Friday, November 21, 2025

Sant sunjyo ho satshabd vichaar संत सुणज्यो हो सतशब्द विचार_हरजस पद राग बसन्त (२) 

 संत सुणज्यो हो सतशब्द विचार, अखण्ड शब्द सोई तत सार ।। टेर ॥ 
 बोले बेण जीभ मुख मांय, से सब क्षिण खुट जम खाय।
 मंत्र विध अनेकूं होय, माया सरूपी है शब्द दोय ॥ १ ॥
 कही सुणी कया सुंई होय, तहां लग चार काल की जोय। 
सूरत समझ मन के बस थाय, जब लग काल धरे मुख मांय ॥ २ ॥
 मन सुं गहया नेक न थुमे जोय, जो भी शब्द नही असल थाय।
यो इतना को कहिये मूल, तहां लग काल करम की चूल ॥ ३ ॥
 कह सुखदेव राम सो गाय, अरध शब्द देख्याज मांय। 
सूरत निरत मन बस नांय, सो सुण शब्द अखण्ड हम मांय ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (2)
 Sant sunjyo ho satshabd vichaar, akhand shabd soi tatt saar. ॥ Ter ॥
 Bole ben jeebh mukh maay, se sab kshin khut jam khaay.
 Mantra vidh anekun hoy, maaya sarupi hai shabd doy. ॥ 1 ॥
 Kahi suni kaya suni hoy, tahan lag chaar kaal ki joy. 
 Surat samajh man ke bas thaay, jab lag kaal dhare mukh maay. ॥ 2 ॥ 
Man sun gahaya nek na thume joy, jo bhi shabd nahi asal thaay.
 Yo itna ko kahiye mool, tahan lag kaal karam ki chool. ॥ 3 ॥
 Kah Sukhram Ram so gaay, ardh shabd dekhyaaj maay. 
 Surat nirat man bas naay, so sun shabd akhand hum maay. ॥ 4 ॥

 संतों से महाराज फरमाते हैं — सतशब्द का गहन विचार सुनो, जो शब्द अखण्ड (अनवरत, अविनाशी) है, वही ब्रह्म का "निज नाम" है। जो भी शब्द जीभ और मुख से उच्चरित होते हैं, वे केवल ध्वनि मात्र हैं — उनसे जन्म और मरण का चक्र समाप्त नहीं होता।अनेक प्रकार के मंत्रों के जप, ओंकार (ओऊं) और सोहं (सोऊं) जैसे साधन — ये सब माया के पद में आते हैं, इनसे मुक्ति नहीं मिलती।कथाएँ सुनना और कहना, या किसी भी धार्मिक कार्य को केवल परंपरा के अनुसार करना — ये सब भी काल के अधीन हैं।यहाँ तक कि जो लोग समझदारी और मन-ध्यान के आधार से साधन करते हैं, उन्हें भी काल निगल जाता है।जो शब्द मन को थामने से थोड़ी देर ठहर जाए, वह भी अस्थायी है — वह सतशब्द नहीं है।इन सब साधनों का आधार श्वांस (प्राणवायु) है, और जब तक साधन श्वांस के अधीन है, तब तक काल और कर्म से छुटकारा संभव नहीं।महाराज कहते हैं — जब मैंने सतगुरु की विधि से रामजी का भजन किया, तब मुझे उस आधे शब्द, अर्थात "ररंकार" का अनुभव हुआ।वह शब्द ऐसा है, जो सूरत, निरत और मन — तीनों के वश में नहीं आता। यह शब्द अनुभव से प्रकट होता है, किसी क्रिया या अभ्यास से नहीं।अब मुझे उस अखण्ड शब्द का लगातार अनुभव हो रहा है, जो सतशब्द है — वही सच्चा और अनन्त ध्वनि रूप परम तत्व है।इस अनुभव में ब्रह्माण्ड की सारी सीमाएं पार होती हैं, और चेतना पारब्रह्म से भी ऊपर,उसके अधर स्थान तक पहुँचने लगती है।यह अनुभव वही कर सकता है, जो सतगुरु की विधि से, मन और इन्द्रियों से परे शब्द की ध्वनि में लीन हो जाए। संतो से महाराज फरमाते हैं कि सतशब्द का विचार सुणो, जो शब्द अखण्ड है वो ही ब्रह्म का निज नाम है। मुंह से जीभ के द्वारा जो भी बचन बोलने में आते है उनसे जन्म मरण नहीं मिटता। अनेक तरह के मंत्रो से जप करने की विधि है व ओऊं सोऊं का साधन ये सब माया के पद में है। कथा करना व सुनना, कहे माफिक कोई भी काम करना, ये सब काल के वश में है, समझ कर सूरत व मन के आधार से साधन करने वालो को भी काल खा जाता है। मन के ठहराने से जो शब्द थोडी देर ठहर जाता है वो शब्द भी असत है, सतशब्द नहीं है। ये साधन श्वांसा के आधार से होते है। इन साधनो से काल कर्म से छुटकारा नहीं होता। महाराज फरमाते हैं कि सतगुरु विधि से रामजी का भजन कर उस आधे शब्द याने ररंकार का अनुभव किया, वो शब्द सूरत निरत मन के वश में नहीं है। उस शब्द का मुझे अखण्ड अनुभव हो रहा है। वो ही सतशब्द है। ब्रह्मण्ड व अनुभव हो रहा है। पार ब्रह्म से ऊपर अधर

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...