Thursday, November 20, 2025
Santā gyān arth gam bhārī re संता ज्ञान अरथ गम भारी रे_हरजस पद राग मिश्रीत (२) 170725
संता ज्ञान अरथ गम भारी रे, संता ज्ञान अरथ गम भारी रे।। टेर ।।
सुरगुण निरगुण भक्त सेल है, नार पुरूष सब जांणे। केवल ज्ञान विज्ञान कहिजे, बिरला संत पिछाणे ।। १ ।।
सुरगुण मात पिता पण निरगुण, हंसा रो कुल होई। जब लग तात परोजन उनसे, निरभै मत नहीं कोई ।। २ ।।
माया ब्रह्म करे सब निरणा, रोम रोम कर ठांणे। केवल ज्ञान विज्ञान कहिजे, बिरला संत पिछाणे ।। ३ ।।
माया रही हद के मांही, बेहद ब्रह्म कहावे। पराभक्त सतगुरांजी को शरणो, या विध बिरला पावे ।। ४ ।।
सतगुरु महिमा संत पिछाणे, भिन्न भिन्न कर गुण गावे। कह सुखराम सुखा का सागर, भेद तो बिरला पावे ।। ५ ।।
Harjas Pad Rāg Mishrīt (2)
Santā gyān arth gam bhārī re, santā gyān arth gam bhārī re. ṭer ॥
Surgun nirgun bhakt sel hai, nār purūṣ sab jāṇe. Keval gyān vijñān kahije, birlā sant pichhāṇe. ॥ 1 ॥
Surgun māt pitā paṇ nirgun, hansā ro kul hoī. Jab lag tāt parojan unse, nirbhai mat nahī̃ koī. ॥ 2 ॥
Māyā Brahm kare sab nirṇā, rom rom kar thāṇe. Keval gyān vijñān kahije, birlā sant pichhāṇe. ॥ 3 ॥
Māyā rahī had ke mā̃ī, behad Brahm kahāve. Parābhakt satgurā̃jī ko śaraṇo, yā vidh birlā pāve. ॥ 4 ॥
Satguru mahimā sant pichhāṇe, bhinn bhinn kar guṇ gāve. Kah Sukharām sukhā kā sāgar, bhed to birlā pāve. ॥ 5 ॥
संतों से महाराज फरमाते हैं कि सतपद (केवल पद) के ज्ञान का अर्थ और अनुभव अत्यंत गूढ़ और गंभीर है। साकार और निराकार की भक्ति तो सरल है — उसे स्त्री-पुरुष सभी जानते हैं।केवल पद की भक्ति वास्तव में विज्ञान है, अर्थात इसकी प्राप्ति भक्ति करने की विशिष्ट विधि (भजन) को धारण करने से होती है। इस विधि को बिरले संत ही जान पाते हैं।माया और ब्रह्म को हंस (आत्मा) के माता-पिता के समान बताया गया है। जब तक आत्मा माया और ब्रह्म के ज्ञान में ही उलझी रहती है, तब तक उसे निर्भय पद की प्राप्ति नहीं होती।
ब्रह्म को सब ज्ञानी सर्वत्र व्यापक बताते हैं, मगर केवल का ज्ञान ही वास्तविक विज्ञान है — जिसे जानना और साधना करना अत्यंत दुर्लभ है।माया का पद "हद" में है — अर्थात तीन लोकों में सीमित। ब्रह्म का पद "बेहद" में आता है — जो उससे भी ऊँचा है, लेकिन केवल पद उससे भी परे है।बिरले ही संत परा भक्ति (सतस्वरूप आः पद की भक्ति) को समझते हैं, और वह सतगुरु के अणभै (अनुभवयुक्त) ज्ञान को धारण करने पर ही प्राप्त होती है।केवली संत ही सच्चे अर्थ में गुरु व गुरु पद के वास्तविक ज्ञान को जानते हैं। ऐसे परमात्मा और उस ज्ञान के भिन्न-भिन्न गुणों का गान करना ही सच्चा भजन है।महाराज फरमाते हैं कि जो आत्मा पूर्ण परमानंद को प्राप्त कर लेती है, वही वास्तव में सुखों के सागर में स्थित होती है। यह भेद (गूढ़ ज्ञान) बिरले ही आत्मा जानती है।
संतो से महाराज फरमाते हैं कि सत पद के ज्ञान का अरथ व अनुभव भारी है। साकार व निराकार की भक्ति सरल है। उसको सब स्त्री पुरूष जानते है। केवल की भक्ति विज्ञान याने भक्ति करने की विधि धारण करने से होती है। उसको बिरले संत ही जानते है। माया ब्रह्म हंस के माता पिता है। जब तक माया ब्रह्म के ज्ञान में है, तब तक निर्भय पद की प्राप्ति नहीं होती। माया ब्रह्म का सब ज्ञानी निर्णय करते है। ब्रह्म को सर्वत्र व्यापक बताते है, लेकिन केवल का ज्ञान ही विज्ञान है। उसको बिरले ही संत जानते है। माया का पद हद याने तीन लोक में है। बेहद में ब्रह्म का पद है। बिरलो को ही परा भक्ति याने सतस्वरूप आः पद की भक्ति सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण करने पर होती है। केवली संत ही गुरु गुरु पद के ज्ञान को जानते है। उस परमात्मा व ज्ञान का भिन्न भिन्न कर गुण गाना है। महाराज फरमाते हैं कि पूर्ण परमानन्द की प्राप्ति ही सुखो का सागर है। । यह भेद बिरले ही जानते है।
Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)
म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ। म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥ आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। म्हारे आंगणिये ओ साधां र...
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हेली ए आज पूनम वाली रात, चालोनी सतसंग में ।।टेर।। हेली ए सतगुरु मिलिया दयाल, भिगोय दिनी रंग में। हेली ए चालोनी गुरांसा री हाट, ज्ञ...
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नमो नमों गुरूदेव, परम निज भेव बताया। निर्गुण ज्ञान विचार, हंस परम हंस कुवाया ॥ नमों नमों गुरूदेव, समुद्र में डुबत तारया । नमों न...