ऐसा जुग में को नहीं, ममता को धपावे। सुर नर मुनि देवता, उणारथ सब गावे ।। टेर ।।
पच पच मर गया मानवी, सुर देवत सारा। राम रहीम ही पच मरा, इण ममता रे लारा ।। १ ।।
आद भवानी भरम रे, दुख पावे रे भाई। निराकार निरबाण ने, आ ममता ले आई ।। २ ।।
साधु पंडित सिद्ध कूं, ममता दूं लागी। पर आत्म वश करे, दूणी होय जागी ।। ३ ।।
निरगुण सरगुण ज्ञान है, चडिया दोऊ आपे। केवल बिन सुखराम कह, ममता नहीं धापे ।।४।।
Harjas Pad Raag Bilawal (16)
Aisa jug mein ko nahi, mamta ko dhapaave. Sur nar muni devta, unaarath sab gaave. (Ter)
Pach pach mar gaya maanvi, sur devta saara.
Ram Rahim hi pach mara, in mamta re laara. ॥1॥
Aad Bhawani bharam re, dukh paave re bhai.
Nirakaar nirbaan ne, aa mamta le aai. ॥2॥
Sadhu pandit siddh koon, mamta doon laagi.
Par aatma vash kare, dooni hoy jaagi. ॥3॥
Nirgun sargun gyaan hai, chadiya doo aape.
Keval bin Sukhram kah, mamta nahi dhaape. ॥4॥
संसार में ऐसा कोई नहीं है जो कामनाएँ नहीं रखता। यही 'ममता को नहीं धपाना' है। देवता, मनुष्य, मुनि सभी कामनाएँ करते हैं, यही 'उणारथ गाना' है। सभी मनुष्य और देवता, राम और रहीम भी ममता नहीं छोड़ सके, यही 'पच मरना' है। ब्रह्म, जो निराकार और निर्बाण है, आत्म-चेतन, वह भी कामना, यानी इच्छा से आकार के साथ आ गया। आदि भवानी, यानी इच्छा शक्ति, सुख भोगने के लिए आत्मा को शरीर में लाई, परन्तु सुख के पीछे दुख का तांता लग गया। साधु, पंडित और सिद्ध सभी को ममता की ज्वाला लग रही है, वे चेले बनाकर उनको अपने वश में करके उनसे मोह करते हैं, यही 'दूणी होकर जागना' है। निर्गुण में 'मैं ब्रह्म हूँ' और सगुण में 'मैं भक्ति करता हूँ', यही दोनों में अहंकार है। महाराज फ़रमाते हैं कि जब तक केवल पद की प्राप्ति नहीं होगी, तब तक ममता से अलग नहीं हो सकते।"