हरजस पद राग आसा (२०)
मन से महाराज फ़रमाते हैं कि सब भक्ति ये अलग-अलग हैं। जो हंस जिसकी भक्ति करेगा, उसे उसी लोक की प्राप्ति होगी। हठ योग की साधना शिव की भक्ति है, उससे कैलाश की प्राप्ति होती है। सांख्य योग की भक्ति ब्रह्माजी की है - यज्ञ करना, जप करना, वेदों का पाठ करना है। विष्णु की भक्ति सोहं जप करना है, उनसे बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है, उससे आगे नहीं जाता। शक्ति की भक्ति करने वाले ज्योति के लोक तक जाते हैं। देवताओं की भक्ति करने वाले मंत्रों का साधन करते हैं। देवता प्रसन्न होकर उनको इच्छा माफ़िक फलों की प्राप्ति करा देते हैं। पारब्रह्म की भक्ति करने वाले ब्रह्म की ही भक्ति करते हैं। वो होणकाल याने पारब्रह्म का सृष्टि कर्ता का पद है। उसमें जाकर समाते हैं और वहाँ से वापिस आ जाते हैं। सतस्वरूप की भक्ति है वो राज योग है, क्योंकि सहज में शरीर का सब जगह काम होता रहता है तथा सतशब्द की भक्ति भी होती रहती है, दोनों साथ होते रहते हैं। सतशब्द बंकनाल से उलटकर ब्रह्माण्ड व पार ब्रह्म से ऊपर अधर होता रहता है। केवल पद आनन्द पद की प्राप्ति हो जाती है। सेवा करना, धरम करना, व्रत करना, उपवास करना यह आत्मा की भक्ति है। इनसे जगत में ही इसका फल मिलता है, इससे मुक्ति नहीं होती है। महाराज फ़रमाते हैं कि यह सब भक्ति हद याने तीन लोक, बेहद याने ब्रह्म तक की प्राप्ति कराने वाली है। आनन्द पद की प्राप्ति इनसे नहीं होती है। आनन्द लोक में तो सतगुरु केवली भगवंतों की सत्ता याने सतशब्द नेः अँच्छर ही जाता है।
