आनंद लोक वही जाएँगे जो तत् स्वरूप याने होणकाल ब्रह्म का पद है, इसके आगे का ज्ञान प्राप्त करेंगे। जहाँ तक ब्रह्म का एक पद बताते हैं वहाँ तक केवल पद का भेद नहीं मिला, यह तो होणकाल ब्रह्म का पद है। बिना भेद के ही इसको आनंद पद बताते हैं। ज्ञानियों को इतनी भी समझ नहीं है कि आत्मा ब्रह्म है और ब्रह्म पद की प्राप्ति करना चाहती है। तो मेहनत करके क्या करना है जो दूसरा पद नहीं है। जो चीज घर में है वही दुकानों में मिलती है तो उसको प्राप्त करने के लिए मूर्ख क्यों रात दिन मेहनत करता है। जो भूले हुए हैं और जानकारी नहीं है वे होणकाल ब्रह्म को ही आनंद ब्रह्म कहते हैं। स्त्री कब स्त्री को चाहती है? आत्मा ब्रह्म है और ब्रह्म पद की प्राप्ति करना चाहती है, यही स्त्री एक का स्त्री को चाहना है, इसका विचार नहीं करते। जहाँ से जीव पैदा हुआ है वो और आनंद पद नहीं है। महाराज फ़रमाते हैं कि होणकाल ब्रह्म से आनंद पद ऊपर और अलग है।
Saturday, August 23, 2025
Banda Anand Lok se jave_बांदा आनन्द लोक से जावे_Harjas Pad Raag Asa (13)
हरजस पद राग आसा (१३)
बांदा आनन्द लोक से जावे।
तत स्वरूप ब्रह्म यो कहिये, ईण आगे गम पावे ॥ टेर ॥
जहां लग एक ब्रह्म कर गावे, तहां लग भेद न पायो।
ओ तो होणकाल ब्रह्म कहिये, बिन भेद पद ठहरायो ॥ १ ॥
ईतनी गम नहीं ज्ञान्यां कुं, ऊ ओ ओकज होई।
तो मेहनत कर कहो क्या करिये, अवर न दूजो कोई ॥ २ ॥
जो जो चीज शकल घर मांही, ऊवेईज हाट में होई।
तो क्यों पचे रात दिन मूरख, मिलणे कूं क्या रोई ॥ ३ ॥
भूला कहे ब्रह्म ऊ होई, सुध बिहूणा सारा।
तिरया कदे नार कूं चावे, ओ नहीं करे विचारा ॥ ४ ॥
ज्यां सुं जीव हुवो सुण पैदा, ऊं ओ एक न होई।
कह सुखराम आनन्द पद न्यारो, ऊपर सो कहूं तोई ॥ ५ ॥
जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं
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