हरजस पद राग आसा (१९)
मन से फ़रमाते हैं कि सारा जगत पाँच प्रकार की भक्ति का ज्ञान जानता है। छठी भगती संत जानते हैं, इस तरह से इस ज्ञान को पहचानो। शिव की भक्ति करने वाले वैश्य के जैसे हैं। मामूली साधन करके बहुत याचना करते हैं, विष्णु की भक्ति किसान की तरह है, मुट्ठी भर अन्न खेत में डालकर गाड़ी भर ले आता है। शक्ति की भक्ति वेश्या की तरह है, जितना साधन करते हैं उतना ही फल मिलता है। ब्रह्मा की भक्ति जाचक की जैसे है, माँगने वाले को साधारण चीज़ मिलती है, पर्याप्त धन नहीं मिलता है। आन की भक्ति किसबी की तरह है, जितना साधन करे उतना ही फल मिलता है। मंत्र की साधना करके दूसरों से माँगना ही ठगना है। जिस प्रकार बाज़ीगर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेता है, ऐसे ही शुभ कर्म हैं जिससे फलों की प्राप्ति होती है। अशुभ कर्म aचोरों की तरह हैं, उनसे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये दूसरों को दुख देना है। पारब्रह्म की भक्ति राजा की तरह है, जैसे राजा किसी पर प्रसन्न हो जाता है तो रीझ-मौज दे देता है। ऐसे ही पारब्रह्म की भक्ति से रिद्धियों सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। जो सतस्वरूप की भक्ति है वो सत है, उससे पूर्ण परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है। महाराज फ़रमाते हैं कि इस प्रकार छः भक्ति तो सगुण-निर्गुण तीन लोक में ही फलों की प्राप्ति कराने वाली है। इसके आगे जो सातवीं भक्ति है वो सत है, उससे परमपद की प्राप्ति होती है।
