मन से महाराज फ़रमाते हैं कि राज जोग की विधि इन सबसे अलग है। वेदों का ज्ञान करने वाले, वाणी से एक साँस में सुमिरन करने वाले, अष्टांग योग की साधना करने वाले, दरशनी व संसारियों को राज योग की विधि नहीं मिलती। जो राज को छोड़कर बन में चले गये, उनको भी राज जोग का भेद नहीं मिला। शरीर से परमहंस वृत्ति धारण करने वालों को, शरीर से अलग अपने आप को ब्रह्म समझने वालों को भी राज जोग का जरा सा भी भेद नहीं मिला। केवल गृहस्थ को त्यागने से वो निरभै कैसे हुए? क्योंकि नाँव याने सतशब्द का भेद नहीं मिला। गृहस्थ से उद्धार न होना मानकर त्याग से उद्धार होना मानकर वन में जाना ही भरमों से डरना है। बन में जाने पर दुख-सुख का अंतर में अनुभव होता है। फिर भी मुँह से नहीं कहते हैं क्योंकि अपने आप को त्यागी मानते हैं। बताओ, डर करके मौन धारण करके रखी है, वो निरभै कैसे हो सकते हैं? गृहस्थ व त्याग का अंग तो आत्मा ने धारण कर रखा है। ऐसा समझकर कर्मों से डर रहे हैं, उनको निरभै बुद्धि की प्राप्ति कहाँ हुई है? निज नाँव की जागृति प्रेम से भजन करने पर ही होती है। जिन हंसों को निज नाँव की जागृति होने पर रग-रग, रोम-रोम में अपने आप अनुभव होने लग जाता है। यही नख-चख कुदरत सोजना है। बंकनाल के रास्ते से उलटकर केवल पद आनन्द पद की प्राप्ति करना ही गढ़ पर चढ़ना है। मन के द्वारा यह साधन नहीं होता है। राज जोग की यह विधि है कि बिना दूसरे साधन के ही गढ़ पर चढ़ जाता है। ऐसी ही सहज समाधि लग जाती है जो कभी नहीं टूटती है याने मुँह से ऑटोमेटिक रटणा चलती रहती है और गगन मंडल में सतशब्द की धुनी गरजती रहती है। महाराज फ़रमाते हैं कि संसारी कार्य सहज में होते रहते हैं, यही भोग भोगना है। भ्रूकुटी याने सुखमणा में आठ पहर याने चौबीसों घंटों शब्द का अनुभव होकर आनन्द आता रहता है व इन्द्रियाँ शीतल रहती हैं। विषय भोग नहीं सताते हैं, अंग लक्षण क्षीण हो जाते हैं।
Thursday, September 4, 2025
Banda Raaj Yog Bidh Nyaari_ बांदा राज योग बिध न्यारी_ हरजस पद राग आसा (२१)
हरजस पद राग आसा (२१)
बांदा राज योग बिध न्यारी।
बेद लबेद भेद नहीं पायो, ना दरशण संसारी ॥ टेर ॥
तज तज राज गया बन बिचे, वांही भेद नहीं पायो।
परमहंस वैदेही धारा, ज्यां सुण लेस न आयो ॥ १ ॥
त्याग किया वे निरभै कैसे, नांव भेद कहां पाया।
माहा भरम डर उपज्यो घट में, तब बन कूं नर ढाया ॥ २ ॥
दुख सुख शकल अन्तर में परखे, मुख सूं कह न कांई।
वह कहवो निरभै किस विध हुवा, डर डर मून संभाई ॥ ३
अंग तो शकल आत्मा धरिया, क्या गरेही क्या त्यागी।
आ पचकर करमा सुं डरियो, निरभै बुध कहां जागी ॥ ४ ॥
जागे नांव प्रेम सुं भाई, नख चख कुदरत सोजे।
उलटर पीठ फाड़ चढ जावे, मन कर कछु नहीं सोजे ॥ ५
राज योग की आ विध भाई, बिन साजन चढ जावे।
ताली लगे न तुटे कोई, आ सेज समाध कहावे ॥ ६ ॥
कह सुखराम भोग सो भोगे, सेज होण सो होई।
नृगुटी मांय शब्द सुख भारी, आठ पोहोर कहूं तोई ॥ ७ ॥
Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)
म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ। म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥ आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। म्हारे आंगणिये ओ साधां र...
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हेली ए आज पूनम वाली रात, चालोनी सतसंग में ।।टेर।। हेली ए सतगुरु मिलिया दयाल, भिगोय दिनी रंग में। हेली ए चालोनी गुरांसा री हाट, ज्ञ...
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नमो नमों गुरूदेव, परम निज भेव बताया। निर्गुण ज्ञान विचार, हंस परम हंस कुवाया ॥ नमों नमों गुरूदेव, समुद्र में डुबत तारया । नमों न...
