प्रेम पियाला पीजिये, दुजा रस छाडो। तामस तिमर मिटाय के, चरणा चित गाढो ।। टेर ।।
पचीसूं बस करे, बारी नव लांगो। शरम सनक शंक्या तजो, मन को सल भांगो ।। १ ।।
पांच आसण नेः चल धारिये, दिल सांवत रहिये। ओक नकेवल राम कूं, ओ निश मुख कहिये ।। २ ।।
जन सुखदेव गुरु देव कूं, पूरण पत राखो। ब्रह्मण्ड घर जाय के, ईमरत रस चाखो ।। ३ ।।
Harjas Pad Raag Bilawal (15)
Prem piyaala peejiyo, duja ras chhaado. Taamas timar mitaay ke, charna chit gaadho. (Ter)
Pachisoon bas kare, baari nav laango.
Sharam Sanak Shankya tajo, man ko sal bhaango. ॥1॥
Paanch aasan neh chal dhaariye, dil saavt rahiye.
Ok nakeval Ram koon, ok nish mukh kahiye. ॥2॥
Jan Sukhdev Guru Dev koon, poorn pat raakho.
Brahmand ghar jaay ke, eemrat ras chaakho. ॥3॥
"प्रेम से भक्ति करके आनंद लेना ही प्रेम का प्याला पीना है। माया के भोगों के सुख को छोड़ना ही 'दूजा रस छोड़ो' है। क्रोध और अज्ञान को मिटाकर अखंड भक्ति करना ही चरणों में चित्त गाढ़ना है। पाँच विषयों और पच्चीस प्रकृतियों के शरीर से अलग होकर नौ दरवाजों को छोड़कर दसवें द्वार में पहुँचकर आगे केवल की बारी लाँघना है। शरम और शंका को छोड़कर मन लगाकर भक्ति करना 'मन का सल भागना' है, और दिल को सावंत शूरवीर करके आसन, यानी आत्म-चेतन से, बारह ही कंवल का छेदन करके केवल पद में शब्द का आनंद लेना है। महाराज फ़रमाते हैं कि सतगुरु के ज्ञान के अनुसार विश्वास रखकर साधन करोगे, तो केवल पद, आनंद पद में पहुँचकर आनंद रूपी अमृत पीता रहेगा।"