म्हारा गुरांजी रे देश, चालो ओ संईयां म्हारी।
म्हारा सुखां रां सागर, म्हारा जीवां रा तारण, सायब वहां बसे थे ॥ टेर ॥
दूरा सा देश गुरांजी रा छाना, बेद कतेब न जाने कुराणा।
शिव सनकादिक शेष पुकारे, हां अ तूं तो पूरा गुरु शिर धारी जे ॥ १ ॥
पिव पिव करती या बिरेहन जागी, पांच सखी मिल शिवरण लागी।
प्रेम बधावा मन घर बाज्या, हां से या तो प्रीतज आंण पुकारी जे ॥२॥
म्हारा हिरदा में झिलमिल शब्द ऊजाला, गुरां म्हारा जोई है दीपक माला।
जठे गोऊं सूं तार पोऊं सूं मोतीडा, हां ओ म्हारा हिवडा में हार हजारी ओ ।॥ ३ ॥
आत्म बीण नाभ घर बागी, संखरी घोर गिगन जाय लागी।
अनहद झालर भंवर गुंजारा, हां अ आ तो मुरली री टेर निहारी ओ ॥ ४ ॥
शील सिणगार सजे सन्त सूरा, उलट पिछम दिश बाजे है तूरा।
नांव तेज मुख बरसे है नूरा, हो ओ उण सूरत री बलिहारी जे ॥ ५ ॥
त्रिकुटी तखत पर नोपत बाजे, सब देव तरसे है दरशण काजे।
जय जय बांणी बरसे है हीरा, हां से वारां चरण बंधे पुर सारी थे ॥ ६ ॥
अनन्त भाण अविन्यासी री शोभा, सूरत निरत संईयां चाली है जोबा।
अला पिंगला सुखमण नारी, हां ये वारो रूप निहारत हारी थे ॥ ७ ॥
अगम देश जहां अविचल थाना, अनन्त कोटि संत धरे है ध्याना।
लील बिलास आनन्द सुख नाना, हां अ वा तो सरब सवागण नारी थे ॥ ८॥
अविन्यासी बर आपा ही बरस्यां, अपना गुरांजी री सेवा करस्यां।
कह सुखराम बीरम गुरुदाता, हां अ मैं तो बेह जाती भवजल तारी जे ॥ ९॥
आत्मा की पुकार
सतगुरु के देश चलो, आत्मा इन्द्रियों रूपी सहेलियों से कहती है: “मेरे सतगुरु के देश चलो — उस पद में सुखों का सागर है, और वहाँ जीवों के तारणहार परमात्मा का अनुभव होता है।”सतगुरु का देश बहुत दूर है। उस पद की प्राप्ति वेदों या कुरानों के ज्ञान से नहीं होती। शिव, सनकादिक, शेषजी तक उस निज नाम की भक्ति करते हैं — इसलिए तुम भी पूर्ण परमानंद की प्राप्ति का साधन करो।पाँच विषयों को वश में करके,
विरह प्रेम से भजन करना ही “पिव पिव” करके विरहन का पुकारना है।जब सारे हृदय और सारे शरीर में शब्द का अनुभव होता है,
तो यही हृदय में झिलमिल होना और दीपक माला का जोड़ना है।जहाँ सूरत जाती है, वहाँ ही शब्द का अनुभव होना — यही है: "जठे गऊँ सूँ तार, पोऊँ सूँ मोतीड़ा"।जब हृदय में भीतर से भारी खुशी उठती है, तो यही होता है — "हिवड़ा में हार-हजारी"।जब शब्द नाभी में आता है और ब्रह्मांड तक सारे शरीर में अनुभव होता है, तो यही है — आत्म वीणा का नाभ-घर में बजना।यही संखरी घोर, गगन घर में लगना,
अनहद झालर, भंवरों का गुंजार और मुरली की टेर सुनना है।शील-व्रत धारण करके, भजन करते हुए, पश्चिम दिशा में उलटकर शब्द का अनुभव होना — यही है तूर का बाजना।जब शब्द हर समय अनुभव हो, तो नाम तेज बनकर मुख पर नूर बरसता है। ऐसे महापुरुषों की बलिहारी है।त्रिकुटी तख्त, अर्थात ब्रह्मांड, पारब्रह्म से ऊपर केवल पद में जब शब्द का अनुभव होता है, तो यही नोपत का बजना है।
देवता तक उस पद की प्राप्ति के लिए तरसते हैं।जब सारे शरीर में सतशब्द का केवल पद में अनुभव होता है — तो यही जय-जय वाणी है,
यही हीरों की वर्षा है।सारे शरीर में ध्यान होना — यही है चरण बांधना।अविनाशी पद की शोभा अनंत सूर्यों के प्रकाश के समान है। सूरत-निरत के द्वारा उसका अंतर में अनुभव हो रहा है।अला, पिंगला, सुषुम्ना में जब भजन होता है, और इनसे अलग होकर पूर्ण परमानंद में लय होना — तो वही है उस पद को निहारना।केवल पद, आनंद पद ही अविचल थान है। अनंत संतों ने उस पद की प्राप्ति की है।
पूर्ण आनंद का अनुभव होना ही गुरु की सेवा करना है और अविनाशी वर को वरना है।महाराज फरमाते हैं:
“बीरमदासजी, सतगुरु की कृपा से ही मुझे उस पद की प्राप्ति हुई — नहीं तो मैं भी संसार की धारा में बह जाता।”