Shabd chetan deh chamke शब्द चेतन देह चमके_हरजस पद राग मिश्रीत (२१)
शब्द चेतन देह चमके, ईमरत मीठी सीर, नाड नाड न्यारी।
सरब बोले जागो सहेर गंभीर, मूरली बाजे सुषमण तीर ।। १ ।।
हिरदे हल चल नाभ गूंजे, नेणा बंठा नीर।
छेद प्याल पिछम कूं देख्या, परस्या जम का पीर ।। २ ।।
बंध पिछम बोहोत भारी, मन मध मीठी पीर।
खांच खेंच कबाण चढे छतियां, फाटे चुव चीर ।। ३ ।।
अला पिंगला सुखमणा जागी, मिल तिरवेणी तीर।
प्राण उलट आद घर आये, थके बैराट शरीर ।। ४ ।।
ध्यान लागो जोत देखी, सुषमण टपक्या हीर।
दास सुखदेव अमर घर में, पीवे ईमरत सीर ।। ५ ।।
Harjas Pad Raag Mishrit (21)
Shabd chetan deh chamke, imrat meethi seer, naad naad nyaari.
Sarab bole jaago saher gambhir, murli baje sushman teer. ॥ 1 ॥
Hirde hal chal naabh goonje, nena bantha neer.
Ched pyaal pichham ku dekhiya, parsya jam ka peer. ॥ 2 ॥
Bandh pichham bohot bhaari, man madh meethi peer.
Khaan khench kabaan chadh chhatiyaan, faate chuv cheer. ॥ 3 ॥
Ala pingla sukhmana jaagi, mil tirveni teer.
Praan ulat aad ghar aaye, thake bairaat shareer. ॥ 4 ॥
Dhyaan laago jot dekhi, sushman tapkya heer.
Daas Sukhdev amar ghar mein, peeve imrat seer. ॥ 5 ॥
शब्द की जागृति और उसका अनुभव
शब्द की जागृति जब चेतन (चैतन्य आत्मा) के द्वारा होती है, तो देह में प्रकाश (चमक) उत्पन्न होता है, और उस अनुभव से जो आनन्द आता है, वही ईमरत की मीठी सीर (अमरता की मधुर धारा) कहलाती है।जब समूचे शरीर की नाड़ियों-नाड़ियों में शब्द का अनुभव होता है, तो यह सभी इन्द्रियों का बोलना माना जाता है। शब्द की ध्वनियाँ जब भीतर गूंजती हैं,
तो वह जैसे मुरली बजने के समान होती हैं।प्रेमभाव से किया गया भजन, हृदय में हलचल उत्पन्न करता है — यह अंदरूनी जागरण का प्रतीक है।नाभि में जब शब्द गूंजता है, तो यही “नाभि गुंजे” कहलाता है।विरह भाव से जब भजन होता है, तो नेत्रों से अश्रुधारा बहती है —
यही "नेणा बुठा नीर" (आँखों से बहता प्रेम का जल) है।शेषजी और गणेशजी के स्थानों (ऊर्जा केन्द्रों) को छेदकर जब चेतना पश्चिम दिशा की ओर जाती है, तो इसे “पिछम को देखना” कहते हैं — अर्थात चेतना का सूक्ष्म मार्ग में प्रवेश।मेरुदण्ड (spinal cord) में जब शब्द का अनुभव होता है, तो वही “परस्या जम का पीर” (काल के दुख का अंत) कहलाता है।उत्तान पाद बंद (योग की क्रिया) से जब मेरुदण्ड पर प्रभाव पड़ता है, तो शरीर कमान की तरह खिंचता है, और यही अनुभूति है “छातियाँ फाटे, चुव चीर” — अर्थात हृदय विदीर्ण हो उठता है आनंद के वेग से।उस स्थिति में जब भीतर मन में आनन्द उठता है, तो वही “मन मध मीठी पीर” कहलाती है — एक मधुर दर्द, जो विरह और मिलन का संगम होता है।मेरुदण्ड में इड़ा और पिंगला दो धाराएँ चलती हैं, बीच में सुषुम्ना ऊपर सिर की ओर जाती है, और त्रिकुटी में इनका संगम होता है — यही सूक्ष्म ध्यान की संधि बिंदु है।जब प्राण, स्वांस और शरीर से चेतना अलग हो जाती है, तो जीव को "केः पद" (परम स्थिति) की प्राप्ति होती है — इसे ही “आद घर” (मूल निवास) कहा गया है। उस समय विराट शरीर (स्थूल देह) थक जाता है और छूटने लगता है।सुषुम्ना में शब्द का ध्यान ही “जोती का देखना” है — अर्थात अंतर की दिव्य ज्योति का दर्शन।इस अनुभव से जो आनन्द उठता है, वह “हीर टपकना” है — अमूल्य सुख-रूप मोती जैसे टपकते हैं।महाराज फरमाते हैं: जब आः पद (परम अवस्था) की प्राप्ति होती है, तो वही “ईमरत की सीर पीना” कहलाता है — अर्थात अमरता के अमृत का स्वाद प्राप्त होना।
शब्द की जागृति का चेतन द्वारा अनुभव होना ही देह चमकना व उसका आनन्द आना ही ईमरत मीठी सीर है। सारे शरीर में नाड नाड में शब्द का अनुभव होना ही सबका बोलना है व शब्द की ध्वनियां होना ही मूरली बाजना है। प्रेम भाव से भजन करना ही हिरदे में हलचल होना है। नाभी में शब्द का गुंजार होना ही नाभ गुंजे है। विरह के साथ भजन करने से नेत्रो में पानी आना ही नेणा बुठा नीर है। शेषजी व गणेशजी के स्थानो को छेदकर पिछम में आना ही पिछम को देखना है। मेरूडण्ड पर शब्द का अनुभव होना ही परस्या जम का पीर है। पिछम में उतान पाद बंद मेरूडण्ड पर लगता है जिससे शरीर कबाण की तरह खिंचना ही छातियां फाटे चुव चीर है। उससे मन में खुशी होना ही मन मध मीठी पीर है। मेरूडण्ड से अला पिंगला चलती है, बीच में सुखमणा सिर पर होकर जाती है व त्रिकुटी में संगम हो जाता है। प्राणो व स्वांसा व शरीर से अलग होकर केः पद की प्राप्ति होना ही आद घर की प्राप्ति होना व बैराट शरीर का थकना है। शब्द का सुखमणा में ध्यान होना ही जोती का देखना है। आनन्द आना ही हीर टपकना है। महाराज फरमाते हैं कि आः पद की प्राप्ति होना ही ईमरत की सीर पीना है।