Tuesday, October 13, 2026

जन्मों-जन्मों के कर्मों का पहाड़ कैसे नष्ट होगा?

 


 सुखराम जी महाराज ने अध्यात्म के सबसे जटिल विषय— 'कर्म-सिद्धांत' (Law of Karma)— को एक बहुत ही अद्भुत और ठेठ ग्रामीण दृष्टांत (किसान और अनाज के उदाहरण) के माध्यम से समझाया है।


साधकों का सबसे बड़ा प्रश्न होता है कि जन्मों-जन्मों के कर्मों का पहाड़ कैसे नष्ट होगा? महाराज यहाँ स्पष्ट करते हैं कि कर्मों को एक-एक करके नहीं काटा जा सकता; उन्हें नष्ट करने के लिए केवल 'अखंड भजन' की बाढ़ लानी पड़ती है।


भजना रे प्राणियां, क्या अरथ विचारे। पढिया गुणया माने नहीं, जम जंवरो मारे ॥ टेर ॥

हे प्राणी! तू केवल उस राम-नाम का 'भजन' कर। शास्त्रों के पन्ने पलट कर तू और क्या व्यर्थ के 'अर्थ' (तर्क-वितर्क) विचार रहा है?


जो लोग केवल पोथियां पढ़कर स्वयं को ज्ञानी (पढ़िया-गुण्या) मान लेते हैं, लेकिन भजन (प्रैक्टिकल साधना) नहीं करते, उनकी इस थोथी विद्या को यमराज नहीं मानता। अंत समय में उन्हें यमदूतों (जंवरो) की भयंकर मार खानी ही पड़ती है। ज्ञान यदि आचरण (भजन) में न उतरे, तो वह व्यर्थ है।


पहला और दूसरा पद (कर्मों का जाल और मुक्ति की शर्त)

तीन ताछ का करम है, जीवन के लारा। चवदा तीनूं लोक में, करमा बस सारा ॥ १ ॥

प्रालब्द क्रिये सही, संचित बोहो भारी। या तीनां ने काटसी, तब मिले मुरारी ॥ २ ॥


 इस ब्रह्मांड के चौदह भुवनों और तीन लोकों (स्वर्ग, मृत्यु, पाताल) में जो भी प्राणी है, वह सब 'कर्मों के वश' में है। हर जीव के पीछे (लारा) तीन प्रकार के कर्म लगे हुए हैं:

प्रारब्ध (Destiny): वह कर्म जो इस जन्म में सुख-दुःख के रूप में भोगने के लिए मिला है।

संचित (Accumulated): पिछले अनंत जन्मों के कर्मों का वह भारी गोदाम, जो अभी भोगने के लिए परिपक्व नहीं हुआ है (अंतर्मन में दबा है)।

क्रियमाण (Current Actions): वे नए कर्म जो हम वर्तमान में अपने संकल्प-विकल्प और शरीर से कर रहे हैं।

जब तक जीव इन तीनों कर्मों के जाल को पूरी तरह 'काट' (नष्ट) नहीं देता, तब तक उसे 'मुरारी' (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं हो सकती।


तीसरा से पाँचवाँ पद (किसान का दृष्टांत - कर्मों का संचय)

काटण की बिद सांभलो, दिष्टांग बताऊं। ओक मोटो कृष्यण थो, तांको धन गाऊं ॥ ३ ॥

एक साल में निपनो, मण एक हजारा। तां धरबा के कारणे, ऐसे विध विचारा ॥ ४ ॥

सो मण घरां पठावियो, नव सो मण लारा। ताकूं खो में गाडियो, असा जतन विचारा ॥ ५॥


अब महाराज कर्म काटने की 'विधि' एक किसान (कृष्यण) के 'दृष्टांत' (उदाहरण) से समझाते हैं:

एक किसान के खेत में 1000 मण अनाज पैदा हुआ। उसने उसे सँभालने की एक युक्ति निकाली। उसने 100 मण अनाज अपने खाने के लिए 'घर' भेज दिया और बचे हुए 900 मण अनाज को भविष्य के लिए एक 'खो' (गहरी खाई) में गाड़ कर सुरक्षित कर दिया।

(यौगिक अर्थ: यहाँ 100 मण अनाज हमारा 'प्रारब्ध' है जो इस जन्म में भोगने के लिए मिला है। और 900 मण अनाज हमारा 'संचित कर्म' है जो कारण-शरीर (खाई) में अनंत जन्मों के लिए दबा पड़ा है)।


छठा से आठवाँ पद (अखंड वर्षा और बीजों का नाश)

धुर अषाढा ओलरियो, बिरखा बोह भारी। चार महिना बरसियो, नहीं आंख उगाडी ॥ ६ ॥

खो को खो में गल गयो, हल जूत न पाया। घर को घर में पीस के, सब खाय खुटाया ॥ ७ ॥

एक कण नहीं निबरियो, टोटा भल आया। इस विध करम कटावज्यो, पांडे सुण भाया ॥ ८ ॥


आषाढ़ के महीने में अत्यंत भयंकर 'बरखा' (बारिश) शुरू हुई। लगातार चार महीने तक ऐसी झड़ी लगी कि आसमान ने आँख ही नहीं खोली (सूरज नहीं निकला)।

इस अखंड बारिश का परिणाम क्या हुआ?

संचित नष्ट: जो 900 मण अनाज खाई (खो) में दबा था, वह पानी भर जाने से वहीं 'गल' (सड़) गया, उग नहीं पाया।

क्रियमाण रुका: खेत में इतना कीचड़ हो गया कि किसान नया हल जोत ही नहीं पाया (नया बीज नहीं बो सका)।

प्रारब्ध समाप्त: जो 100 मण अनाज घर में था, बारिश में घर बैठे-बैठे उसे पीसकर खा लिया।

अंत में किसान के पास एक 'कण' (दाना) भी नहीं बचा। महाराज कहते हैं कि हे ज्ञानी भाई! इसी विधि से तुम्हें भी अपने कर्म कटवाने हैं।


नवाँ पद (भजन की अखंड झड़ी)

आठ पोहर चौसठ घडी, रसना जड लागे। सुण पांडे सुखराम कह, तब तीनूं भागे ॥ ९ ॥


अब महाराज उस दृष्टांत का रहस्य (Application) खोलते हैं। जिस प्रकार बादलों ने चार महीने की अखंड झड़ी लगाई, उसी प्रकार हे साधक! जब तेरी 'रसना' (जिह्वा और सुरति) आठों प्रहर और चौंसठों घड़ी (अर्थात् 24/7) सतशब्द रूपी राम-नाम की 'झड़ी' (अखंड रटन/भजन) लगा देगी, तब क्या होगा?

भीतर सतशब्द की अखंड वर्षा से तेरा 'संचित कर्म' कारण-शरीर में ही जलकर भस्म हो जाएगा। तेरी सुरति परमात्मा में ऐसी लीन होगी कि संसार का कोई नया 'क्रियमाण' कर्म बनेगा ही नहीं। और बचा हुआ 'प्रारब्ध' इस शरीर के रहते-रहते कट जाएगा। तब ये तीनों कर्म तुझे छोड़कर हमेशा के लिए 'भाग' जाएंगे और मोक्ष मिल जाएगा।

सार:

कर्मों को एक-एक करके भोगा नहीं जा सकता, उन्हें केवल 'नाम की अग्नि/वर्षा' (अखंड रटन/भजन) में सामूहिक रूप से नष्ट (Delete) किया जा सकता है।

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