Thursday, November 20, 2025

Saadho bhai anand pad guru ho साधो भाई आनन्द पद गुरु होई_ हरजस पद राग मिश्रीत (७) साधो भाई आनन्द पद गुरु होई। राज जोग सतगुरु की सेवा, और जोग कुल होई ।। टेर ।। पूरण ब्रह्म पिता है मेरा, अंछा है मारी बाई। सुं भोग करे बस हुवा, जब या कहाणी माई ।। १।। इण भेद बिना ज्ञानी सो जग में, सब ओकी कर जाणे। पिता गुरु का गुण न्यारा, बुध बिन नांय पिछाणे ।। २ ।। माता मात पिता का मैं अगवाणी, ज्यूं जग सपूत कहायो। नाना विध पदी सो देखी, आनन्द पद नहीं पायो ।। ३ ।। नुगरो रयो जुगे जुग हंसो, मोख कोण विध पावे। सुरगुण निरगुण ओ दोय भक्ति, कुल का धरम कहावे ।। ४ ।। सुरगुण निरगुण दोनं छूटी, नाम कला जब जागी। अब बैराग अपज्यो मोने, तब या सुजण लागी ।। ५ ।। सतगुरु शरण हंस अब आयो, अब सुगरो नर होई। मात पिता दोनुं को तारूं, जे गम पूछे मोई ।। ६ ।। पूरण ब्रह्म पिता हमारा, अंछया मात कहावे। अब दोनुं को मोख पहुंचावू, जे मोई शरणे आवे ।। ७।। तीन लोक में जे नर नारी, सब कुल मेरो होई। मां र बाप सेत सब नर नारी, जे गुरु धरम पकडे कोई ।। ८ ।। Harjas Pad Raag Mishrit (7) Saadho bhai anand pad guru hoi. Raaj jog satguru ki seva, aur jog kul hoi. ॥ Ter ॥ Puran Brahm pita hai mera, ancha hai maari bai. Sun bhog kare bas huva, jab ya kahaani maai. ॥ 1 ॥ In bhed bina gyaani so jag jag mein, sab oki kar jaane. Pita guru ka gun nyaara, budh bin naay pichhaane. ॥ 2 ॥ Mata maat pita ka main agvaani, jyu jag sapoot khayaayo. Naana vidh padi so dekhi, anand pad nahin paayo. ॥ 3 ॥ Nugro rayo juge jug hanso, mokh kon vidh paave. Suragun niragun o doy bhakti, kul ka dharam kahaave. ॥ 4 ॥ Suragun niragun donan chhooti, naam kala jab jaagi. Ab bairaag apajyo mone, tab ya sujan laagi. ॥ 5 ॥ Satguru sharan hansa ab aayo, ab sugro nar hoi. Maat pita donun ko taarun, je gam poochhe moi. ॥ 6 ॥ Puran Brahm pita hamaara, anchhyaa maat kahaave. Ab donun ko mokh pahunchaavu, je moi sharane aave. ॥ 7 ॥ Teen lok mein je nar naari, sab kul mero hoi. Maan r baap set sab nar naari, je guru dharam pakde koi. ॥ 8 ॥ साधकों से महाराज फरमाते हैं कि:"आः पद" ही गुरु पद है। यही राजयोग की भक्ति है, और यही सतगुरु की भक्ति है। इसके अलावा जितने भी योग हैं, वे सब माया ब्रह्म की भक्ति के अंतर्गत आते हैं।पूर्ण ब्रह्म हमारे पिता हैं, और अंछा शक्ति (सतशक्ति) हमारी माता है। लेकिन जो ब्रह्म माया का भोग करता है, उसे माता कहा जाता है (क्योंकि वह सृजन शक्ति से जुड़ा है)।जो ज्ञानी भेद नहीं करते, वे माया और ब्रह्म के पद को एक ही समझ बैठते हैं। जैसे माता, पिता और गुरु — इन तीनों के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं, वैसे ही बिना विवेक और बुद्धि के यह भेद समझ में नहीं आता।माया ब्रह्म की भक्ति मैंने अनेक जन्मों तक की है, जैसे कोई योग्य पुत्र अपने कुल की सेवा करता है। इसके फलस्वरूप तीनों लोकों में बहुत सी पदवियाँ मिलीं — लेकिन "आः पद" (गुरुपद) की प्राप्ति नहीं हुई।जब तक "आः पद" की प्राप्ति नहीं होती, तब तक हंस (आत्मा) को सुगरा (जागरूक) नहीं कहा जा सकता। वास्तव में आः पद की प्राप्ति न होना ही मोक्ष न होना है।सगुण और निर्गुण की भक्ति भी माया ब्रह्म की भक्ति है, जो कुल की माता-पिता की भक्ति कहलाती है।सगुण भक्ति = वाणी के आधार से भजननिर्गुण भक्ति = श्वांस (प्राण) के आधार से भजन इन दोनों साधनों से जब पारब्रह्म के निज नाम की जागृति होती है, तब आत्मचेतना के आधार पर अलग प्रकार की भक्ति शुरू होती है। यही सगुण-निर्गुण से अलग होना कहलाता है।निज नाम की जागृति से वैराग्य उत्पन्न होता है। यही सतशब्द की ओर झुकाव है — और यही सतगुरु की शरण लेना है, जब हंस सुगरा (जाग्रत चेतन) बन जाता है।मैं माया और ब्रह्म दोनों को तारने वाला हूं, परंतु केवल जब कोई सतस्वरूप “आः पद” का ज्ञान धारण करे, तभी वह कह सकता है — "यह मोई शरण है।"पूर्ण ब्रह्म पिता हैं, अंछा शक्ति माता है, और यदि कोई जीव इस सतगुरु ज्ञान को धारण कर ले, तो उसे मोक्ष, यानी पूर्ण परमानन्द की प्राप्ति हो सकती है। यही "मोई शरण आना" कहलाता है।तीनों लोकों के जितने भी स्त्री-पुरुष हैं, वे सब मेरे ही कुल के हैं — चाहे वे माया ब्रह्म के ही क्यों न हों।लेकिन अगर वे केः पद और आः पद का ज्ञान धारण करें, तो यही गुरु धर्म पकड़ना कहलाता है।महाराज अंत में फरमाते हैं — "जब कोई मेरे इस ज्ञान को सुनता है तो सकुचाता है," जैसे किसी घर में कोई बैरागी हो जाए, तो पूरा घर परेशान हो उठता है। साधको से महाराज फरमाते हैंकि आः पद है वो गुरु पद है। राज जोग की भक्ति सतगुरु की भक्ति है, दूसरे योगों की भक्ति माया ब्रह्म की भक्ति है। पूरण ब्रह्म पिता है अंछा शक्ति वो हमारी बाई है। ब्रह्म माया का भोग भोगता है इसलिये उसे माता कहा है। बिना भेद के ज्ञानी वो माया व ब्रह्म के पद को एक ही समझते है। माता पिता व गुरु के गुण अलग अलग है, बिना बुद्धि के नहीं जानते। माया ब्रह्म की भक्ति मैंने अनन्त जन्मो तक की, यही सपूत बेटे की जैसे है। उससे तीन लोको में अनेक तरह की पदवी प्राप्त हो गई पर आः पद की प्राप्ति नहीं हुई। आः पद गुरु पद है, उसकी प्राप्ति नहीं होती तब तक हंस नुगरा है। आः पद की प्राप्ति नहीं होना ही मोक्ष नहीं होना है। सुरगुण निरगुण की भक्ति माया ब्रह्म की याने कुल की माता पिता की है। सुरगुण याने बांणी के आधार र से, निरगुण याने श्वांस के आधार से भजन करने पर, पारब्रह्म परमात्मा के निज नांव की जागृति हो जाती है, तब आत्मचेतन के आधार पर अलग भक्ति होने लग जाती है, यही सुरगुण निरगुण से छूटना याने अलग होना है। निज नांव की जागृति को ही बैराग उत्पन्न होना कहते है। सतशब्द की भक्ति होना ही हंसो का सतगुरु शरण होना है, जब हंस सुगरा होता है। माया ब्रह्म दोनो को तार देता हूं। अगर वो सत स्वरूप आः पद का ज्ञान धारण करे तो, यह जे गम पूछे मोई है। पूरण ब्रह्म पिता है, अंछया शक्ति माता है, वो यह सतगुरु का ज्ञान धारण करे तो मोक्ष याने पूर्ण परमानन्द की प्राप्ति हो सकती है, यही मोई शरण आना है। तीन लोक में जितने भी स्त्री पुरूष है वो सब मेरा ही कुल है। चाहे माया ब्रह्म सहित सब स्त्री पुरूष हो, यदि वे केः पद आः पद का ज्ञान धारण करे, यही गुरु धर्म पकडना है। महाराज फरमाते हैं कि ऐसे मेरा यह ज्ञान सुण सब सकुचाते है जैसे घर में कोई भी बैरागी होवे तो सब दुख पाते है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...