Thursday, November 20, 2025
Mharo ne sandesho Sahib saambhlo म्हारो ने संदेशो साहिब सांभलो_हरजस पद राग मिश्रीत (११)
म्हारो ने संदेशो साहिब सांभलो, बिनाजी सुणियां रो नहीं है सूल। बिरहन विचारी तन कूं छाडसी, रही उरध मुख झूल ।। टेर ।।
बरस अठारा हर बिना काढिया, म्हारे आस रही घर मांय। अब तो जोगण हर होय जावसूं, बसतर देऊं जी बगाय ।। १ ।।
काहे तो ढोल्यो हर नहीं घालता, भेद न देता जी मोय। बिना तो दीठी साहिब चीज रो, म्हाने दुख दालद नहीं होय ।। २
शब्दां कलेजो रामजी बींधियो, म्हारे करोत बहे ऊर मांय। ।। नख चख साले रामजी निश दिनां, मोसूं हर बिना रहयो नहीं जाय ।। ३ ।।
अब तो जग में बोहर नहीं आवडे, आप मिलोनी आय। इण तो अपराधी दुष्टि जीव रो, जलम अकारथ जाय ।। ४ ।।
एकण महल दूजे चढी, तीजे खडी हूंजी आंण । बजर दरवाजा हर नहीं ऊघडे, रहया करारा जी तांण ।। ५ ।।
चेन तमाशा हर दिखलाय के, मत डेहकावो जी मोय। किरपा करोनी जन पर दयालजी, मोय दरसण दो पट खोय ।। ६ ।।
जन सुखदेवजी हरजी सूं बिणती, सुणज्यो जी सूरत लगाय। अमरलोक जी साहिब आपरो, म्हाने घणो जी देखण रो चाव ।।७।।
Harjas Pad Raag Mishrit (11)
Mharo ne sandesho Sahib saambhlo, binaji suniyaan ro nahin hai sool.
Birhan vichaari tan ku chhadsii, rahi uradh mukh jhool. ॥ Ter ॥
Baras athaara har bina kaadhiya, mhare aas rahi ghar maay.
Ab to jogan har hoy jaavasun, bastar deun ji bagaay. ॥ 1 ॥
Kaahe to dholyo har nahin ghaalta, bhed na deta ji moy.
Bina to deethi Sahib cheez ro, mhane dukh daald nahin hoy. ॥ 2 ॥
Shabdaan kalejo Ramji beedhiyo, mhare karot bahe oor maay.
Nakh chakh saale Ramji nish dinan, mosun har bina rahyo nahin jaay. ॥ 3 ॥
Ab to jag mein bohar nahin avde, aap miloni aay.
In to apraadhi dushti jeev ro, jalam akaarath jaay. ॥ 4 ॥
Ekan mahal duje chadhi, teeje khadi hunji aan.
Bajar darwaza har nahin ooghde, rahya karaara ji taan. ॥ 5 ॥
Chen tamaasha har dikhlaya ke, mat dehkavo ji moy.
Kirpa karoni jan par dayaalji, moy darasan do pat khoy. ॥ 6 ॥
Jan Sukhdevji Harji soon binti, sunjyo ji surat lagaay.
Amarlok ji Sahib aapro, mhane ghano ji dekhna ro chaav. ॥ 7 ॥
आत्मा परमात्मा से विनती करती है:हे परमात्मा! मेरा संदेश सुनो, बिना सुने मेरा दुख कैसे मिटेगा? बिरहिनी (विरह में तड़पती आत्मा) जब शरीर छोड़ेगी, तो वह ऊंधे मुंह झूलेगी — यानी व्याकुल और व्यथित होकर जाएगी।परमात्मा की प्राप्ति बिना, मैंने अठारह वर्ष व्यर्थ निकाल दिए। शरीर में ही आशा लगाए रही — अर्थात माया ब्रह्म के पसारे में आस करना ही मेरी गृहिणी जैसी ममता बन गई थी।अब मैं कर्मों से अलग होकर बैरागी बनना चाहती हूं। वस्त्र यानी स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण शरीर, तथा पारब्रह्म के पद से भी पार जाकर, केवल पद में, आनंद पद में मिलना चाहती हूं।हे परमात्मा! यदि आपने मुझे यह ढोल्या (मनुष्य शरीर) न दिया होता, और शब्द का भेद न बताया होता, तो बिना देखी हुई वस्तु के लिए मुझे इतना दुख और पश्चाताप न होता।अब तो शब्द से मेरा कलेजा बिंध गया है। मेरे हृदय से करोट तक दर्द बह रहा है। नख से शिख तक, रात-दिन पीड़ा हो रही है। अब परमात्मा के बिना मुझसे रहा नहीं जाता।शरीर के हर अंग में शब्द का अनुभव न होना ही "दर्द" है, और सतशब्द के अनुभव के बिना एक क्षण भी रहना कठिन है — जैसे हरि बिना जीव अब रह नहीं सकता।हे परमात्मा! अब माया ब्रह्म का पसारा मुझे नहीं सुहाता है। इसलिए आप स्वयं आकर मुझसे मिलिए।इस अपराधी, दुष्ट जीव का जन्म, आपके दर्शन और मिलन के बिना व्यर्थ जा रहा है।एक बार मैं खण्ड (स्थूल) में थी, फिर पिण्ड (सूक्ष्म) में चढ़ी, और अब ब्रह्माण्ड तक पहुंचकर खड़ी हूं — लेकिन उस पार जाने वाला दरवाजा बहुत मजबूत है, जो मुझसे खुलता नहीं है।हे परमात्मा! माया के बजरपोल के तमाशे और उसके चैन-सुख दिखाकर मुझे मत बहकाइए।हे दयालु प्रभु! मुझ पर कृपा कीजिए, और "पट खोलकर" मुझे दर्शन दीजिए।महाराज अंत में फरमाते हैं: हे परमात्मा! मेरी प्रार्थना को ध्यान से सुनो। आत्मा कह रही है कि आपके अमर लोक को देखने की तीव्र इच्छा हो रही है।"केवल पद" और "आनन्द पद" ही अमर लोक है — मुझे वहीं पहुंचा दीजिए। आत्मा परमात्मा से प्रार्थना कर रही है कि मेरा सन्देशा सुणो। बिना सुणे मेरा दुख कैसे मिटेगा। बिरहन शरीर को छोडेगी, वह ऊंधे मुंह झूलेगी। परमात्मा की प्राप्ति के बिना अठारह बरस निकाल दिये, शरीर में ही मेरी आशा लगी रही याने माया ब्रह्म के पसारे में आशा करना ही आस रही घर मांय है। हे परमात्मा अब तो करमो से अलग होकर बैरागी हो जाऊंगी। वस्तर याने शरीर (स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण) से व पारब्रह्म पद से अलग होना ही केवल पद आनन्द पद में मिलना है। हे परमात्मा यदि आप मुझे ढोल्या याने मनुष्य शरीर नहीं देते व शब्द का भेद नहीं देते तो इस प्रकार बिना देखी हुई वस्तु का हे परमात्मा मुझे दुख व पश्चाताप नहीं होता। अब शब्द से मेरा कलेजा बिंद गया है व मेरे हृद्य में करोत बहे जैसे दर्द होने लगा है। मेरे नख से चख तक रात दिन दरद हो रहा है। मेरे से परमात्मा के बिना अब नहीं रहा जाता है। शरीर में सब जगह शब्द का अनुभव नहीं होना ही दरद होना है तथा सतशब्द के अनुभव बिना एक क्षण भी रहना हर बिना रहयो नहीं जाय है। हे परमात्मा अब संसार में याने माया ब्रह्म के पसारे में मुझे नहीं सुहाता है। इसलिये आप आकर मिलो। इस अपराधी व दुष्टी जीव का जन्म परमात्मा के मिले बिना बेकार जा रहा है। एक तो खण्ड में दूसरी पिण्ड में चढी व तीसरे ब्रह्मण्ड पर आकर खडी हुई किन्तु का दरवाजा बहुत मजबूत लगा हुआ है। जो मुझ से नहीं खुलता है। परमात्मा कई माया बजरपोल के चैन तमाशे बताकर मुझे मत बहकाओ। हे दयालु आप मेरे पर कृपा करो व मुझे पट खोलकर दर्शण दो। महाराज फरमाते हैं कि हे परमात्मा मेरी प्रार्थना को ध्यान से सुणो। आत्मा कह रही है कि मुझे आपके अमर लोक को देखने की बहुत इच्छा हो रही है। केवल पद आनन्द पद ही अमर लोक है।
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