Thursday, November 20, 2025

Santo bhai bhev milya gam aave संतो भाई भेव मिल्या गम आवे_हरजस पद राग मिश्रीत (२२) 

 संतो भाई भेव मिल्या गम आवे, परम मोख पद पावे ॥ टेर ।। 
 राम नाम सब लोय कहत है, दर्शण भेष ऊचारे।
 हिकमत बिन तो राछ सुंरे, सबे पचे पच हारे ॥ १ ॥
 नित उठ दौड करत है भारी, गांव गेल नहीं जांणे।
 उजड गांव तोड पग बैठा, नगर सुख क्यूं मांणे ॥ २ ॥ 
 देह बिध धार सकल आवे, सब बाता सुणिया बिना ही आवे।
 कह सुखराम मोख राह झीणी, सतगुरु बिन क्यों पावे ॥ ३ ॥
 Harjas Pad Raag Mishrit (22) 
Santo bhai bhev milya gam aave, param mokh pad paave. ॥ Ter ॥ 
Ram naam sab loy kehat hai, darshan bhesh uchhaare. 
 Hikmat bin to raach sunre, sabe pache pach haare. ॥ 1 ॥
 Nit uth daud kart hai bhaari, gaav gel nahin jaane.
 Ujad gaav tod pag baitha, nagar sukh kyu maane. ॥ 2 ॥ 
Deh bidh dhaar sakal aave, sab baata suniya bina hi aave.
 Kah Sukhram mokh raah jheeni, satguru bin kyon paave. ॥ 3 ॥ 

भजन का भेद और मोक्ष की प्राप्ति संतों से महाराज फरमाते हैं कि — 
भजन करने का वास्तविक भेद और उसका सच्चा ज्ञान जब प्राप्त होता है, तभी परम मोक्ष की प्राप्ति संभव है।इस संसार में अनेक लोग राम-राम करते हैं, दरशनधारी हैं, बाह्य वेशधारी हैं — किन्तु राम-राम कैसे करना है, इसका भेद वे नहीं जानते। इसीलिए उन्हें सतशब्द की जागृति नहीं होती।यह स्थिति ऐसी ही है जैसे — बिना हिकमत (बुद्धिमत्ता) के राक्षस से बार-बार हार जाना। अर्थात — बिना विवेक और ज्ञान के जीवन व्यर्थ चला जाता है।जैसे कोई किसी गाँव में जाना चाहता है, लेकिन रास्ता ही नहीं जानता, तो चाहे वह कितना भी चलता रहे, वह गाँव कभी नहीं पहुँच सकता। वह तो उजाड़ (निर्जन) मार्ग में भटक रहा है — तो फिर गाँव तक पहुँचना और वहाँ का सुख कैसे पाएगा? ठीक वैसे ही, हर आत्मा शरीर धारण करके संसार में आती है, और जगत के सभी कार्यों में उलझ जाती है, बिना यह सुने, समझे कि उसका असली कार्य क्या है।महाराज कहते हैं: मोक्ष का मार्ग अत्यंत सूक्ष्म और झीना (सूक्ष्म/कोमल) है। बिना सतगुरु द्वारा दिया गया अणभै (निर्भय) ज्ञान धारण किए, उस राह पर चलना और मोक्ष पाना संभव नहीं है। संतो से महाराज फरमाते हैं कि भजन करने का भेद व उसका ज्ञान मिलने पर परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। सारा संसार दरसणी व सब भेखधारी राम राम करते है। राम राम कैसे करना चाहिये इसका भेद नहीं जानते, इसलिये सतशब्द की जागृति नहीं होती। यही बिना हिकमत के राछ से पच पच कर हारना है। जिस गांव में जाना है उसका रास्ता नहीं जानते। हमेशा चलते रहने पर भी नहीं पहुंचते है। उजाड में जा रहे है गांव में कैसे पहुंचेंगे व गांव में पहुंचने का सुख कैसे मिलेगा। शरीर धारण करके सब आते है व जगत के सब काम बिना सुणे ही आ जाते है। महाराज फरमाते हैं कि मोक्ष प्राप्ति का रास्ता तो बहुत झीणा है। सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण किये बिना उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...