धिरग धिरग सो नर नार कवाय, हर पथ छाड जम गेल जाही ।। टेर ॥
जन संग छाड ठग संग कीन, लाडूज तज मुख भीष्ट लीन।
नर अमर बेल कूं खिणे आय, जल तुछ बेल कूं पावे है जाय ॥ १ ॥
परण्यो पीव पर हरयो संग, नीच यार संग रची रंग।
गज से उतर चढ्यो खर आय, ईमरत छाड विषे मत खाय ॥ २ ॥
सांच छाड गहे झूठ कोय, धन गांठ भव ज्यां हां हरे सोय।
जन केत देव सुखदेव आंण, फिट शुभ छाड गहे अशुभ जांण ॥ ३ ॥
Harjas Pad Raag Basant (7)
Dhirag dhirag so nar naar kavay, har path chhad jam gel jaahi. ॥ Ter ॥
Jan sang chhad thag sang keen, laaduj taj mukh bhisht leen.
Nar amar bel ku khine aay, jal tuchh bel ku paave hai jaay. ॥ 1 ॥
Paranyo peev par haryo sang, neech yaar sang rachi rang.
Gaj se utar chadhyo khar aay, imrat chhad vishe mat khaay. ॥ 2 ॥
Saanch chhad gahe jhooth koy, dhan gaanth bhav jyaan haan hare soy.
Jan ket dev Sukhdev aan, phit shubh chhad gahe ashubh jaan. ॥ 3 ॥
सत को त्यागने वालों के लिए धिक्कार
महाराज कहते हैं — उन सभी स्त्री-पुरुषों को धिक्कार है, धिक्कार है जो परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग को त्यागकर, जन्म-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं।जो संतों का साथ छोड़कर, ठगों और मायावियों का संग करते हैं — उन्हें फिटकार है।जो लड्डुओं जैसे अमृत रूपी सत्संग को छोड़कर, मुंह में मैल भरते हैं, अर्थात मिथ्या और विषय-वासना को ग्रहण करते हैं — वे विनाश को बुलाते हैं।जो मनुष्य अमर बेल (अविनाशी साधना) को नष्ट करते हैं, और साधारण बेल (मायिक क्रियाएं) को सींचते हैं — वे अपनी बुद्धि खो चुके हैं।जो स्त्रियाँ अपने धर्मपरायण पति को त्यागकर, नीच पुरुषों का संग करती हैं — वह गंभीर पतन को प्राप्त होती हैं।जो हाथी जैसे सतगुरु ज्ञान को छोड़,
गधे जैसे झूठे आडंबर पर चढ़ते हैं, वो आत्मा को नीच योनि में ले जाते हैं।जो अमृत (सतशब्द) को त्यागकर, जहर (माया) को अपनाते हैं — वे **खुद अपना नाश करते हैं।जो सत्य को छोड़कर, झूठ को पकड़ते हैं, वे साक्षात अंधकार की ओर बढ़ते हैं।जो अपनी गांठ (साधना व आत्मा की पूंजी) को चुराने वालों का साथ करते हैं, और लालच, भ्रम, व मोह में फँसते हैं — वे मोक्ष से दूर हो जाते हैं।
महाराज अंत में कहते हैं: जो लोग जान-बूझकर शुभ को छोड़कर अशुभ को अपनाते हैं, उन्हें बार-बार फिटकार, धिक्कार, और पछतावा ही मिलता है।