केवता सुणे जोय, सुण अरध शब्द गम रटया होय ॥ ५ ॥
 जब ओर आंण कर कहे कोय, मन जीभ समझ ज्यों तुरत होय।
 जन कहत देव सुखदेव जान, ऊ अरध शब्द नहीं भरम मान ॥ ६ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (6)
 Koi osa hai jan sant sujaan, nij nirgun sev batave aan. ॥ Ter ॥ 
Jap tap teerath dhaam soy, pur jigy jyog sab baas joy.
 O sabe reet surgun maay jaan, charach poojkar jap thaan. ॥ 1 ॥
 Sun padat gyaan adbhut koy, sunbaay ben boho vidh hoy. 
 Jap jaap surat man kare sev, dhun dhyaan jyaah lag maaya dev. ॥ 2 ॥
 Oon shabd ke soon soy, surgun mool to oj hoy.
 Mammkaar so maaya jaan, man jeebh chadhe so sarb thaan. ॥ 3 ॥
 Karad shabd ke arth soy, man surat padat so maaya hoy.
 Chit kriya hoy baat thaan, jab lag surgun asal bakhaan. ॥ 4 ॥ 
Bhajan pur kar Ram gaay, sat nirgun shabd hai sahaj maay. 
 Mat bhool kevta sune joy, sun ardh shabd gam ratya hoy. ॥ 5 ॥ 
Jab or aan kar kahe koy, man jeebh samajh jyon turat hoy. 
 Jan kahat dev Sukhdev jaan, oo ardh shabd nahin bharam maan. ॥ 6 ॥

 निर्गुण भक्ति और सतशब्द का रहस्य कोई ऐसा सच्चा समझदार संत हो, जो निर्गुण भक्ति का वास्तविक भेद बताए — वह भक्ति जो आत्म-चेतना के आधार से, आत्मा को निरंजन, निराकार पद में स्थित करती है, जहाँ वाणी और बिना वाणी के भी शब्द अखण्ड रूप से चलता है। जो जप, तप, तीर्थ-यात्रा, पुरियों में जाना, जीग (यज्ञ), योग, उपवास आदि करते हैं — वह सब सगुण भक्ति की विधियाँ हैं। पूजा करना, चन्दन चढ़ाना, जप करना — यह सब भी सगुण (मूर्त रूप) की उपासना है।कुछ लोग अद्भुत-अद्भुत ज्ञान ग्रंथ पढ़ते हैं, और विभिन्न विधियों से भाषण करते हैं। कुछ सूरत और मन को लगाकर जप-जाप, ध्यान और धुन करते हैं — परंतु यह सभी माया के पद में आते हैं।ओंकार (ओऊं) और सोहं (सोऊं) का जपा-अजपा करना भी सगुण भक्ति का मूल है।“ममंकार” (मैंपन) भी माया है, मन से ज्ञान करना, जीभ से बोलना — यह सब भी माया का कार्य है।चित लगाकर भजन करना, या किसी भी प्रकार की क्रिया-साधना करना, यह सब भी सगुण सेवा है।किन्तु, जब कोई सतगुरु की विधि से, पूर्ण प्रेम और श्रद्धा से रामजी का भजन करता है, तभी उसे सतशब्द का अखण्ड अनुभव होता है — और यही अनुभव 'निर्गुण शब्द' कहलाता है।महाराज चेतावनी देते हैं: दूसरों की कही बातों को सुनकर मत भटको। जो केवल “अर्ध शब्द” का रटना है, उससे वास्तविक ज्ञान नहीं होता।अगर कोई व्यक्ति आकर यह कहे कि "ज्ञान मन, वाणी और समझ के आधार पर होता है, और वही ररंकार है" — तो महाराज कहते हैं — यह भ्रम है, भरम है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...