धिन धिन सो हंस जीव, मानव तन पाय के। साहेब कूं दिन रात, गयो नर गाय के ।। १ ।।
किया किया सब शुभ काम, अशुभ सब पालिया। शिवरयो शिरजण हार कारज कर चालिया ।। २।।
होय उजागर जीव चलया है धाम ने। धिन धिन वे नर नार गायो ज्यां राम ने ।। ३ ।।
जब लग जुग में बास सांई नहीं बिसरे। धिन वांको सुण भाग बैकुण्ठी निसरे ।। ४ ।।
गरूढ बुजियो आय बिशन युं भाक्यिो। अंत समे उच्छाव आनन्द सत राखियो ।। ५ ।।
दिन द्वादस जोय हरिजस गावसी। कह सुखदेव वो जीव सुणियां सुख पावसी ।। ६ ।।
Dhin Dhin so Hans Jeev – Harjas Pad Raag Mangal (3)
Dhin dhin so hans jeev, maanav tan paay ke.
Saaheb koon din raat, gayo nar gaay ke. || 1 ||
Kiya kiya sab shubh kaam, ashubh sab paaliya.
Shivaryo shirjan haar kaaraj kar chaaliya. || 2 ||**
Hoy ujagar jeev chalayaa hai dhaam ne.
Dhin dhin ve nar naar gaayo jyaan Ram ne. || 3 ||**
Jab lag jug mein baas saai nahin bisre.
Dhin waan ko sun bhaag Baikunthi nisre. || 4 ||**
Garoodh bujiyo aay Bishan yun bhaakiyo.
Ant same uchchhaav aanand sat raakhiyo. || 5 ||**
Din dwdas joy Harijas gaavsi.
Kah Sukhdev wo jeev suniyaan sukh paavsi. || 6 ||**
ऐसे हंस और जीव धन्य हैं, जो मनुष्य शरीर पाकर परमात्मा का रात-दिन भजन करके शरीर छोडकर संसार से चले जाते हैं। सब अच्छे-अच्छे कर्म किए, बुरे कर्म छोड़े हैं और परमात्मा का भजन कर अपना जगत में नाम करके धाम को जाते हैं। उन स्त्री-पुरुषों को धन्य है धन्य है, जिन्होंने परमात्मा की भक्ति की है। संसार में रहते हुए भी एक क्षण भी परमात्मा को नहीं भूलते हैं। उनके भाग्य भी धन्य हैं जिनके शरीर छोड़ने के बाद बैकुण्ठी निकलती है। विष्णु भगवान को गरुड़ जी ने पूछा तब उन्होंने कहा कि अंत समय में भगवान का भजन करना चाहिए और दुःख नहीं मानना अच्छा है। उनके बारह दिनों में परमात्मा की भक्ति-भजन करना चाहिए। महाराज फरमाते हैं कि इन बातों को सुनकर जीव बहुत सुख पाता है।