नमों नांव गुण पार, पार तेरा कुण पावे ।
नमों गत अवगत नमों तु भेव बतावे ॥ १ ॥
नमों पाप खोगाल, नमों परमेश्वर प्यारा।
नमों नांव बिन छेह, नमों बिडद सिर भारा ॥ २ ॥
नमों नेट श्रीराम, नमों नारायण नीका ।
नमों करण करतार, नमों केवल हर टीका ॥ ३ ॥
नमों नांव निसाण, नमों सब तुज सरावे।
नमों निरंजन राय, नमों संतन मन भावे ॥ ४ ॥
नमों आप सेह जीत, नमों तु ही तु होई।
नमों धरण आकाश, तुम बिन और न कोई ॥ ५ ॥
नमों नांव निरधार,नमों टेके बिन करता ।
नमों पुरातम पीव, नमों केवल मन हरता ॥ ६ ॥
नमों हरि हर राम, नमों संतन सुख दाई ।
नमों जहां तहां तुज, शकल घट रहया समाई ॥ ७ ॥
नमो बीधुसन भरम, नमों सब करम मिटावण ।
नमो तात प्रतिपाल, नमों भों मांय लंघावण ॥ ८ ॥
नमों आस असमान, नमों हर अंतरजामी।
नमों संतन सब शीष, नमों केवल हर स्वामी ॥ ९ ॥
नमों मेहर जगदीश, नमों हर गरभ अहारी ।
नमों पलक दरयाव, नमों सब मांड पसारी ॥ १० ॥
नमों निरंतर मांय, नमों सायब हर सांचा ।
नमों अलख हर आप, नमों त्यारण हर बाचा ॥११॥
नमों रूप अण रूप, रूप तेरा सब होई ।
नमों ध्यान निज धाम, नमों केवल हर सोई ॥ १२॥
नमों नमों गुरूदेव, नमों मुगती गत दाता ।
नमों ब्रह्म निरधार, नमों सुख शरण विधाता ॥ १३ ॥
नमों निरंजन राय, नमों आकाश बिन पाणी ।
नमों देव शिर देव, नमों जुग जुग जुगाणी ॥१४॥
नमों राम पर पीर, नमों रमता सब मांही ।
नमों आप करतार, नमों केवल हर कवाही॥ १५॥
नमों निरंजण देव, नमों पूरण अविनाशी ।
नमों ब्रह्म परिब्रह्म, नमों हरि घट घट वासी ॥१६॥
नमों अचल अद्वेत, भेद जन बिरला पावे ।
नमों असंगी संग, रंग बिन रंग दिखावे ॥ १७ ॥
दोहा
सुखरामदास वन्दन करे, नमों ब्रह्म भगवान ।
आत्म तत अरूप है, पूरण पद निरवाण ॥ १८ ॥
नमों नमों परब्रह्म, अचल निज नांव अरूपं ।
नमों अखै अद्वैत, परम गुरू सत सरूपं ॥१९॥
नमो ब्रह्म अनाद, आद अगाद गुसांई।
तीन लोक चहुं चख, शकल व्यापक हर सांई ॥ २० ॥
नमो नमों सब मांय, नमों सब ही सु न्यारा ।
नमों प्रगट नहीं गुप्त,छीपत नहीं लिपत लिंगारा ॥२१॥
नमो नमों निरबाण पद, निजानंद निश्चल पदा ।
सुखरामदास वंदन करे, चरणकंवल बंदु सदा ॥ २२ ॥
श्लोक:
धर्मो न कर्मो ग्यानों न तांई, नहीं बाप मैया बैना न भाई ।
दिष्टो न मुष्टो नामो न ठांणा, कहे इम सुखम ब्रह्म बखाणा ॥ २३ ॥
जातो न पांतो न्यातो न मेला, नहीं धूप रूपंग संगी न अकेला।
आबो न जाबो केबो न कांई, कहे इम सुखम ब्रह्म गुसांई ॥ २४ ॥
छोटो न मोटो फोरो न भारी, नहीं कहण कीमत थाह बिचारी।
जन्मयो न जननी बंधु न मेला, कहे इम सुखम ब्रह्म अकेला ॥ २५ ॥
घी साव पुष्पंग जल मीन पंथो, उडे बिंहग भंवरा कहा गेल संतो।
सेझांस सुखम सो जीव जाणे, यूं ब्रह्म सुखम कोई संत पिछाणे ॥ २६ ॥
