अधिकांश साधक 'सृष्टि के रचयिता' (ईश्वर/ब्रह्मा) तक पहुँचने को ही मोक्ष मान लेते हैं। परंतु महाराज इस पद में यह परम सत्य उद्घाटित करते हैं कि जो ईश्वर सृष्टि बनाता है, वह स्वयं 'काल' (समय और महाप्रलय) के अधीन है। सच्चा मोक्ष (आनंद पद) ब्रह्मा, काल और माया—इन तीनों की सीमाओं से पार जाने पर ही मिलता है।
औसा जन कोई। होणकाल ईश्वर सूं आगे, ज्ञान बतावे मोई ।। टेर ।।
महाराज एक सच्चे साधक की तड़प को व्यक्त करते हुए पूछते हैं कि क्या इस संसार में ऐसा कोई पूर्ण संत (केवली भगवंत) है, जो मुझे उस 'ईश्वर' (सृष्टि कर्ता) और 'काल' (महाप्रलय/समय) से भी आगे (परे) के लोक का ज्ञान बता सके? अर्थात्, मुझे वह ज्ञान चाहिए जो जन्म-मरण के इस पूरे चक्र से ही हमेशा के लिए बाहर निकाल दे।
पहला पद (त्याग और वैराग्य की सीमा)
राजा है जे कोई ज्ञान त्याग ले ध्यावे, तिके काल मुख मांई।
वांकी संगत परम मोक्ष नहीं, हंसो किस विध जाई ।। १ ।।
महाराज (संबोधन करते हुए) कहते हैं कि हे राजा! यदि कोई संन्यासी केवल घर-बार का 'त्याग' करके ज्ञान और ध्यान की बातें करता है, तो याद रखना कि केवल बाहरी त्याग से जन्म-मरण नहीं मिटता; वह साधक अभी भी 'काल के मुख' (मृत्यु के चक्र) में ही बैठा है। ऐसे ज्ञानियों की संगति करने से कभी 'परम मोक्ष' नहीं मिल सकता। बिना सतशब्द के, यह जीवात्मा रूपी 'हंस' उस परम धाम तक किस विधि से जा सकता है? (अर्थात् नहीं जा सकता)।
दूसरा पद (सृष्टिकर्ता की भक्ति की सीमा)
जे कोई ज्ञान बतावे करता, पैदा करंदा भाई।
ओ सब ज्ञान काल का मुख में, न्याव करो ओ आई ।। २ ।।
जो गुरु तुम्हें केवल उस 'कर्ता' (ब्रह्मा/ईश्वर) की भक्ति का ज्ञान बताते हैं, जो इस संसार को 'पैदा' (उत्पन्न) करता है, वह ज्ञान भी अपूर्ण है। क्योंकि जो पैदा करता है, वह नष्ट भी करता है, और जहाँ उत्पत्ति-विनाश है, वहाँ काल (मृत्यु) का राज है। इसलिए यह सृष्टिकर्ता का ज्ञान भी 'काल के मुख' में ही है। अपने विवेक से इस बात का सच्चा न्याय (विचार) करके देखो।
तीसरा पद (हठयोग और तपस्या की सीमा)
क्रिया कला जप तप साधन, कुंची मुद्रा गावे। पेलो छेह काल का मुख में, परम मोक्ष नहीं जावे ।। ३ ।।
जो लोग शारीरिक क्रियाएँ, जप, तप, कठोर साधन और हठयोग की 'कुंची मुद्रा' (खेचरी, मूलबंध आदि यौगिक मुद्राएँ) लगाकर साधना करते हैं, वे सिद्धियाँ पाकर अपने शरीर की आयु तो बढ़ा लेते हैं, परंतु महाप्रलय आने पर उन्हें भी शरीर छोड़ना ही पड़ता है (पेलो छेह)। ये सारी क्रियाएँ भी अंततः काल के मुख में ही समा जाती हैं; इनसे आत्मा परम मोक्ष (आनंद पद) में नहीं जा सकती।
चौथा पद (ब्रह्म और माया का सत्य)
घणी बात थोडी में केवं, सुण लिज्यो नर नारी। ब्रह्म काल माया सब चारो, देखो ज्ञान बिचारी ।। ४ ।।
महाराज कहते हैं कि मैं बहुत लंबी-चौड़ी बात को थोड़े से शब्दों में समेट कर कह रहा हूँ, हे संसार के नर-नारियों, ध्यान से सुन लो! यह परब्रह्म (निराकार सत्ता), काल (समय/परिवर्तन) और माया (प्रकृति)—ये सब के सब एक दायरे में बँधे हुए हैं और इनमें जीव का आवागमन (जन्मना-मरना) बना रहता है। अपने शुद्ध ज्ञान और विवेक से विचार करके देखो, तो तुम्हें यह सत्य समझ आ जाएगा।
पाँचवाँ पद (परम मोक्ष / केवल पद का मार्ग)
कह सुखराम काल सूं बारे, जे जन सत पद पावे।
हद कूं छाड तजे बेहद कूं, ब्रह्म ऊलंग हंस जावे ।।५।।
अंत में संत सुखराम जी महाराज उस सर्वोच्च मंजिल का वर्णन करते हैं जो 'काल की पहुँच से बाहर' (काल सूं बारे) है। जन्म-मरण से पूर्णतः मुक्त वही जन होता है, जो 'सत पद' (सतस्वरूप / आनंद पद) की प्राप्ति कर लेता है। इस अवस्था तक पहुँचने के लिए जीवात्मा (हंस) को पहले 'हद' (तीन लोक / भौतिक और सूक्ष्म जगत) को छोड़ना पड़ता है, फिर 'बेहद' (ब्रह्म लोक / शून्य और निराकार अवस्था) का भी त्याग करना पड़ता है। जब सुरति इस ब्रह्म-पद को भी लांघकर (ऊलंग कर) आगे निकल जाती है, तब वह परम मोक्ष (केवल पद) में विलीन होती है।
यह हरजस सुरत-शब्द योग का वह सर्वोच्च शिखर है, जहाँ पहुँचकर साधक को यह स्पष्ट हो जाता है कि सिद्धियाँ, स्वर्ग, यहाँ तक कि ब्रह्म-लोक भी अंतिम पड़ाव नहीं हैं; अंतिम विश्राम केवल 'सतस्वरूप' में है।
