Friday, November 21, 2025

Mat bhoolo ho man maaya sang मत भूलो हो मन माया संग_हरजस पद राग बसन्त (९) 

 मत भूलो हो मन माया संग, समझ सोच कर रहो अभंग ॥ टेर ॥ 
 भगत बिना नर धरक कहाय, कोट अकल बुध ओली जाय। 
नांव बिना सब आल जंजाल, सुणज्यो शिष्ट, संत, सर्ब ग्वाल ॥ १ ॥ 
 आन धरम सब माया होय, यां कुं पूज तिरियो सुणयो नहीं कोय।
 तारणहार ब्रह्म राम राय, गुरु गम भेदज लहिजे आय ॥ २ ॥ 
 जिण जिण प्रीत लगाई आय, तिरता बार न लागी काय। 
ऐसो नांव नकेवल होय, तिरिया संत अनेकूं लोय ॥ ३ ॥
 छाडो झूठ, कर सांच संग, पाको रंग चढावो अंग। 
कह सुखदेव बजाय बजाय, ईमरत छाड बिसे मत खाय ॥ ४ ॥
 Harjas Pad Raag Basant (9)
 Mat bhoolo ho man maaya sang, samajh soch kar raho abhang. ॥ Ter ॥
 Bhagat bina nar dharak kahay, kot akal budh oli jaay. 
 Naam bina sab aal janjal, sunjyo shisht, sant, sarb gvaal. ॥ 1 ॥
 Aan dharam sab maaya hoy, yaa ku pooj tiriyo sunyo nahin koy. 
 Taranhaar Brahm Ram raay, guru gam bhedaj lahije aay. ॥ 2 ॥ 
Jin jin preet lagai aay, tirta baar na laagi kaay.
 Aiso naam na keval hoy, tiriya sant anekun loy. ॥ 3 ॥
 Chhado jhooth, kar saanch sang, paako rang chadhavo ang.
 Kah Sukhram bajay bajay, imrat chhad bise mat khaay. ॥ 4 ॥ 
माया को त्यागकर आत्मधर्म ग्रहण करो महाराज मन से कहते हैं: "हे मन! शरीर रूपी माया का साथ करके परमात्मा को मत भूल, माया से अलग रह — उसमें न फँस।"भक्ति के बिना मनुष्य जीवन धिक्कार के योग्य है। चाहे करोड़ों की बुद्धि क्यों न हो, यदि वह परमात्मा के नाम से रहित है, तो वह व्यर्थ है — केवल जंजाल है।सभी संतों और समस्त सृष्टि के प्राणियों से कहता हूँ: जो भी धर्म प्रकृति और माया के आधार पर चलता है, वह सब मायिक धर्म है — और ऐसे किसी भी "आन धर्मी" का मोक्ष नहीं हुआ।उद्धारकर्ता तो केवल ब्रह्मस्वरूप रामजी ही हैं। जब कोई सतगुरु का अणभै (निर्भय और पारमार्थिक) ज्ञान धारण करता है, तभी उसे उनका वास्तविक भेद मिलता है।जो हंस आत्माएं साँस-उसाँस में राम का स्मरण करती हैं, उनमें आत्मचेतना से सतशब्द का अनुभव होता है — यही आत्मधर्म है।जिन-जिन ने प्रेम से भजन किया, उनका उद्धार कभी विलंबित नहीं हुआ।केवल का "निराधार नाम" — यानी वह नाम जो माया, मन, वाणी से परे है — वही नाम है जिसने अनेक संतों का उद्धार कर दिया।इसलिए — असत को छोड़कर सत का साथ करो। पक्का ज्ञान धारण करो, अर्थात असत्य को छोड़कर सत्य का विवेक ग्रहण करो।महाराज बार-बार कहते हैं: "हे मन! अमृत को छोड़कर विष मत खा। मैं तुझसे यह बात पुनः-पुनः कह रहा हूँ।"

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...