Saturday, August 23, 2025

Dev Padi Jeev Jaay_देव पदी जीव जाय_ हरजस पद राग मंगल (१२)

 



हरजस पद राग मंगल (१२)

देव पदी जीव जाय, मिनख तन पावसी।
वे जप तप जिग साझ, देव पद चावसी ।। १ ।।
मिनख जन्म कूं छाड, मिनख ही होवसी।
सो सब शिवरण साझ, धरम पथ जोवसी ।। २ ।।
चौरासी फिर जीव, हुवे सो मानवी।
वे सुण ज्ञान विचार, कहरजस पद राग धनाश्री (७) छु नहीं जानवी ।। ३ ।।
नरक कुंड को भोग, मिनख तन धरत है।
सो नर मुढ गिंवार, भक्त सुं अडत है।। ४ ।।
नर नारी को जोय, इण सुण कारणे।
कह सुखदेव इण बात, न्यारी सब धारणे ।। ५ ।।

"देवता पद प्राप्त करने के बाद भी  मनुष्य जन्म मिलता है। और जीव, जप- तप , यज्ञ करके देवता पद ही चाहते हैं, मनुष्य जन्म छोड़कर वापस मनुष्य बनते हैं। सांस-उसांस के सुमिरन और भजन से आत्म धर्म का कार्य होता है। जो जीव चौरासी योनियाँ भोगकर मनुष्य बनता है, वह ज्ञान और विचार नहीं जानता। नरक कुंडों को भुगत कर मनुष्य जन्म धारण करने वाले जीव भक्तों से वाद-विवाद करते हैं। वे मूर्ख और गँवार हैं। सभी भक्तगण, स्त्री-पुरुषों को देखो, इसी कारण सबके विचार एक जैसे नहीं मिलते।

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