Thursday, November 20, 2025
Ūṇ surat kī balihārī ho ऊण सूरत की बलिहारी हो_हरजस पद राग केहरा (१)
ऊण सूरत की बलिहारी हो, लगी नाम ऊर धार हो । टेर ॥
जिण मुख रसणा राम रटत है, धिन जन यो संसारा हो।
चरण बंध्या सूं पाप झड़त है, भागे भरम अंधारा हो ॥ १ ॥
शेष महेश विष्णु कहे धिन है, सो जन हिरदे धारा हो।
वां जन कू सब देवत बंदे, धिन धिन भाग हमारा हो ॥ २ ॥
धरम पुण्य जिग्य जोगज किया, वां जन के सब लारा हो।
केवल राम भजन ईधकारी, पांच गिगन चढ मारया हो ।॥ ३ ॥
कह सुखराम आप जन तिरया, और अनन्ता ही तारे हो।
ब्रह्मा वेद भागवत कहे, सत कर मानो विचारा हो ।॥ ४ ॥
Harjas Pad Raag Kehra (1)
Ūṇ surat kī balihārī ho, lagī nām ūr dhār ho. ṭer ॥
Jiṇ mukh rasṇā Rām raṭat hai, dhin jan yo sansārā ho.
Charan bandhya sūṁ pāp jhaṛat hai, bhāge bharam andhārā ho. ॥ 1 ॥
Śeṣ Mahesh Vishṇu kahe dhin hai, so jan hirdé dhārā ho.
Wān jan kū sab devat bande, dhin dhin bhāg hamārā ho. ॥ 2 ॥
Dharm puṇya jigy jogaj kiyā, wān jan ke sab lāra ho.
Keval Rām bhajan īdhkārī, pānch gigān chaḍh mārāyā ho. ॥ 3 ॥
Kah SukhRam āp jan tiryā, aur anantā hī tārē ho.
Brahmā Ved Bhāgavat kahe, sat kar māno vichārā ho. ॥ 4 ॥
महाराज फरमाते हैं:धन्य हैं वे महापुरुष, जिनका अखण्ड भजन हो रहा है — यही नाम-ऊर धारा है।जिनके मुखारबिंद से, रसना द्वारा, हर समय सांस-उसांस में "राम राम" होता है — वे ही जन इस संसार में धिन हैं।केवली भगवंतों के अणभै ज्ञान को धारण करने से पापों का क्षय होता है, और भरम रूपी अंधकार का अंत होता है।ऐसी सच्ची भक्ति करने वालों को शेषजी, ब्रह्मा, विष्णु, और महादेव भी "धन्य धन्य" कहते हैं।जो त्रिगुणी माया से बने मनुष्य शरीर को पाकर सिर्फ केवल भक्ति करते हैं — ऐसे हरि के जनों की देवता भी वंदना करते हैं।हमारा भाग्य धन्य है जो हमें ऐसे संतो के दर्शन प्राप्त हुए।ऐसे संतो का अणभै ज्ञान धारण करने से धर्म, पुण्य, यज्ञ, योग और सारी क्रियाएँ पीछे रह जाती हैं — क्योंकि यह परमार्थ ज्ञान है।ऐसे सतस्वरूप की भक्ति करने वाले संत ही पाँच तत्वों से अलग होकर, और पाँचों विषयों को जीतकर केवल पद और आनंद पद की प्राप्ति करते हैं — यही है पाँच गगन चढ़ मारना।महाराज आगे फरमाते हैं: "ऐसे ही महापुरुष, स्वयं का उद्धार करने के बाद अनन्त जीवों का भी अणभै ज्ञान से उद्धार करते हैं। वे जब पृथ्वी पर होते हैं, तब भी उद्धार करते हैं, और जब मोक्ष को पधार जाते हैं, तब भी उनका अणभै ज्ञान जीवों का उद्धार करता रहता है।ब्रह्मा, वेद, और भागवत भी यही कहते हैं कि इस बात को सच्ची समझो।"
उन महापुरूषों को धिन है जिनके अखण्ड भजन हो रहा है, यही नाम ऊर धारा है। जिनके मुखार बिन्द में रसना से हर समय सांस उसांस राम राम होता है वो ही जन संसार में धिन है। केवली भगवंतो के अणभै ज्ञान को धारण करने से पापों का क्षय होता है व भरम रूपी अंधकार मिटता है। ऐसी भक्ति करने वालो को, शेष जी ब्रह्मा विष्णु महादेव धिन कहते है। जो त्रिगुणी माया का दिया मनुष्य शरीर पाकर केवल भक्ति करते है असे हरि के जनो की देवता भी वंदना करते है। हमारा भाग्य धिन है जो ऐसे संतो के दर्शन हुये है, ऐसे संतो का अणभै ज्ञान धारण करने से धरम पुण्य जिग जोग क्रिया सब ज्ञान पीछे रह जाते है। ऐसे सतस्वरूप की भक्ति करने वाले संत ही पांच तत्वो से अलग होकर व पांचो विषयो को मारकर केवल पद आनंद पद की प्राप्ति करते है। यही पांच गिगन चढ मारना है। महाराज फरमाते हैं कि ऐसे ही महापुरूष स्वयं का उद्धार करके अनन्त जीवो का आप पृथ्वी पर है तब भी तथा मोक्ष पधारे बाद भी अणभै ग्यान से उद्धार करते है, ब्रह्मा व वेद भागवत सब कहते है कि इस बात को सच्ची समझो।
Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)
म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ। म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥ आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। म्हारे आंगणिये ओ साधां र...
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हेली ए आज पूनम वाली रात, चालोनी सतसंग में ।।टेर।। हेली ए सतगुरु मिलिया दयाल, भिगोय दिनी रंग में। हेली ए चालोनी गुरांसा री हाट, ज्ञ...
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नमो नमों गुरूदेव, परम निज भेव बताया। निर्गुण ज्ञान विचार, हंस परम हंस कुवाया ॥ नमों नमों गुरूदेव, समुद्र में डुबत तारया । नमों न...