जुग शोभा चाहूं नहीं, सुख संपत कोई। करामात करतूत की, इच्छया नहीं मोई ।। टेर ।।
है कोई ऐसा शूरवां, मन कूं समझावे। हद बेहद कूं छाड के, मोरी दिश आवे ।। १ ।।
जंतर मंतर टोटका, और कला सारी। हमा नगर के मांय, इच्छ्या माने नहीं मारी ।। २ ।।
देव कला दाणू कला, भगवत कल न्यारी। दुरबल कूं माने नहीं, ऐसी कुदरत न्यारी ।। ३ ।।
माता पिता दोनुं तजे, गुरु की मां मुंढे। धिन हंसा सुखराम कह, सतगुरु मत ही ढूंढे ।। ४ ।।
Harjas Pad Raag Bilawal (18)
Jug shobha chahoon nahi, sukh sampat koi. Karaamat kartoot ki, ichchhya nahi moi. (Ter)
Hai koi aisa shoorwan, man ko samjhaave.
Had behad ko chhaad ke, mori disha aave. ॥1॥
Jantar mantar totka, aur kala saari.
Hama nagar ke maay, ichchhya maane nahi maari. ॥2॥
Dev kala daanu kala, Bhagwat kal nyaari.
Durbal ko maane nahi, aisi kudrat nyaari. ॥3॥
Mata pita donu taje, guru ki maan mundhe.
Dhin hansa Sukhram kah, Satguru mat hi dhoonde. ॥4॥
"महाराज फ़रमाते हैं कि जगत की शोभा और सुख-संपत्ति की चाहना नहीं है। करामात और करतूत मुझे अच्छे नहीं लगते हैं। मन को वश में करने वाला ऐसा कोई शूरवीर है जो हद-बेहद को छोड़कर केवल पद, आनंद पद का ज्ञान धारण करे, यही मेरी दिशा में आना है। जंतर-मंतर, टोटका, जितनी भी कलाएँ हैं, वे मुझे अच्छी नहीं लगती हैं। देवता, राक्षस, भगवत, यानी ब्रह्म की कलाएँ सब अलग-अलग हैं। इनसे परम पद की प्राप्ति नहीं हो सकती। कितना भी मन से गरीब और निर्मल बन जाओ, यह सत्य की कला आने वाली नहीं है। यह कला इन सबसे अलग है। माता माया, पिता ब्रह्म, दोनों का देश छोड़कर सतगुरु पद का ज्ञान और भक्ति धारण करे, उन हंसों को धन्य है I