Wednesday, October 14, 2026

जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं


हरजस पद राग मिश्रीत (५)  


संत सुखराम जी महाराज का यह हरजस अत्यंत तार्किक, दार्शनिक और सुरति-शब्द योग के सबसे बड़े रहस्य का उद्घाटन करने वाला है। इस पद में महाराज ने अद्वैत वेदांतियों और ज्ञानियों से सीधे और चुभते हुए सवाल किए हैं। यदि आत्मा 'ब्रह्म' ही है, तो वह सबसे पहले संसार में आई ही क्यों? यदि वह पहले ब्रह्म से अलग होकर जन्म-मरण में आ सकती है, तो साधना करके वापस ब्रह्म में मिलने के बाद भी वह पुनः संसार में क्यों नहीं आएगी? इस तर्क से महाराज सिद्ध करते हैं कि 'ब्रह्म-पद' अंतिम मोक्ष नहीं है; परम मोक्ष 'सतशब्द' (सार शब्द) से मिलने वाला 'आनंद पद' है, जहाँ से जीव कभी लौटकर नहीं आता।


संतो अरथ करे सो पूरा। सार शब्द कूं नहीं रे पिछाणे, रहे मोख सूं दूरा ।। टेर ।।

हे संतों! जो इस अणभै वाणी (सच्चे ज्ञान) का निरपेक्ष और यथार्थ 'अर्थ' (निर्णय) करता है, वही वास्तव में पूरा (पूर्ण ज्ञानी) है। जो साधक 'सार शब्द' (सतशब्द / निज नाम) की महिमा और शक्ति को नहीं पहचानता, वह चाहे कितना भी शास्त्र पढ़ ले या तपस्या कर ले, परम मोक्ष से हमेशा दूर ही रहता है।

पहला पद (सृष्टि के आरंभ का मूल प्रश्न)

आद पुरुष सूं हंस बिछडयो, क्या पाप पुन्न किया।

किण आधार गरभ में आया, तो ताड किणी ने दिया ।। १ ।।

महाराज ज्ञानियों से सृष्टि के आदि (शुरुआत) का सबसे बड़ा प्रश्न पूछते हैं— जब यह जीवात्मा (हंस) सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं, फिर उसने ऐसा कौन-सा पाप या पुण्य किया था जिसके कारण उसे संसार में आना पड़ा? किस आधार पर उसे पहली बार माता के गर्भ में भेजा गया? या फिर उसे वहाँ से किसने धक्का देकर (ताड़ कर) निकाल दिया?


दूसरा पद (कर्मों की उत्पत्ति का रहस्य)

करम वहां किया के यहां आय किया, के नेः करमी चल आयो।

कोण सो करम किणी ने लागे, तो काल किणी ने खायो ।। २ ।।

तर्क को आगे बढ़ाते हुए महाराज पूछते हैं कि उस जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था? क्या उसने परमात्मा के पास (ब्रह्म लोक में) रहकर कर्म किया, या इस संसार में आने के बाद पहला कर्म किया? या फिर वह 'निःकर्मी' (बिना किसी कर्म के) ही अपनी मर्जी से संसार में चला आया?

यदि वह अपनी मर्जी से आया, तो फिर कौन-सा कर्म किस आत्मा को लगा और 'काल' (मृत्यु) ने किसको अपना ग्रास बनाया? (अर्थात् ब्रह्म-ज्ञानियों के पास इस बात का कोई स्पष्ट और तार्किक उत्तर नहीं है)।


तीसरा और चौथा पद (ज्ञानियों के भ्रम पर प्रहार)

अती गम ज्ञानिया कूं नांही, समझ बिहूणा सारा।

काली त्रिया नार ने ब्याही, सो तुम करो विचारा ।। ३ ।।

सो ही वस्तु शकल घर मांही, सोई हाट में होई।

क्यूं पच-मरे मुक्त ने मूरख, रात दिवस मिल दोई ।। ४ ।।

महाराज स्पष्ट कहते हैं कि इन गूढ़ रहस्यों की 'गम' (समझ) साधारण ज्ञानियों को बिल्कुल नहीं है। वे सब बिना सच्ची समझ (समझ बिहूणा) के ही व्यर्थ का तर्क कर रहे हैं।

महाराज एक गहरा व्यंग्य (रूपक) देते हैं— "काली त्रिया नार ने ब्याही।"

ज्ञानियों का यह कहना कि 'आत्मा स्वयं ब्रह्म है और वह साधना करके वापस ब्रह्म में ही मिल जाएगी', यह बात बिल्कुल वैसी ही बेतुकी है जैसे कोई पागल स्त्री किसी दूसरी स्त्री से ही विवाह (ब्याह) रचा ले! (जब दोनों एक ही स्वरूप हैं, तो विवाह कैसा?)

महाराज कहते हैं कि जो वस्तु (ब्रह्म-स्वरूप) तुम्हारे घर (भीतर) पहले से ही मौजूद है, उसी को तुम हाट (बाजार / बाहरी साधनों) में क्यों ढूँढ रहे हो? यदि आत्मा स्वयं ब्रह्म ही है, तो फिर हे मूर्ख जीव! तू दिन-रात 'मुक्त' होने के लिए (साधना में) क्यों पच-पच कर मर रहा है?

अंतिम निष्कर्ष और परम सत्य (भावार्थ का सार)

इस पूरे हरजस का मूल सिद्धांत यह है कि यदि वेदों और ज्ञानियों के मतानुसार 'आत्मा ब्रह्म से आई है और वापस ब्रह्म में ही समा जाएगी', तो महाराज का अकाट्य तर्क है कि "जब वह पहले बिना किसी कर्म के ब्रह्म से बिछड़कर संसार में आ गई थी, तो साधना करके वापस ब्रह्म में मिलने के बाद, वह दोबारा संसार में क्यों नहीं आएगी?" (अर्थात् आवागमन का चक्र तो ब्रह्म-पद में भी चलता ही रहेगा)।

इसलिए, महाराज यह सिद्ध करते हैं कि ब्रह्म-पद भी परम विश्राम नहीं है। आवागमन को हमेशा के लिए मिटाने का एकमात्र उपाय 'सार शब्द' (सतस्वरूप / आनंद पद) की प्राप्ति है। जो सुरति सतशब्द के द्वारा उस केवल पद में समा जाती है, वह वहाँ से लौटकर फिर कभी संसार या माता के गर्भ में नहीं आती।


जीवात्मा ने अपना पहला कर्म (गलती) कहाँ किया था?सबसे पहली बार उस 'आदि पुरुष' (परमात्मा/ब्रह्म) से बिछड़ी थी, तब तो संसार था ही नहीं

हरजस पद राग मिश्रीत (५)   संत सुखराम जी महाराज का यह हरजस अत्यंत तार्किक, दार्शनिक और सुरति-शब्द योग के सबसे बड़े रहस्य का उद्घाटन करने व...