तारेगा तेतीक सतगुरु तारेगा, इण भवसागर के मांय पार उतारेगा ।। टेर ।।
मोय भरोसो बिडद को हो, सुण लिज्यो सब लोय । सतगुरु शरणे नर आय कर हो, डूबो सुण्यो हन कोय ॥ १ ॥
असंख जुगा में अनंत साधू, दे गया अणभै हांक। सतगुरु के संग अवस तिरसी, भरत गीता साख ॥ २ ॥
इस्तु आगे फूस केता, जल आगे क्या आग। यूं नांव आगे कर्म हमारा, जाय इसी विध भाग ॥ ३ ॥
ओ मन मेरो केरियो हो, नाव नौका होय। सतगुरु सुंज बणाय सारी, पार किया है मोय ॥ ४ ॥
सूर पिछम दिश उगवे हो, गंग उलट फिर जाय। तो ही सतगुरु तारसी हो, मोय भरोसो मन मांय ॥ ५ ॥
जन सुखदेव केह सांभलो हो, सतगुरु शरणे आय। पैदा करन्ता रूठिया हो, तोई नरक नहीं जाय ॥ ६ ॥
Harjas Pad Raag Gund (2)
Tarega tetik Satguru tarega, in bhavsagar ke maay paar utaarega. (Ter)
Moy bharoso bidd ko ho, sun lijyo sab loy.
Satguru sharane nar aay kar ho, doobo sunyo han koy. ॥1॥
Asankh juga mein anant sadhu, de gaya anbhai haank.
Satguru ke sang avas tirsi, Bharat Geeta saakh. ॥2॥
Istu aage phoos keta, jal aage kya aag.
Yoon naav aage karam hamara, jaay isi vidh bhaag. ॥3॥
O man mero keriyo ho, naav nauka hoy.
Satguru sunj banay saari, paar kiya hai moy. ॥4॥
Sur pichham dish ugve ho, Gang ulat phir jaay.
To hi Satguru taarsi ho, moy bharoso man maay. ॥5॥
Jan Sukhram keh saambhlo ho, Satguru sharane aay.
Paida karanta roothiya ho, toi narak nahi jaay. ॥6॥
सतगुरु देव, अर्थात् सतज्ञान के माध्यम से निश्चय ही जीव तार जाता है। जन्म-मरण से रहित होना ही भवसागर से पार उतरना है।
मुझे सतगुरु के प्रतिज्ञा (बिडद) पर पूरा भरोसा है।सब संसारी सुनो, जिसने भी सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण किया है, वह जन्म-मरण में कभी नहीं आता। यही सच्चा पार उतरना है — डूबो सुनियो, हन कोई है।अनंत युगों में, अनंत साधुओं ने केवल पद आनंद पद की प्राप्ति की है, वे सभी अपना अनुभवजन्य अणभै ज्ञान बता रहे हैं कि सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण करने से ही जीव का उद्धार होता है।
गीता भी इसकी साक्षी देती है। जैसे अग्नि के सामने घास नहीं टिकती, पानी के सामने आग नहीं टिकती, वैसे ही निज नाम की भक्ति से सब कर्म क्षय हो जाते हैं। यही कर्मों का भागना है।परमात्मा का नाम ही नौका है, और मन उस नौका को चलाने वाला है। सतगुरु ने केवल ज्ञान का निरपक्ष निरणा देकर जन्म-मरण से रहित कर दिया है — यही पार होना है।यदि कभी सूर्य पश्चिम दिशा में उगने लगे, गंगा उलटी बहने लगे, तो भी मुझे पूरा विश्वास है कि सतगुरु का केवल ज्ञान धारण करने से अवश्य ही उद्धार होगा।महाराज फरमाते हैं कि सभी सुनो,
सतगुरु की शरण में आने और उनका अणभै ज्ञान धारण करने पर, यदि स्वयं सृष्टिकर्ता परमात्मा भी नाराज़ हो जाए, तब भी ऐसा भक्त नरकों में नहीं जा सकता।यहाँ तीन प्रकार की भक्ति को समझाया गया है:सगुण माता – ग्रहस्थ की भक्ति,निर्गुण पिता – राजा की भक्ति,
और केवल पति – बैराग की भक्ति।जब सच्चा वैराग्य होता है, तो न मन राजा चाहता है, और न माता-पिता की सेवा की इच्छा रह जाती है।
तब आत्मा सीधा परमपद की ओर बढ़ती है।
सतगुरु देव याने सतज्ञान से निश्चय ही तीरेंगे, जन्म मरण से रहित होना ही भवसागर से पार उतारना है। मुझे सतगुरु के बिडद का भरोसा है। सब संसारी सुणो जिस मनुष्य ने सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण किया है वो जन्म मरण में नहीं आया है। यही डूबो सुणयो हन कोय है। अनन्त जुगों में अनन्त साधुओ ने केवल पद आनंद पद की प्राप्ति की है वो अपना अणभै ग्यान कह रहे है कि सतगुरु का अणभै ज्ञान धारण करने से ही जीव का उद्धार होगा, गीता भी इसकी साक्षी दे रही है। अग्नि के सामने घास नहीं ठहरती, पानी के सामने आग नहीं ठहरती, ऐसे ही निज नाम की भक्ति करने से सब करम क्षय हो जाते है। यही कर्मों का भागना है। परमात्मा का नांव नौका है और मन नांव को चलाने वाला है, सतगुरु ने सब तरह से केवल ज्ञान का निरपक्ष निरणा देकर जनम मरण से रहित कर दिया यही पार करना है। सूर्य पिछम दिशा में उगने लगे, गंगा उलटी बहने लग जाये, तो भी मुझे पूरा विश्वास है कि सतगुरु का केवल ज्ञान धारण करने पर अवश्य ही उद्धार होगा। महाराज फरमाते हैं कि सब सुणो सतगुरु की शरण में आने पर और उनका अणभै ज्ञान धारण करने पर पैदा करन्ता परमात्मा भी यदि नाराज हो जाता है तो नरको में नहीं जा सकते। याने सुर्गुण माता ग्रहस्थ की भक्ति निर्गुण पिता राजा की भक्ति, केवल पति बैराग की भक्ति है। जब बैराग हो जाता है तब मैं राजा हासिल नहीं लेते है व माता पिता भी सेवा की इच्छा नहीं करते है।