कह गीता हो सुण वेद चार, हर नांव तत सुंई तत सार ।। टेर ॥
पुराण अठारे भरत साख, शिव शेष संत सो केहे भाख ॥
ग्रन्थ और सब जोय जोय, सब मांही बीज कण नांव होय ॥ १ ॥
आन धरम सब मिटे है सोय, सुण राम नाम जुग अटल जोय।
परापरी लग संत कवाय, सत राम नाम जन केत जाय ॥ २ ॥
चवदे पूरब कथा जोय, हर रामायण सा ग्रन्थ होय ।
बांच बांच सो कहे, धाम सत स्वरूप सम नहीं किशन राम ॥ ३॥
केत देव सुखदेव पेख, निज नाम सम नहीं अवर देख ॥ ४ ॥
Harjas Pad Raag Basant (4)
Kah Geeta ho sun ved chaar, Har naam tatt suni tatt saar. ॥ Ter ॥
Puran athaare Bharat saakh, Shiv Shesh sant so kehe bhaakh.
Granth aur sab joy joy, sab maahi beej kan naam hoy. ॥ 1 ॥
Aan dharam sab mite hai soy, sun Ram naam jug atal joy.
Paraapari lag sant kavay, sat Ram naam jan ket jaay. ॥ 2 ॥
Chavde poorab katha joy, Har Ramayan sa granth hoy.
Baanch baanch so kahe, dhaam sat swaroop sam nahin Kishan Ram. ॥ 3 ॥
Ket dev Sukhdev peikh, nij naam sam nahin avar dekh. ॥ 4 ॥
राम नाम की महिमा और शास्त्रों की साक्षी
महाराज फरमाते हैं: इस संसार में सभी जीव मरते हैं, चाहे वे लोकपाल, सूर (देवता), शेषनाग, या कोई महान योद्धा ही क्यों न हों।
जप, तप, योग और व्रत — जिन्हें लोग बड़े साधन समझते हैं — ये सब भी काल के प्रभाव में नष्ट हो जाते हैं।गीता और चारों वेद भी यही कहते हैं — कि "परमात्मा का नाम ही सबसे श्रेष्ठ है।" और इसकी पुष्टि अठारहों पुराण भी करते हैं।शिवजी, शेषजी, और समस्त संतों का भी यही मत है — कि राम नाम ही सत्य है, शाश्वत है।जब सभी ग्रंथों का अवलोकन किया गया, तो पाया कि — हर ग्रंथ में "राम नाम" ही कण और बीज की तरह उपस्थित है।अन्य धर्म, जो केवल माया पर आधारित हैं, वे समय के साथ मिट जाते हैं। परंतु राम का नाम, अनेक युगों से अटल और अडोल बना हुआ है।"परापरी", अर्थात आदि युगों के संतों ने भी राम नाम को ही "सत" (सत्य) कहा है।चौदह भाषाओं में जो भी कथाएँ कही गई हैं, उनका भी जब विवेचन किया गया, तो यही पाया कि — रामायण जैसे महान ग्रंथ भी, बार-बार यही दोहराते हैं कि — "राम" ही सत्स्वरूप हैं, और उनके बराबर राम और कृष्ण जैसे अवतार भी नहीं ठहरते।तीनों लोकों में, जो भी साधन जप, जाप, तप कहे जाते हैं — उन सभी का मूल्य तभी है जब वे परम ब्रह्म के निज नाम से जुड़ें।महाराज अंत में कहते हैं: "सबको देखो, सबको परखो — पर ब्रह्म के नाम और निज नाम के बराबर कोई भी साधन नहीं है।"