बांदा पुराण सुण कुण तिरिया हो।
मोख जाय सो तो बिध न्यारी, पढिया सुं काज न सरिया हो ।॥ टेर ॥
बल पान्डव हरिचन्द रूखमांगद, फिर अमरीष कहावे
ऐसा अनन्त सत सुं तिरिया, सब जग सायद गावे ॥ १ ॥
दरवासा त्रणवृत ऊधालक, विश्वामित्र भाई
द्रोणाचार्य कृपाचारज, जप तप कर गत पाई ॥ २ ॥
कपिल मुनि गोतम बाणारस, अनंत रिष कहूं तोई।
ओ सोऊं जाप जपे गढ चढिया, साख भरे सब कोई ॥ ३ ॥
गोपीचन्द भरतरी गोरख, जलन्धर सुण आंणो।
ओ जोगारंभ साज हुवा बन्दा, और कछु नहीं जांणो ॥ ४ ॥
सनकादिक नारद हस्तामल, अस्टाबकर सोई
वास्टमुनि दतात्रेय याने, तत चिनियो जोई ॥ ५ ॥
नव जोगेश्वर जनक वेदैही, सुखदेव कूं संग किया।
कुदरत कला नांव की जागी, ऊलट आद घर लिया ।। ६ ।।
बालमिक भिलणी गुजर, ध्रुव प्रहलाद बखाणो ।
सिरियादे सरगरो सांचो, राम राम या जाणो ॥ ७ ॥
कलियुग सन्त कबीर नामदेव रांको, नानक पीपो भाई
सन्तदास दादू दरिया सा, नेः अँच्छर कल पाई ॥ ८॥
नेक नेक बानगी भाखी, धरम धरम की न्यारी
कह सुखराम सुणो सब कोई, हम नेः अँच्छर पाया।
Banda Puran sun kun tiriya ho.
Mokh jaay so to bidh nyari, padhiya sun kaaj na sariya ho. || Ter ||
Bal Pandav Harichand Rookhmangad, phir Amreesh kahave
Aisa anant sat sun tiriya, sab jag sayad gaave. || 1 ||
Darvasa Tranvasr Udhaalak, Vishwamitra bhai
Dronacharya Krupachaaraj, jap tap kar gat paai. || 2 ||
Kapil muni Gotam Banaras, anant rish kahoon toi.
O soon jaap jape gadh chadhiya, saakh bhare sab koi. || 3 ||
Gopichand Bhartari Gorakh, Jalandhar sun aaano.
O jogaarambh saaj huva banda, aur kachu nahi jaano. || 4 ||
Sanakaadik Narad Hastaamal, astabakaar soi
Vastamuni Datatreya yaane, tat chiniyo joi. || 5 ||
Nav Jogeshwar Janak Vedaahi, Sukhdev ko sang kiya.
Kudrat kala naav ki jaagi, ulat aad ghar liya. || 6 ||
Balmik Bhilni Gujar, Dhruv Prahlaad bakhaano.
Siriyaade Sargarro saancho, Ram Ram ya jaano. || 7 ||
Kaliyug Sant Kabir Namdev raanko, Nanak Peepo bhai
Santdas Dadu Dariya saa, neh anchar kal paai. || 8 ||
Nek nek baangi bhakhi, dharm dharm ki nyari
Jo vistaar kahoon to bota, kahaan lag karoon ucharri. || 9 ||
Kah Sukhraam suno sab koi, hum neh anchar paaya.
Nav Jogeshwar Janak Vedaahi, "yaamein ulat samaya." || 10 ||
महाराज फ़रमाते हैं कि पुराण सुन किसको मोक्ष की प्राप्ति हुई, मोक्ष की प्राप्ति का साधन अलग है। पुराण पढ़ने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है। राजा बलि, पाँच पांडव, हरिश्चंद्र, रुक्मांगद, राजा अमरीष ये सच बोलकर स्वर्ग की प्राप्ति करी। सब संसार साक्षी देता है। दुर्वासा, तृणवृत्त, उधालक, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य इन्होंने तप कर स्वर्ग की प्राप्ति की, कपिल मुनि, गौतम जी, जालंधरजी ये अष्टांग योग की साधना करके शरीर से अमर हो गये और दूसरी साधना नहीं की, सनकादिक, नारद, हस्तामलजी, अष्टावक्रजी व वशिष्ठ मुनि, दत्तात्रेयजी इन्होंने तत् याने पारब्रह्म की प्राप्ति की, नव जोगेश्वर राजा जनक वैदेही और वेदव्यासजी के लड़के सुखदेवजी इन्होंने कुदरत कला याने सतशब्द नेः अँच्छर की जागृति करके बंकनाल से उलटकर आद घर याने केवल पद आनंद पद की प्राप्ति की। वाल्मीकि ऋषि, शबरी, भिलणी, गुजरी, ध्रुवजी, प्रह्लादजी, श्रीयादे, बालमित सरगरा इन्होंने वाणी के आधार से राम-राम की भक्ति की। कलियुग में संत कबीरजी, नामदेवजी, रांकाजी, नानकजी, पीपाजी, संतदासजी, दादूजी, दरियावजी इन्होंने सतशब्द नेः अँच्छर की प्राप्ति की है। सब धर्मों का थोड़ा-थोड़ा वर्णन किया है, अगर विस्तार से वर्णन करूँ, तो कहाँ तक करूँ। महाराज फ़रमाते हैं कि सब ही सुनो, हमने भी सतशब्द नेः अँच्छर की प्राप्ति की है। नव जोगेश्वर राजा जनक वैदेही ने बंकनाल के रास्ते उलटकर केवल पद की प्राप्ति की है, वो हमने की है।
