Thursday, November 20, 2025

Santo guru bhakta nahin koi संतो गुरु भक्ता नहीं कोई_ हरजस पद राग मिश्रीत (६) संतो गुरु भक्ता नहीं कोई। सुरगुण निरगुण दोय भक्त ओ, मात पिता की होई ।। टेर ।। राजा रंक नार काहा पुरूषा, हिन्दू तूरक मिल दोई। मात पिता का सब अगवाणी, ज्ञानी ध्यानी लोई ।। १ ।। हद में ज्ञान ध्यान बिध सारी, सो मात पिता की सेवा। बेहद माह समाधी लागे, जहां पिता निरंजण देवा ।। २ ।। ईनकूं गावे ईनकूं ध्यावे, इनका शिवरण होई। जो नर समझ करने आगे, तत्त पिछाणे कोई ।। ३ ।। सुरगुण छाड तजे निरगुण कूं, नेः अँच्छर कोई पावे। ओऊं सोऊं तजर अजपो, पिछम घाट जन आवे ।। ४ ।। हंसो चढे पटक सब माया, नेः अँच्छर संग होई। मणिया सेंग ईकीसूं फोडे, चडे शिखर कहूं तोई ।। ५ ।। अला पिंगला दोनुं जागे, मेरूं डण्ड सूं भाई। सुखमणा चले शीष ऊपर होय, मिले त्रिकुटी आई ।। ६ ।। सतस्वरूप शब्द के मांही, आठ पोहोर जन देखे। रूप न रंग बरण कुछ नांही, देखत अन्त बसेखे ।। ७ ।। तत्त कहे सोई पण ऊला, ज्ञान दिष्ट सूं जोवे। आनन्द पद ज्यों ज्ञान बिन घट में, अखण्ड रात दिन होवे ।। ८ ।। नव तत लिंग शरीर कहिजे, सो नहीं इण संग चाले। आत्म पांच तत्त नाभ में, बिछडी नृगुटी में नव पाले ।। ९ ।। आनन्द पद कूं हंस पहुंचे, नेः अँच्छर संग होई। पूरब घाट चढे सो अँच्छर, ईखर शब्द कहूं तोई ।। १० ।। ईखर शब्द संग जे जन चढिया, दशवें द्वार लग जावे। दशवों द्वार न फूटे वां सूं, जब फिर पाछा आवे ।। ११ ।। ईखर शब्द संग नव तत्त चाले, माया सरूपी होई। नेः अँच्छर ओ सत सरूपी, यो द्वारो दे खोई ।। १२ ।। दशवें द्वार परे पद आनन्द, सो सतगुरु पद जांणो। दशवें द्वार मांही सब बांता, माया ब्रह्म पिछाणो ।। १३ ।। मात पिता हंस का होवे, माया ब्रह्म कहूं तोई। आनन्द पद सतगुरु सो कहिये, समरथ नेः अँच्छर सो होई ।। १४ ।। केवल बीज शब्द ओ कहिये, सो बाहर सूं आवे। घट में नांव तिको सो माया, तांको मूल कहावे ।। १५ ।। घट में नांव राम सो कहिये, जिण संग जे गत पावे। सो मात पिता को छाड जगत में, गुरु शरणे क्यों जावे ।। १६ ।। कह सुखराम ज्ञानी सब भूलो, ज्यां में न्याव न कोई। निरगुण ब्रह्म पिता हंसन को, गुरु ठेरायो जाई ।। १७ ।। Harjas Pad Raag Mishrit (6) Santo guru bhakta nahin koi. Suragun niragun doy bhakt o, maat pita ki hoi. ॥ Ter ॥ Raja rank naar kahan purusha, Hindu Turak mil doi. Maat pita ka sab agvani, gyaani dhyaani loi. ॥ 1 ॥ Had mein gyaan dhyaan bidh saari, so maat pita ki seva. Behad maah samaadhi laage, jahan pita Niranjan deva. ॥ 2 ॥ Eenku gaave eenku dhyaave, inka shivaran hoi. Jo nar samajh karne aage, tatt pichhaane koi. ॥ 3 ॥ Suragun chhaad taje niragun ku, neh anchar koi paave. Oun Soun tajr ajapo, pichham ghaat jan aave. ॥ 4 ॥ Hanso chadhe patak sab maaya, neh anchar sang hoi. Maniya seng eekisoon fode, chadhe shikhar kahoon toi. ॥ 5 ॥ Ala pingla donun jaage, merun dand soon bhaai. Sukhmana chale sheesh oopar hoy, mile trikuti aai. ॥ 6 ॥ Satswaroop shabd ke maahi, aath pohor jan dekhe. Roop na rang baran kuchh naahee, dekhata ant basekhe. ॥ 7 ॥ Tatt kahe soi pan oola, gyaan disht soon jove. Anand pad jyon gyaan bin ghat mein, akhand raat din hove. ॥ 8 ॥ Nav tatt ling shareer kahije, so nahin in sang chaale. Aatma paanch tatt naabh mein, bichhdi nrikuti mein nav paale. ॥ 9 ॥ Anand pad ku hans pahunche, neh anchar sang hoi. Poorab ghaat chadhe so anchar, eekhar shabd kahoon toi. ॥ 10 ॥ Eekhar shabd sang je jan chadhiya, dashven dwaar lag jaave. Dashvo dwaar na phoote vaan soon, jab phir pachha aave. ॥ 11 ॥ Eekhar shabd sang nav tatt chaale, maaya swaroopi hoi. Neh anchar o sat swaroopi, yo dwaar de khoi. ॥ 12 ॥ Dashven dwaar pare pad anand, so satguru pad jaano. Dashven dwaar maahi sab baanta, maaya Brahm pichhano. ॥ 13 ॥ Maat pita hans ka hove, maaya Brahm kahoon toi. Anand pad satguru so kahiye, samrath neh anchar so hoi. ॥ 14 ॥ Keval beej shabd o kahiye, so baahar soon aave. Ghat mein naav tiko so maaya, taanko mool kahave. ॥ 15 ॥ Ghat mein naav Ram so kahiye, jin sang je gat paave. So maat pita ko chhaad jagat mein, guru sharane kyon jaave. ॥ 16 ॥ Kah Sukhram gyaani sab bhulo, jyaan mein nyaav na koi. Niragun Brahm pita hansan ko, guru theraayo jaai. ॥ 17 ॥ संतों से महाराज फरमाते हैं कि गुरु पद की भक्ति करने वाले कोई नहीं हैं। सगुण भक्ति — अर्थात वाणी के आधार से, निर्गुण भक्ति — अर्थात सूरत के द्वारा शब्द ब्रह्म की, ये दोनों भक्ति माता-पिता की मानी जाती हैं — यानि माया ब्रह्म की भक्ति। राजा हो या रंक, स्त्री हो या पुरुष, हिंदू हो या मुसलमान — सभी ज्ञानी और ध्यानी माया ब्रह्म की ही भक्ति करते हैं। हद का क्षेत्र, यानी त्रिकुटी के नीचे — जहाँ शुभ कर्म, स्मरण, मन से ध्यान और मन से ज्ञान किया जाता है — वह माया ब्रह्म का क्षेत्र है। बेहद का क्षेत्र, यानि त्रिकुटी के ऊपर, जहाँ समाधि लगती है — वह ब्रह्म का क्षेत्र है।लोग उस ब्रह्म का ज्ञान करते हैं, उसका ध्यान करते हैं, और उसका स्मरण करते हैं। लेकिन जो व्यक्ति इसको समझकर तत — यानि ब्रह्म पद — को पहचान लेता है, जो बाणी का स्मरण कर उससे भी ऊपर उठकर सूरत के द्वारा शब्द का ध्यान करता है, फिर सूरत के ध्यान से भी पार जाकर नेः अक्षर, यानि सतशब्द को प्राप्त करता है — वही साधक सतगुरु विधि से “ओऊं सोऊं” में जप करता है, जिससे अजपा — वह शब्द जो स्वयं जागृत होता है — प्राप्त होता है। अजपा जप कर साधक को पश्चिम घाट — यानी बंकनाल में उलटना होता है। हंस, अर्थात अपनी चेतनता को माया के पद से हटाकर नेः अक्षर — यानि सतशब्द के साथ जोड़कर इक्कीस स्वर्गों को छेदन करते हुए ऊपर चढ़ना होता है।इड़ा-पिंगला (अला-पिंगला) दोनों मेरु, यानि यमराज के स्थान से जागृत होती हैं। सुषुम्ना मेरु से ऊपर उठकर त्रिकुटी में मिलती है। सतस्वरूप का पद शब्द में होता है, जो जन आठ पहर के ध्यान से प्राप्त करता है। उस पद का अनुभव तो होता है, पर उसमें कोई रूप, रंग, वर्ण नहीं दिखता — यह ब्रह्म को ज्ञान-दृष्टि से देखने वालों के लिए विशेष बात है।यह पद ऊली तरफ (आध्यात्मिक पार तरफ) का है। आः पद विज्ञान, यानि दिव्य दृष्टि से रात-दिन अखंड अनुभव होता है। नव तत्त्व लिंग शरीर वहाँ नहीं जाता।जब शब्द नाभि में आता है, तो चेतना पाँच तत्व के शरीर से अलग हो जाती है। त्रिकुटी में दो पंखों के कंवल से अनंत पंखों के कंवल तक — यानि पारब्रह्म तक पहुँचते हुए — चित्त, मन, बुद्धि, अहंकार और पाँच प्राण — इस प्रकार नव तत्त्व लिंग शरीर का साथ छूट जाता है। केः पद में लिंग शरीर नहीं होता। आः पद में हंस, यानी चेतना नेः अक्षर में लय होकर सतशब्द में लीन हो जाती है।पूरब दिशा — यानि संखनाल का रास्ता — अक्षर ब्रह्म (होणकाल ब्रह्म) का मार्ग है। इस मार्ग से चढ़ने वाले जन दशवें द्वार, बजरपोल, और हजार पंखों के कंवल तक पहुँचते हैं। बजरपोल से आगे नहीं जा सकते — वापिस लौटते हैं, इसलिए उनका आवागमन नहीं मिटता।अक्षर ब्रह्म के शब्द के साथ नव तत्त्व लिंग शरीर रहता है — अर्थात चित्त, मन, बुद्धि, अहंकार, पाँच प्राण — चेतना माया से अलग नहीं हो सकती।नेः अक्षर, जो सतशब्द है, सतस्वरूप का है — इसलिए वह दशवें द्वार को खोल देता है। दशवें द्वार के आगे आः पद है — इसे ही सतगुरु पद कहा जाता है।दशवें द्वार के अंदर जो कुछ भी है, वह सब माया ब्रह्म के क्षेत्र का है, और हंसों की उत्पत्ति भी माया ब्रह्म से है — इसलिए माया ब्रह्म को हंसों के माता-पिता कहा गया है।आः पद, यानि सतगुरु पद, वह समर्थ नेः अक्षर, यानी सतशब्द है, जो केः पद और आः पद की प्राप्ति कराता है। यह शरीर के साथ चेतन में नहीं है। यह चेतनता शरीर से अलग, निराकार, निरंजण — जिसे ब्रह्म बैराट कहते हैं — में होता है।सतगुरु विधि से भजन करने पर कंठ कंवल में सतशब्द प्रकट होता है। शरीर के चेतन पद में जितने भी नाम हैं, वे सभी माया के परपद में, वाणी-मन-विचार और सूरत के आधार पर हैं।यदि इन नामों से मुक्ति संभव होती, तो लोग गुरु की शरण में क्यों जाते?ज्ञानी लोग जो निराकार सर्वव्यापक पद को ही गुरु पद मानते हैं — वह वास्तविक गुरु पद नहीं है।नेः अक्षर सतशब्द, जो रात-दिन अखंड अनुभव होता है — वही केः पद और आः पद है। इसी को गुरु पद कहते हैं। यह ज्ञान से नहीं, बल्कि विज्ञान से प्राप्त होता है। संतो से महाराज फरमाते हैं कि गुरु पद की भक्ति करने वाले कोई नहीं है। सुरगुण याने वाणी के आधार से, निरगुण याने सूरत के द्वारा शब्द ब्रह्म की भक्ति की, ये दोनो भक्ति माता पिता की याने माया ब्रह्म की है। राजा क्या रंक याने गरीब, क्या स्त्री पुरूष, हिन्दू व मुसलमान दोनो ज्ञान करने वाले ज्ञानी व ध्यान करने वाले ध्यानी, सब माया ब्रह्म की भक्ति करते है। हद में याने त्रिकुटी के नीचे शुभ करम शिमरण मन से ज्ञान व मन से ध्यान तक का साधन माया ब्रह्म का है। बेहद याने त्रिकुटी के ऊपर जो समाधि लगती है वह ब्रह्म की है। इनका ज्ञान करते है इनका ध्यान करते है इनका सिमरण करते है। जो मनुष्य समझकर तत याने ब्रह्म पद की, ब्रह्म का निज नाव याने सत नाम की पिछाण करते है, बाणी का सिमरण कर, बाणी के शिमरण से भी अलग होकर सूरत के द्वारा शब्द का ध्यान कर, सूरत के ध्यान से भी अलग होकर ने: अँच्छर याने सतशब्द की प्राप्ति करते है। ओऊं सोऊं में सतगुरु विधि से जप कर अजपा याने जो शब्द जागृत होता है, उसे कहते है। अजपा प्राप्त कर उसके साथ पिछम घाट याने बंकनाल में उलटकर पिछम घाट जाना है। हंस याने अपनी चेतनता माया के पद से अलग होकर नेः अँच्छर याने सतशब्द के साथ होकर ईकीस स्वर्ग को छेदन कर ऊपर चढता है। अला पिंगला दोनो मेरू याने यमराज के स्थान से जागृत होती है। सुखमणा मेरू से सिर ऊपर होकर आती है, त्रिकुटी में मिल जाती है। सतस्वरूप का पद शब्द में है, जो जन के आठ पोहोर के ध्यान से प्राप्त होता है। उस पद का अनुभव होते हुये भी वहां रूप रंग वरण कुछ नहीं दिखता, ऐसी विशेष बात है जो ब्रह्म को ज्ञान दृष्टि से देखते है। वह पद ऊली तरफ का है। आः पद विज्ञान याने दिव्य दृष्टि से रात दिन अखण्ड अनुभव होता है। नव तत लिंग शरीर है वह इसके साथ नहीं जाता। शब्द नाभी में आता है वह आगे बढने पर चेतनता पांच तत्व के शरीर से अलग हो जाती है। त्रिकुटी में दो पांख के कंवल से अनन्त पांख के कंवल तक याने पारब्रह्म तक पहुंचने पर चित, मन, बुद्धि, अहंकार व पांचो प्राणो। इस प्रकार नव तत लिंग शरीर का साथ व केः पद में लिंग शरीर नहीं है। आः पद में हंस याने चेतनता नेः अँच्छर में लय होकर सतशब्द आः पद में लय हो जाता है। पूरब याने संखनाल के रास्ते जो चढते है वह अक्षर ब्रह्म याने होणकाल ब्रह्म का है। संखनाल के रास्ते अक्षर ब्रह्म के साथ चढने वाले जन दशवे द्वार ब्रह्मण्ड में बजरपोल व हजार पांख के कंवल तक जाते है। बजरपोल से आगे नहीं जा सकते, वापिस आ जाते है, उनका आवागमन नहीं मिटता। अक्षर ब्रह्म के शब्द के साथ नव तत्त लिंग शरीर रहता है। यानि चित, मन, बुद्धि, अहंकार, पांच प्राणों से चेतन अलग नहीं हो सकता, माया के साथ रहता है। नेः अँच्छर जो सतशब्द है, वह सतस्वरूप का है, इसलिये दशवे द्वार को खोल देता है। दशवें के आगे आः पद है उसको सतगुरु पद कहते है। दशवें द्वार के अन्दर जो होता है वह सब द्वार माया ब्रह्म के पद में होता है। हंसो की उत्पति माया ब्रह्म के पद से है इसलिये माया ब्रह्म हंसो के माता पिता है। आः पद सतगुरु पद है वह समरथ नेः अँच्छर याने सतशब्द है। केः पद आः पद की प्राप्ति कराने वाला यह सतशब्द है, जो शरीर के साथ चेतन के पद में नहीं है। शरीर चेतन से अलग निरंजण निराकार चेतन पद है इसको ब्रह्म बैराट कहते है। सो सतगुरु विधि से भजन करने कंठ कंवल पर सतशब्द प्रगट होता है। शरीर में चेतन पद में जितने नांव है, वह सब माया के पर पद में चेतन में है। जिससे इसको माया का मूल कहा है। शरीर के साथ चेतन में जो नांव है वो वाणी मन विचारो के आधार पर है व सूरत के आधार पर है। इन आधार के नावों द्वारा उस पद की प्राप्ति हो जाती तो जगत में मुक्ति माता पिता से हो जाती तो उसको छोडकर गुरू की शरण में क्यों जाते। ज्ञानी लोग जो निरंजण निराकार सर्व व्यापक जो पांच तत्वो के साथ चेतन का आधार है उस पद को गुरु पद मानते है परन्तु यह गुरु पद नहीं है। नेः अँच्छर सतशब्द रात दिन अखण्ड अधर अनुभव होता है वो केः पद आः पद है, उसे गुरु पद कहते है। वो ज्ञान से नहीं विज्ञान से प्राप्त होता है।

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हरजस पद राग मिश्रीत (५)   संत सुखराम जी महाराज का यह हरजस अत्यंत तार्किक, दार्शनिक और सुरति-शब्द योग के सबसे बड़े रहस्य का उद्घाटन करने व...