Thursday, November 20, 2025

Sun gyaani bachan hamaara re सुण ज्ञानी बचन हमारा रे_ हरजस पद राग मिश्रीत (९) सुण ज्ञानी बचन हमारा रे, सुण ज्ञानी वचन हमारा। रिद्ध सिद्ध तिका संत ले धारी, से नहीं उतरे पारा ।। टेर ।। सतस्वरूप की सता बिना रे, माया जांण ने देवे। चौसठ अंग अन्त है जीणा, ज्यू त्यूं कर गह लेवे ।। १ ।। माया ब्रह्म की दासी कहावे, बोहो बिध हाजिर होई। सतस्वरूप में जांण न पावे, नहीं वो चावे कोई ।। २ ।। निरगुण भक्ति करे जन कोई, जहां माया चल आवे। कईयक पकड़ करे वश जन कूं, कईयक वश हो जावे ।। ३ ।। कह सुखराम बन कूं जाता, मेहेरी चेन बतावे। रिध सिध सकल सोई परचा, घेर घट में लावे ।। ४ ।। Harjas Pad Raag Mishrit (9) Sun gyaani bachan hamaara re, sun gyaani vachan hamaara. Riddh siddh tika sant le dhaari, se nahin utre paara. ॥ Ter ॥ Satswaroop ki sata bina re, maaya jaan ne deve. Chausath ang ant hai jeena, jyu tyun kar gah leve. ॥ 1 ॥ Maaya Brahm ki daasi kahaave, boho bidh haajir hoi. Satswaroop mein jaan na paave, nahin vo chaave koi. ॥ 2 ॥ Niragun bhakti kare jan koi, jahan maaya chal aave. Kaiyak pakad kare vash jan ku, kaiyak vash ho jaave. ॥ 3 ॥ Kah Sukhram ban ku jaata, mehri chen bataave. Ridh sidh sakal soi parcha, gher ghat mein laave. ॥ 4 ॥ महाराज फरमाते हैं:हे ज्ञानियों! हमारे वचन ध्यान से सुनो — जिन संतो ने रिद्धि-सिद्धि धारण की है, उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति नहीं की है।सतस्वरूप की सत्ता, जिसे "सतशब्द" और "नेः अक्षर" कहते हैं — उसके बिना माया के पद से अलग नहीं हुआ जा सकता। यही है माया की चाल — जो आत्मा को वास्तविक मार्ग नहीं जानने देती।आठ अंग और चौसठ लक्षण बहुत सूक्ष्म और आकर्षक होते हैं, लेकिन ये माया के पद में धारण होते हैं, और इन्हें धारण करने से मोक्ष नहीं मिलती। यह तो केवल जैसे-तैसे पकड़ लेना है — कोई अंतिम लक्ष्य नहीं।ब्रह्म की भक्ति करने से रिद्धि-सिद्धि जागृत हो जाती है, लेकिन ये केवल माया की दासी हैं। यह जागृति केवल बहुत सी विधियों से माया का हाजिर होना है — न कि परम सत्य की प्राप्ति।सतस्वरूप के पद में माया प्रवेश नहीं कर सकती। इसलिए जो सतस्वरूप की भक्ति करते हैं, वे रिद्धि-सिद्धि को प्रधानता नहीं देते। यही "नहीं चाहना" है।निरगुण भक्ति में भी माया अपने चैन (स्वार्थ, सुख, मोह) दिखाती है। कुछ साधक ऐसे होते हैं जो माया को वश में कर लेते हैं, लेकिन अधिकांश माया के वश में हो जाते हैं।महाराज एक सुंदर दृष्टांत देकर कहते हैं — जैसे कोई पुरुष वैराग्य लेकर घर छोड़ देता है, तो उसकी स्त्री उसे अनेक प्रकार के सुख व चैन बताकर रोकना चाहती है, उसी प्रकार माया भी, जब कोई साधक सतस्वरूप की भक्ति करने लगता है, तो उसे रिद्धि, सिद्धि और परचे दिखाकर मार्ग से रोकना चाहती है। यूं ज्ञानियो से महाराज फरमाते हैं कि हमारे वचन सुण लो, जिन संतो ने रिद्धि सिद्धि धारण की है उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति नहीं की। सतस्वरूप की सता जिसको सतशब्द नेः अँच्छर कहते है उसके बिना माया के पद से अलग नहीं हो सकते, यही माया का नहीं जाणे देना है। आठ अंग चौसठ लक्षण बहुत झीणे, ये माया के पद में धारण होते है, इनके धारण करने से मोक्ष नहीं होती। यही ज्यू त्यूं कर गह लेना है। ब्रह्म की भक्ति करने से रिद्धि सिद्धि जागृत हो जाती है, यही माया का दासी कहलाना व बहोत विधि से हाजिर होना है। सतसरूप के पद में माया नहीं जा सकती, सतसरूप की भक्ति करने वाले रिद्धि सिद्धि को प्रधानता नहीं देते, यही नहीं चाहना है। निरगुण भक्ति करते है, वहां माया के चैन होते है। कोई साधक तो माया को वश में कर लेते है और कई माया के वश में हो जाते है। महाराज फरमाते हैं कि बैराग धारण कर कोई पुरूष घर छोड कर जाता है तो उसको स्त्री कई प्रकार के चैन बताकर रोकना चाहती है, इसी तरह माया भी सतसरूप की भक्ति करने वालो को रिद्धि सिद्धि परचा देकर रोकना चाहती है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...