Wednesday, October 7, 2026

  


नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥ 
  बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण।                                                                आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥
 करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।                                                                            कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥
 पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।                                                                             कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय।                                                                                      कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥ 
 
  

यह पद उन योगियों, तपस्वियों और विद्वानों के कठोर साधनों का वर्णन करता है, जिन्हें संसार बहुत ऊँचा मानता है। परंतु महाराज स्पष्ट करते हैं कि बिना 'सतगुरु के भेद' और 'सतशब्द' (निज नाम) की कमाई के, ये सारे महान लगने वाले साधन भी परम मोक्ष देने में पूरी तरह असमर्थ हैं।

नहीं हो इण नांव सम, बिना गुरु भेद न तोभी पावे गम ॥ टेर ॥
हे साधकों! इस संसार या परलोक का कोई भी साधन, तप या पुण्य इस 'निज नाम' (सतशब्द) के बराबर नहीं है। और सबसे बड़ी शर्त यह है कि यह निज नाम बिना पूर्ण सतगुरु के 'भेद' (सत्य-विधि) के प्राप्त नहीं किया जा सकता, न ही इसकी सच्ची 'गम' (रहस्य और अनुभव) भीतर प्रकट हो सकती है।

पहला पद (हठयोग और वैराग्य का खंडन)
बन मध जाय कर धरत ध्यान, छोडे जगत गोत कुल सरब आंण।
आसण साज अनेका खुद, नव द्वार रखे सर्वं मूंद ॥ १ ॥
लोग संसार, अपना गोत्र, परिवार और समाज की सारी मर्यादाओं (आण) को छोड़कर घने जंगलों (वन) में जाकर ध्यान लगाते हैं। वे स्वयं को कष्ट देकर अनेक प्रकार के कठिन 'आसन' सिद्ध करते हैं और हठयोग के द्वारा अपने शरीर के नौ द्वारों (आँख, कान, नाक, गुदा आदि) को पूरी तरह से बंद (मूंद) कर लेते हैं, ताकि प्राण बाहर न जाएं। (परंतु सतशब्द के बिना यह शारीरिक कष्ट मोक्ष नहीं दे सकता)।

दूसरा पद (कठोर तपस्या और शरीर गलाने की व्यर्थता)
करव्रत झाप देह कमला चाड, पर्वत बिचे गुफा तन बाड।
कठण तप देह अंग गाल, फोडे भरम भ्रांत सो अज्ञान पाल ॥ २॥
कोई साधक नींद न लेने का कठोर व्रत धारण कर लेता है, या अपने शरीर के अंगों को काटकर अपने इष्ट देव पर चढ़ा देता है (कमला चाड़)। कोई ऊंचे पर्वतों की कंदराओं (गुफाओं) में अपने शरीर को कैद (बाड़) कर लेता है। वे इतनी कठोर तपस्या करते हैं कि उनका शरीर सूख कर गल जाता है, यह सोचकर कि ऐसा करने से उनके अज्ञान, भरम और भ्रांति की 'पाल' (दीवार) टूट जाएगी। (परंतु अज्ञान शरीर को सुखाने से नहीं, बल्कि नाम की जागृति से मिटता है)।

तीसरा पद (वेद-ज्ञान, भविष्य-कथन और सिद्धियों की सीमा)
पढे चहूं वेद सो पंडित होय, सरोधा साझ अगम कहे कोय।
कर ले मांड बिणासे आय, जो सुणई शकल ऊर मांय ॥ ३ ॥
कोई व्यक्ति चारों वेदों को पढ़कर बहुत बड़ा ज्ञानी (पंडित) बन जाता है। कोई 'स्वरोदय विज्ञान' (सरोधा / श्वासों का योग) या ज्योतिष साधकर 'अगम' (भविष्य) की बातें बताने लगता है।
किसी के पास ऐसी चमत्कारी सिद्धियाँ आ जाती हैं कि वह अपने वचन मात्र से संसार की रचना कर दे या उसे मिटा (बिणासे) दे। या कोई इतना तीव्र बुद्धि वाला श्रुतिधर बन जाए कि जो कुछ एक बार सुने, उसे ज्यों का त्यों अपने हृदय (उर) में धारण कर ले। (ये सब सिद्धियाँ और ज्ञान माया के ही दायरे में हैं, मोक्ष के नहीं)।

चौथा पद (कर्मकांड और निज नाम की अनिवार्यता)
जप तप करे अनेका कोय, पुन्न घर दया अलेखे होय।
कह सुखराम कहा कहूं जोड़, बिना हरि नांव नहीं कहूं ठोड ॥ ४ ॥
संसार में लोग अनेक प्रकार के जप, तप करते हैं। घर-घर में असीमित (अलेखे) दान, पुण्य, धर्म और जीवों पर दया करते हैं।
अंत में संत सुखराम जी महाराज दोनों हाथ जोड़कर कहते हैं कि मैं और कहाँ तक गिनती करूँ? सच्चाई केवल इतनी है कि परमात्मा के 'हरि नाम' (सतशब्द) की कमाई के बिना, इन सब कर्मों से चौरासी लाख योनियों से बचने का कोई 'ठौर' (ठिकाना या मोक्ष) नहीं है।
सार:
यह हरजस सुरत-शब्द योग की सर्वोच्चता का परम उद्घोष है। हठयोग, शरीर को सुखाना, वेदों का ज्ञान, भविष्य बताना, दान-पुण्य और चमत्कारी सिद्धियाँ—ये सब 'शुभ कर्म' या 'माया के खेल' तो हो सकते हैं, परंतु मोक्ष का सीधा पासपोर्ट केवल 'सतगुरु का भेद' और भीतर 'सतशब्द का प्रकटीकरण' ही है।

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