Friday, August 29, 2025

Gyaani Sab Hi Saambhlo Re_ज्ञानी सब ही सांभलो रे। _हरजस पद राग धनाश्री (७)


 


ज्ञानी सब ही सांभलो रे।
दिया मैं हेला आय, यांकी कल कीमत नहीं रे काय ।। टेर ।।
सूरा के शिर गुरु नहीं रे, नहीं सतियां के होय।
यांका तो सतगुरु सत ही है रे, दुजो गुरु नहीं कोय ।। १ ।।
और शकल जहान में है रे, कयां करे सब काम।
यूं करणी कर राम ने, परसे नहीं निज धाम ।। २।।
सूर फिरे बाजार में रे, सतियां घरां में होय।
मोसर विध बिन बाहेरो रे, याने सत नहीं प्रगटे कोय ।। ३ ।।
सतगुरु राजा सूरवा रे, लेण मुलक चढ जाय।
सतगुरु जब प्रगटे रे, सूरा सिखा में आय ।। ४ ।।
सूरातन जब प्रगटे र, सिंधु दिरावे कोय।
यूं जन गढ चढ बोलसी रे, नांव उदे घट होय ।।५।।
पीव आज जब बिछुडे रे, जब सत आवे जांण।
आडा दिन जुग बोहो पडे रे, ज्यां मुख शरम न कांण ।। ६ ।।
कह सुखदेव जब भूप ही रे, मुलक न लेवे कोय।
तो काहे कुंजूंजसी रे, मुवा बिन सतीयन होय ।। ७ ।।

"सभी ज्ञानवान सुनो, मैं उपदेश करता हूँ कि इन्हें कला की जानकारी नहीं हो सकती। शूरवीरों और सतियों के गुरु नहीं होते, उनका सत प्रकट होता है, वही सतगुरु है और दूसरा कोई नहीं है। संसार में सभी काम कहने से कर लेते हैं। ऐसे ही कर्म करने से राम जी और परमपद की प्राप्ति नहीं होती। शूरवीर बाज़ार में फिरते हैं और सतियाँ घरों में बैठी रहती हैं, लेकिन समय आने पर दोनों में सत प्रकट होता है। सतगुरु मौजूद हो तो शूरवीरों, यानी सतगुरु के बताए अनुसार भजन करने वाले शिष्यों में नाम की जागृति हो जाती है और राजा शूरवीर होता है तो दूसरे मुल्क को लेने के लिए चढ़ाई करता है। जब सिंधु राग गाते हैं, तभी शूरवीर में शूरता प्रकट होती है, इसी प्रकार जिनसे सतशब्द की जागृति होती है, वे ही केवल पद, यानी गढ़ चढ़कर अणभै वचन बोलते हैं। पति के शरीर छोड़ने के समाचार मिलते ही सती में सत प्रकट हो जाता है। समय पर सत नहीं प्रकट होता है, तो बाद में प्रकट नहीं होता है, यही 'आड़ा दिन पड़ना' है। महाराज फ़रमाते हैं कि जब राजा मुल्क लेने की इच्छा ही नहीं रखता है, तो वह लड़ाई क्यों करेगा? इसी प्रकार पति नहीं मरेगा, तो सती क्यों होगी?

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...