Thursday, November 20, 2025

Diya main hela suno shakal nar naar दिया मैं हेला सुणो शकल नर नार_हरजस पद राग मिश्रीत (१२) दिया मैं हेला सुणो शकल नर नार, दिया मैं हेला ।। टेर ।। सूरातन जब प्रगटे रे, सिंधु दिरावे कोय। यूं जन गढ चढ बोलिया रे, नांव ऊदे घट होय ।। १ ।। पीव आज अब बिछडे रे, जां सत आवे जांण। जुग आडा दिन बोहो पडया रे, जा मुख शरम न कांण ।। २ ।। जिनका सतगुरु शूरवां रे, ऊलट चढया अशमान। वां शिष के तन जागसी, बंदा नांव कला घट आंण ।। ३ ।। संत गिगन चढ बोलिया रे, वे तो गया है सिधाय। पीव मुवा दिन बोहो हुवा, बंदा सत आवे किम मांय ।। ४ ।। कह सुखदेव यो भेद है रे, जे समझे नर कोय। नांव तबे घट प्रगटे रे, वे जन सेदेह होय ।।५।। Harjas Pad Raag Mishrit (12) Diya main hela suno shakal nar naar, Diya main hela. ॥ Ter ॥ Sooratan jab pragate re, sindhu diraave koy. Yun jan gadh chadh boliya re, naam ude ghat hoy. ॥ 1 ॥ Peev aaj ab bichhde re, jaan sat aave jaan. Jug aada din boho padya re, jaa mukh sharam na kaan. ॥ 2 ॥ Jinka satguru shoorwaan re, oolat chadhya ashmaan. Waan shish ke tan jaagasi, banda naam kala ghat aan. ॥ 3 ॥ Sant gigan chadh boliya re, ve to gaya hai sidhaay. Peev muva din boho huva, banda sat aave kim maay. ॥ 4 ॥ Kah Sukhdev yo bhed hai re, je samjhe nar koy. Naam tabe ghat pragate re, ve jan sedeh hoy. ॥ 5 ॥ महाराज फरमाते हैं:स्त्री-पुरुषों को उपदेश देना ही "हेला देना" है, यानी भक्ति पथ पर जाग्रत करना, हिला देना — यही सतगुरु का कार्य है।जब मनुष्य में सुरापा (आत्मिक शक्ति) प्रकट होती है, तब "सिंधु राग" गाई जाती है — यह उस आत्मिक तरंग की बात है जो सच्चे भजन से जागती है।सताधारी सतगुरु के देह में मौजूद रहने पर, नाम की घट (अंतर घट) में जागृति होती है। यही है "गढ़ चढ़कर बोलना" — यानी नाम का अनुभव होकर आत्मा में बोल उठना।पति का बिछोह, यानी शरीरांत (मरण) का समाचार मिलते ही सती का सत प्रकट हो जाता है — लेकिन जिसका पति बहुत पहले शरीर छोड़ चुका हो, उसमें सत का प्रकट होना कठिन होता है।जिन संतों के पास “अणभै वाणी” होती है, और जो सतगुरु शूरवीर (साहसी) हैं, जिन्होंने उलटकर परमपद की प्राप्ति की है, उनके अणभै ज्ञान को जब कोई धारण करता है, तभी घट में सतशब्द की जागृति होती है।जिन संतों ने जीते जी परमपद की प्राप्ति की है, वे तो धाम (अमर लोक) को सिधार गए हैं। ठीक वैसे ही जैसे पति के शरीर छोड़ने के बाद बहुत समय बीत जाए तो सती का सत प्रकट नहीं होता।महाराज गूढ़ भेद बताते हैं: जब तक संत सशरीर उपस्थित हो, तभी निज नाम की जागृति होती है। यह देहधारी सतगुरु का प्रभाव है।ऐसे केवली भगवंत (बिना देह के सिद्ध पुरुष) नहीं, बल्कि जिनके पास “अणभै ज्ञान” की विधि होती है, उनकी बताई हुई पद्धति से साधना करने पर ही सता आती है। यानी उनका ज्ञान देह सहित है, तभी वह आत्मा तक प्रभावी रूप में पहुँचता है। महाराज का स्त्री पुरूषो को उपदेश देना ही हेला देना है। मनुष्य में जब सुरापा प्रगट होता है जब सिंधु राग गाई जाती है। सताधारी सतगुरु के मौजूद रहने पर नांव की घट में जागृति होती है। यही गढचढ कर बोलना है। पति का बिछोह याने शरीरान्त होने के समाचार मिलते ही सती के सत प्रगट हो जाता है, जिसको शरीर छोडे हुये बहुत दिन हो जाते है तो सत प्रकट नहीं होता। जिनके अणभै वाणी बनाने वाले सतगुरु शूरवीर है और जिन्होंने उलटकर परमपद की प्राप्ति की है, उनके अणभै ग्यान धारण करने पर घट में सतशब्द की जागृति होती है। जिन संतो ने जीते जी परमपद की प्राप्ति की है वे तो धाम सिधार गये, इसी तरह पति का शरीरान्त हुये ज्यादा समय हो गया है तो सत कैसे प्रकट हो सकता है। महाराज फरमाते हैं कि यही भेद है जो मुनष्य इसे समझे, निज नाम की जागृति जब होती है जब वो संत सेदेह मौजूद हो। याने ऐसे केवली भगवंत नहीं और उनके अणभै ग्यान में बिधी लिखी है, उस तरीके पर करने से सता आती है तो देहे उनका ग्यान है।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...