Thursday, November 20, 2025
Bhai bhedi huve soi jaanne भाई भेदी हुवे सोई जांणे_हरजस पद राग मिश्रीत (८)
भाई भेदी हुवे सोई जांणे, दुजो नहीं जांणे रे भाई। पारख हुवे सोई परखे, दूजो क्या परखे रे भाई ।। टेर ।।
मुख सुंश शकल संत सो कह गया, माया जीते गाजी। धिरग धिरग ऊण अकल मत कूं, पर्चा हुवो हुवे राजी ।। १ ।।
माया मार लिया अध बीचे, ज्यां कूं जहान सरावे। ऐसी खबर नहीं से कच्चा, कायर तके लुटावे ।। २ ।।
रिद्ध सिद्ध मिल्या मुक्त जे होवे, मूवा जिवाया सोई। तो शक्ति माहे काहा कहो ओगुण, मोख न पावे कोई ।। ३ ।।
कह सुखराम बन कूं जाता, मेहेरी चेन बतावे। ई ऊं रिध सिध सुण सब परचा, घेर घट में लावे ।। ४ ।।
Harjas Pad Raag Mishrit (8)
Bhai bhedi huve soi jaanne, dujo nahin jaanne re bhai.
Parakh huve soi parkhe, dujo kya parkhe re bhai. ॥ Ter ॥
Mukh sunsh shakal sant so kah gaya, maaya jeete gaaji.
Dhirag dhirag oon akal mat ku, parcha huvo huve raaji. ॥ 1 ॥
Maaya maar liya adh beeche, jyaan ku jahan saraave.
Aisi khabar nahin se kaccha, kaayar take lutaave. ॥ 2 ॥
Riddh siddh milya mukt je hove, muva jivaaya soi.
To shakti maahe kahan kaho ogun, mokh na paave koi. ॥ 3 ॥
Kah Sukhram ban ku jaata, mehri chen bataave.
Ee oon ridh sidh sun sab parcha, gher ghat mein laave. ॥ 4 ॥
महाराज फरमाते हैं:जिन्होंने सतगुरु विधि से भजन करके "केः पद" और "आः पद" की प्राप्ति की है, वही इस भेद को जानते हैं, और दूसरे नहीं जान सकते।जो स्वयं परीक्षा करके जानता है, वही दूसरों की परीक्षा कर सकता है। जिसे यह अनुभव न हो, वह भला कैसे किसी की पहचान करेगा? सभी संत यही उपदेश देते हैं — कि जो माया को जीतता है, वही वास्तव में बड़ा है।धिक्कार है उन पर, जो परचे (अलौकिक चमत्कार) देने वालों और करामात दिखाने वालों को बड़ा समझते हैं। परचे माया के पद में होते हैं, और परचा देना ही माया के द्वारा अधबीच (मार्ग के बीच में) लूट लेना है। सारा संसार उन्हीं परचा देने वालों और करामात दिखाने वालों की प्रशंसा करता है —
लेकिन उन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि परचे और करामात प्रधान नहीं हैं। परचा देना कायरता है — अधबीच में साधक को लुभाकर भटकाना है। यदि केवल रिद्धि-सिद्धियाँ या मरे को जिलाना ही मोक्ष दे सकते, तो फिर शक्ति में कौन सा अवगुण था कि वह मोक्ष प्रदान नहीं कर सकी?महाराज फरमाते हैं: जैसे किसी को वैराग्य उत्पन्न हो और वह घर छोड़कर साधु बनना चाहे, तो उसकी स्त्री उसे सुख-सुविधाएँ दिखाकर रोकना चाहती है। वैसे ही रिद्धि-सिद्धियाँ भी "केः पद" और "आः पद" की प्राप्ति नहीं होने देतीं। ये बीच मार्ग में भक्ति को भटका देने वाली माया की चालें हैं।
जिन्होंने सतगुरु विधि से भजन करके केः पद आः पद की प्राप्ति की है वो ही इस भेद को जानते है दूसरे नहीं जानते। जो परीक्षा कर जानता है, वही परीक्षा करता है, दूसरे कैसे कर सकते है। सभी संत यह उपदेश देते है कि जो माया को जीतता है वो बडा है, परन्तु धिक्कार है उनकी को जो परचा देने वालो व करामात बताने वालो को बडा समझते है, परचे माया के पद अकल में होते है, परचा देना ही माया के द्वारा अध बीच में मार लेना है। सारा संसार परचा देने वालों, बताने वालो की सराहना करते है, इनको इतना भी ज्ञान नहीं है, जो परचो को प्रधानता करामात देते है। परचा देना ही कायरता से अध बिच लूटना है। रिधी सिधी मिलने से मरे हुये को जिलाने से मोक्ष हो जाता तो शक्ति में क्या अवगुण है, जो मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकती। मःफः है कि जिस तरह किसी को बैराग उत्पन्न होने पर घर छोडकर बन जाता है तो उसकी स्त्री उसको कई चैन बताकर रोकना चाहती है। ऐसे ही रिद्धि सिद्धि केः पद आः पद की प्राप्ति नहीं होने देती है।
Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)
म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ। म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥ आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। म्हारे आंगणिये ओ साधां र...
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हेली ए आज पूनम वाली रात, चालोनी सतसंग में ।।टेर।। हेली ए सतगुरु मिलिया दयाल, भिगोय दिनी रंग में। हेली ए चालोनी गुरांसा री हाट, ज्ञ...
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नमो नमों गुरूदेव, परम निज भेव बताया। निर्गुण ज्ञान विचार, हंस परम हंस कुवाया ॥ नमों नमों गुरूदेव, समुद्र में डुबत तारया । नमों न...