कुण है रे बाबा कुण है रे बाबा, कुण है कुण है कुण है ओ। तीन लोक में राच रयो है, ओसी यांकी धुन है ओ ।। टेर ।।
कोई कहे ओ जीव विचारो, कोई कहे ओ सांई हो। कोई कहे ओ ब्रह्म आप है, पूर रहयो जग मांही हो ।। १ ।।
सांई है तो क्यों दुख पावे, ब्रह्म गरभ क्यों आयो है। जीव हुवे तो फिर क्यों ऊपजे, ताकूं जंवरो खायो है ।। २ ।।
नहीं ओ ब्रह्म जीव नहीं सायब, कहता कछु न आवे है। पांचु बास सदा ऊर यांके, भंवता यूं जुग जावे है।। ३ ।।
ज्ञानी ध्यानी साध सिधा ने, ब्रह्मा बोहो विध गायो है। अर्जुन व्यास किशन कण बिणया, तो भी अरथा में नहीं आयो है ।। ४ ।।
अदभूत खेल अचंभो भारी, आद अंत यो होई हो। समे भाव माया देह धारे, सुख दुख लारे दोई हो।।५।।
Harjas Pad Raag Nisaani (1)
Kun hai re Baba, kun hai re Baba, kun hai kun hai kun hai o.
Teen lok mein raach rayo hai, osi yaanki dhun hai o. (Ter)
Koi kahe o jeev vichaaro, koi kahe o Saai ho.
Koi kahe o Brahm aap hai, poor rahyo jag maahi ho. ॥1॥
Saai hai to kyon dukh paave, Brahm garbh kyon aayo hai.
Jeev huve to phir kyon oopje, taakun janvaro khaayo hai. ॥2॥
Nahi o Brahm jeev nahi saayab, kahta kachu na aave hai.
Paanchu baas sada uur yaanke, bhawta yoon jug jaave hai. ॥3॥
Gyaani dhyaani saadh siddha ne, Brahma boho vidh gaayo hai.
Arjun Vyaas Kishan kan binaya, to bhi artha mein nahi aayo hai. ॥4॥
Adbhoot khel achambho bhaari, aad ant yo hoi ho.
Same bhaav maaya deh dhaare, sukh dukh laare doi ho. ॥5॥
➡ हे बाबा! ये कौन है? कौन है जो तीनों लोकों में रमा हुआ है? हर जगह जिसकी ही धुन गूंज रही है — वह कौन है? ➡ कोई कहता है — यह जीव है। कोई कहता है — यह साईं (ईश्वर) है। कोई कहता है — यह ब्रह्म ही है, जो पूरे जगत में व्याप्त है। ➡ अगर यह साईं है, तो फिर दुख क्यों भोगता है? अगर ब्रह्म है, तो गर्भ में क्यों आया? अगर यह जीव है, तो फिर जन्म क्यों लिया — और क्यों काल (मृत्यु) इसे खा गया? ➡ वह न ब्रह्म है, न जीव है, न सायब — उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। पांचों विषय (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द) उसमें बसते हैं — इसीलिए वह जन्म-जन्मांतर में भटकता रहता है। ➡ बड़े-बड़े ज्ञानी, ध्यानयोगी, साधक, सिद्ध और स्वयं ब्रह्मा जी ने अनेक प्रकार से इसके स्वरूप को समझाया, यहाँ तक कि अर्जुन, व्यास और श्रीकृष्ण ने भी इसकी व्याख्या की — परंतु कोई भी इसका पूरा अर्थ नहीं बता पाया। ➡ यह आत्मा एक अद्भुत खेल और भारी अचंभा है। आदि और अंत — दोनों में यही है। समय आने पर यह माया की देह (शरीर) धारण करती है, और फिर सुख-दुख दोनों का भागी बनती है। ➡ जब यह आत्मा निडर (निरभय) हो जाती है, तब ही इसमें महान आनंद, ज्ञान और आनंद पद की उत्पत्ति होती है। संत सुखराम कहते हैं — अगर यह केवल पद (निर्वाण) को नहीं पकड़ती, और केवल करता पद (कर्तापन की स्थिति) में ही अटक जाती है, तो फिर आगे चलकर दुख का भागी वही बनती है।आत्मा का स्वरूप अत्यंत रहस्यमय है — वह जीव, ब्रह्म, साहिब किसी भी एक में सीमित नहीं।जब तक वह विषयों के संग में है, भ्रमण (भटकाव) से मुक्त नहीं।सच्चा मोक्ष तब ही संभव है जब आत्मा निरभय होकर, केवल पद – आनंद पद को प्राप्त कर ले।करता पद (कर्तापन का भाव, अहंकारयुक्त अनुभव) मोक्ष नहीं देता — सिर्फ केवल पद ही जन्म-मरण मिटाता है।
महाराज आत्मा के वास्ते फरमाते हैं कि यह कौन है जो तीनों लोको में सब प्राणियो में रम रहा है। यही इसकी धुन है। कोई इसे ब्रह्म कहते है। कोई जीव कहते है। कोई साहिब कहते है, कोई कहते है इन सब पदो से न्यारा भी है और सब पद इसमें भासते भी है। आद अंत में यह ही है। ईश्वर है तो दुख क्यों पाता है। ब्रह्म है तो गर्भ में क्यों आया है, जीव है तो फिर क्यों पैदा हुवा है। जिसको काल ने खाया है। न तो यह जीव, न ब्रह्म है, न सायब, न कुछ कहने में आता है। पांच तत्वो के साथ है व पांचो विषयो का संग है, जब तक जन्मना मरना पडेगा। ज्ञानियो ने, ध्यानियो ने, साधना करने वालो ने व सिद्धो ने, ब्रह्माजी ने, भगवान श्रीकृष्ण ने, अर्जुन ने, व्यासजी ने, इसको कि आत्मा का यह स्वरूप है बताने की बहुत चेष्टा की, परन्तु अरथो में नहीं बता सके। अदभूत खेल अचंबा भारी है, यह आद में है अन्त में है। समय पाकर माया का शरीर धारण करने पर सुख दुख इसके साथ हो जाते है। महाराज फरमाते हैं कि केवल पद आनंद पद की प्राप्ति होने पर जन्मना मरना मिटता है। जब निरभय हो जाता है, करता पद की प्राप्ति हो जाने पर भी आवागमन नहीं मिटता।