Thursday, November 20, 2025

Santo bhai o kyon mokh na jaave संतो भाई ओ क्यों मोख न जावे_हरजस पद राग मिश्रीत (२३) 

 संतो भाई ओ क्यों मोख न जावे, नांव बिना गत पावे ।। टेर ।। 
 गडरी सरभर गरीब न कोई, सिंघ सम नहीं सेंठा। वैश्या आस शकल की राखे, कोडी जुग सुं रूठा ॥ १ ॥
 कवो कडवी बांण बोले, मैना बैण सुं प्यारा। रासब रोडी ज्यां त्यां लोटे, अजिया कीच तज गारा ॥ २ ॥ 
 लुंकी बाघ बघेरा बन में, स्याल सुषा बोहो होई। बस्ती बीच स्वान रहे मिनकी, अर जगत रह लोई ॥ ३ ॥ 
 तिरिया समझ रमे सुख सेजा, कोही भोलप हुवे संगा। कह सुखराम थके गुण नांही, गरभ बंधे घट चंगा ॥ ४॥ 

Harjas Pad Raag Mishrit (23)
 Santo bhai o kyon mokh na jaave, naam bina gat paave. ॥ Ter ॥ 
Gadri sarbhar gareeb na koi, singh sam nahin sentha. 
 Vaishya aas shakal ki rakhe, kodi jug sun rootha. ॥ 1 ॥ 
Kavo kadvi baan bole, maina bain sun pyaara.
 Raasab rodi jyaan tyaan lote, ajia keech taj gaara. ॥ 2 ॥
 Lunki baagh baghera ban mein, syaal sushah boho hoi.
 Basti beech swaan rahe minki, ar jagat rah loi. ॥ 3 ॥
 Tiriya samajh rame sukh seja, kohi bholap huve sanga.
 Kah Sukhram thake gun naahee, garbh bandhe ghat changa. ॥ 4 ॥ 

मोक्ष की राह और सतगुरु भक्ति का रहस्य संतों से महाराज फरमाते हैं —
 लोग मोक्ष को क्यों नहीं प्राप्त कर पाते? क्योंकि बिना "निज नाम" (अंतरात्मा का सत्य ज्ञान) के किसी को भी मोक्ष नहीं मिलता।उदाहरण स्वरूप:गाड़र (भेड़) जैसा नम्र और सीधा प्राणी कोई नहीं।सिंह जैसा बलशाली भी कोई नहीं होता।वैश्या सदैव शरीर की सुंदरता पर आश्रित रहती है — उसी में उसकी आशा बंधी होती है।कोढ़ी मनुष्य को यह संसार और जीवन अच्छा नहीं लगता — उसे विकार से घृणा हो जाती है।कौवा कर्कश और कड़वी वाणी बोलता है, जबकि मैना मीठा बोलती है।गधा गंदगी (रोटी और कूड़े) पर कहीं भी लौटता फिरता है।बकरी कभी कीचड़ या गीली मिट्टी में खड़ी नहीं रहती — स्वभाव से साफ-सुथरी होती है।महाराज आगे संकेत देते हैं:जंगल में लोमड़ी, बाघ, बघेरा, श्याल, सुस्या आदि हिंसक जीव रहते हैं। लेकिन गांव के अंदर कुत्ता-बिल्ली और संसारी जीव रहते हैं — जो घर के वातावरण में रहते हुए भी भक्ति से दूर हैं।फिर महाराज एक गूढ़ संकेत देते हैं:स्त्री और पुरुष जब सुख की सेज (शारीरिक मिलन) में एक होते हैं, तो गर्भ की इच्छा न रखने पर भी गर्भ ठहर जाता है — क्योंकि संग (संपर्क) का प्रभाव प्रकट होकर ही रहता है।ठीक उसी तरह, जब सतगुरु की विधि से भजन किया जाता है, तो शब्द की जागृति होती है, और फिर आत्मा को "केः पद" व "आः पद" — अर्थात परम स्थिति और अमर ज्ञान — की प्राप्ति होती है।इसका सच्चा अनुभव केवल वही कर सकता है — जो वास्तव में भजन करता है, सतगुरु की बताई विधि से। संतो से महाराज फरमाते हैं कि ये मोक्ष क्यों नहीं जाते है। बिना निज नांव के किसी को भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। गाडर की बराबर कोई गरीब (नम्र) जानवर नहीं है, सिंह के बराबर कोई बलशाली नहीं है। वैश्या शकल की आशा रखती है। कोडी मनुष्य को जीना जगत में अच्छा नहीं लगता। कौवा कडवी व मैना मीठी वाणी बोलती है। गधा जहां तहां रोडी पर लौटता है। बकरी कीचड व गीली मिट्टी में खडी नहीं रहती है। जंगल में लोमडी बाघ बघेरा श्याल सुस्या बहुत होते है। गांव के अन्दर कुता बिल्ली व संसारी रहते है। स्त्री के साथ सुख सेज में गर्भ की इच्छा नहीं करते हुये भी गर्भ रह जाता है। महाराज फरमाते हैं कि साथ करने का गुण प्रकट हुये बिना नहीं रहता। ऐसे ही सतगुरु विधि से भजने पर शब्द की जागृति होकर केः पद आः पद की प्राप्ति होती है। इसका अनुभव भजन करने वालो को होता है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...