Thursday, November 20, 2025

Raja aisa bhekh hamaara राजा ऐसा भेख हमारा_हरजस पद राग मिश्रीत (१०) राजा ऐसा भेख हमारा। भेदी जके भली विध जांणे, करमी लखे न सारा। राम रटे परमेश्वर प्यारा, रह करमां सूं न्यारा।। टेर ।। कफनी हमे क्षमा की पहरी, ज्ञान गूदडी ओढी। चोलो अजब दया को गल में, कुबध कामणी छोडी ।। १ ।। रमता संग रमूं जग मांही, इण मन कूं शिष कीना। सतशब्द सो गुरु हमारा, तत्त तिलक शिर दीना ।। २।। पोथी पाठ वेद सब गीता, अणभै का पट खोलूं। द्वादश मंत्र गायत्री मेरे, सतशब्द मुख बोलूं ।। ३ ।। मुद्रा कंठी पावडी अलफी, भेद ज्ञान की पहरी। सांस उसांस अजप्पो घट में, निरगुण माला फेरी ।। ४ ।। धीरज धरण लंगोटी जरणा, आडबंद मत मेरी। या देह बीण तांत सब नाडी, रागा अनहद घेरी ।। ५ ।। गिगन मंडल में मंडी हमारी, त्रिगुटी सेवा पूजा। सतशब्द जोत के आगे, और देव नहीं दूजा ।। ६ ।। अला पिंगला करे आरती, अनहद झालर बाजे । चित, मन, सूरत, हजूरी, चाकर, गिगन शब्द धुन गाजे ।। ७ ।। देहरो भेष शकल सो माया, असत सत नहीं कोई। जे कोई भेद शब्द को साजे, मोख मिलेगा सोई ।। ८ ।। कह सुखराम भेष यो मेरो, जे कोई संत बसावे । तीनूं ताप तोड कर हंसो, अमर लोक में जावे ।।९।। Harjas Pad Raag Mishrit (10) Raja aisa bhekh hamaara. Bhedi jake bhali vidh jaanne, karmi lakhe na saara. Raam rate Parameshwar pyaara, reh karma soon nyaara. ॥ Ter ॥ Kafani hame kshama ki pahri, gyaan goodadi odhi. Cholo ajab daya ko gal mein, kubadh kaamani chhodi. ॥ 1 ॥ Ramta sang ramu jag maahi, in man ku shish keena. Satshabd so guru hamaara, tatt tilak shir deena. ॥ 2 ॥ Pothi paath ved sab Geeta, anbhai ka pat kholun. Dwaadash mantra Gayatri mere, satshabd mukh bolun. ॥ 3 ॥ Mudra kanthi paavdi alafi, bhed gyaan ki pahri. Saans usaans ajappo ghat mein, niragun maala feri. ॥ 4 ॥ Dheeraj dharan langoti jarna, aadband mat meri. Ya deh been taant sab naadi, raaga anahad gheri. ॥ 5 ॥ Gigan mandal mein mandi hamaari, triguti seva pooja. Satshabd jyot ke aage, aur dev nahin dooja. ॥ 6 ॥ Ala pingla kare aarti, anahad jhalar baaje. Chit, man, surat, hajoori, chaakar, gigan shabd dhun gaje. ॥ 7 ॥ Deharo bhesh shakal so maaya, asat sat nahin koi. Je koi bhed shabd ko saaje, mokh milega soi. ॥ 8 ॥ Kah Sukhram bhesh yo mero, je koi sant basaave. Teenun taap tod kar hanso, amar lok mein jaave. ॥ 9 ॥ महाराज राजा चन्दूलाल से कहते हैं:हे राजा! हमारा भेष ऐसा है — जिसे परमात्मा की प्राप्ति और भजन का भेद जानने वाले ही भली प्रकार पहचान सकते हैं। शुभ-अशुभ कर्म करने वाले (करमी) मुझे नहीं पहचान सकते।जो सतगुरु विधि से "राम" का रटन करता है, वही परमेश्वर का प्यारा होता है।मैंने ज्ञानरूपी गुदड़ी ओढ़ रखी है, और गले में दया का चोला पहन रखा है। कुबुद्धि रूपी कामनाओं को मैंने त्याग दिया है।श्वास-उसास चल रही है, उसमें तन-मन से भजन करना, और एक भी श्वास व्यर्थ न जाने देना — यही है "रमता संग रमु जुग मांही"।इस मन को शिष्य बना रखा है, यानी मन आत्मा की आज्ञा में रहता है। परमात्मा सत है, वह निरंजन, निराकार ब्रह्म, सच्चिदानंद स्वरूप है — वही गुरु है।"तत्त तिलक" — यानी सतशब्द (नेः अक्षर) — पारब्रह्म परमात्मा का निज नाम है। उसका अखंड अनुभव होना ही “तत्त तिलक शिर दीना” है।केवल पद का अनुभव करके, अनभै ज्ञान की सिरजनहार से अनुमति लेकर जो लौटकर आता है, वही वेद, गीता, शास्त्र का वास्तविक अर्थ समझता है। यह है "अनभै का पट खोलना"।मुंह से सतशब्द का ज्ञान देना ही — द्वादश मंत्र (जैसे "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय") और गायत्री मंत्र का सच्चा अर्थ है।मतज्ञान, श्रुतज्ञान, मनपरचे ज्ञान, अवधज्ञान, केवलज्ञान — इन पाँचों के भेद को जानना ही मुद्रा, कंठी, पावड़ी, अलफी पहनना है।श्वांस-उसांस में “रकार-मकार” का भजन करना, और अजपा जप का जागृत होकर अखण्ड अनुभव होना ही निर्गुण माला फेरना कहलाता है।पृथ्वी के समान धैर्य, सहनशीलता की लंगोटी, और सतशब्द के ज्ञान के सिवाय मेरी बुद्धि कहीं नहीं जाती, यही है "आड़बंद मत मेरी"।मेरा शरीर एक बीणा (वीणा) है, नाड़ियाँ उसकी तारें हैं, और बिना किसी बाहरी वादन के, उसमें अनहद की अनेक रागें स्वयं बज रही हैं।ब्रह्मांड और पारब्रह्म से ऊपर, केवल पद में सतशब्द का अनुभव ही, गगन मंडल में हमारी मंडी (स्थिति) है।त्रिकुटी में जब शब्द आता है, अनेक प्रकार की ध्वनियाँ होती हैं — यही "त्रिकुटी सेवा-पूजा" है।सतशब्द का अनुभव निरंजन, निराकार, चेतन में हो रहा है, यही "सत होना का शब्द" है जो ज्योति के आगे है। इसके सिवाय मेरा कोई देवता नहीं है।त्रिकुटी में शब्द का अनुभव होना, अला-पिंगला की आरती करना है। जो ध्वनियाँ बिना प्रयास के सुनाई देती हैं, वही अनहद झालर की ध्वनि है।चित, मन, सूरत को लगाकर, सूरत के द्वारा शब्द का अनुभव करना ही — “चित, मन, सूरत हजूरी चाकर” होना है।गगन में सतशब्द की धुनि का अनुभव होना ही — "गगन शब्द धुन गाजे है", ऐसा कहा गया है।आत्मा ने चौरासी लाख योनियों के शरीर धारण किए हैं, ये सभी माया का भेष हैं — ये असत हैं, सत्य नहीं।जब आत्मा इस माया भेष से अलग होकर सतशब्द में लीन हो जाती है, तभी वह सतशब्द का भेष धारण करती है।आनन्द पद में लीन होना ही मोक्ष है। यही मोक्ष की प्राप्ति है।महाराज अंत में फरमाते हैं — जो संत इस भेष को धारण करते हैं, वे हंस तीनों तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) को तोड़कर अमर लोक में पहुँचते हैं। महाराज राजा चन्दूलाल को कहते है कि हे राजा हमारा भेष ऐसा है जिसे परमात्मा की प्राप्ति व भजन के भेदी है वही भली प्रकार से जानते है। करमी याने शुभ अशुभ करणियां करने वाले मेरे को सब नहीं जानते है। जो सतगुरु विधि से राम रटता है वह परमेश्वर का प्यारा है। ज्ञान रूपी गुदडी ओढ रखी है और मैंने गले में दया का अजब चोला पहन रखा है तथा कुबुद्धि रूपी कामणियो को मैंने छोड दिया है। श्वांसा चल रही है उस श्वांस ऊसांस के साथ तन मन से भजन करना व एक श्वांसा को भी खाली नहीं जाने देना ही रमता संग रमु जुग मांही। इस मन को शिष्य बना रखा है याने मन आत्मा की आज्ञा में रहता है, जो परमात्मा सत है वह निरंजण निराकार ब्रह्म सत चेतन है। वही गुरु है। तत तिलक याने सतशब्द नेः अँच्छर पारब्रह्म परमात्मा का निज नाम है। उसका अखण्ड अनुभव होना ही तत्त तिलक शिर दीना है। केवल पद का अनुभव करके अणभै ग्यान की सिरजणहार से हार से परवानगी लेकर आना ही बेद व गीता सबका पाठ है व अणभै का पट खोलना है। मुंह से सतशब्द का ज्ञान देना ही द्वादश मंत्र (ओम नमो भगवते वासु देवाय) व गायत्री मंत्र है। मत ज्ञान, श्रुत ज्ञान, मन परचे ज्ञान, अवध ज्ञान, मान, केवल ज्ञान, इन पांचो के भेद को जानना ही मुद्रा कंठी पावडी अलफी पहनना है। श्वांस उसांस में रकार मकार का भजन करना व अजप्पा जागृत होकर अखण्ड अनुभव होना ही निर्गुण माला फेरना है। पृथ्वी के समान धीरज धारण कर रखा है सहनशीलता की लंगोटी लगा रखी है, सतशब्द के ज्ञान के सिवाय मेरी बुद्धि दूसरी तरफ जाती है, यही आड बंद मत मेरी है। मेरा शरीर बीणा है, नाडिया तार है। बिना किये ही कई नहीं तरह की अनहद की रागे हो रही है। ब्रह्मण्ड व पार ब्रह्म से ऊपर केवल पद में सतशब्द का अनुभव होना ही गिगन मंडल में ही मंडी हमारी है। त्रिकुटी में शब्द आने पर कई प्रकार की ध्वनियो का होना ही त्रिकुटी सेवा पूजा है। सतशब्द का निरंजण निराकार चेतन में अनुभव हो रहा है। यही सत होना का शब्द जोत के आगे है। इसके अलावा मेरे कोई देवता नहीं है। त्रिकुटी में शब्द का अनुभव अला पिंगला का आरती करना है। बिना किये ही जो आवाजे आ रही है वो ही अनहद झालर ही बजना है। चित व मन लगाकर सूरत के द्वारा शब्द का अनुभव करना ही चित मन सूरत हजूरी चाकर है। गिगन में सतशब्द की धुनि का अनुभव होना ही गिगन शब्द धुन गाजे है। आत्मा ने चौरासी लाख योनियो के शरीर धारण कर रखे है। यह सब माया का भेष है। यह असत है यह सत्य नहीं है। आत्मा जो इस शरीर भेष से अलग होकर सतशब्द में लय हो जाती है। यह सतशब्द का भेष धारण करना है। आनन्द पद में लय होना ही मोक्ष की प्राप्ति करना है। महाराज फरमाते हैं कि यह भेष जो संत धारण करेंगे वे हंस तीनो तापो (आदि दैविक, आदि भौतिक व आध्यात्मिक) को तोडकर अमर लोक में पहुंचेंगे।

Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)

 म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ।  म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥  आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा।  म्हारे आंगणिये ओ साधां र...