Thursday, November 20, 2025
Keval mat to nyārī केवल मत तो न्यारी_ हरजस पद राग आसा (३०)
केवल मत तो न्यारी। बेद भेद का मत सब उला, पारब्रह्म लग सारी ॥ टेर ॥
संतो सुरगुण भक्त करे नर कोई, जांरे विश्वास कुवावे । काया मांय कछु नहीं व्यापे, बाहिर परचो पावे ॥ १ ॥
जिऊं मां बाप पूत को कारज, ब्याव बिरद कर रदेवे। यूं सुरगुण में बाहिर परचा, आनन्द पद नहीं लेवे ॥ २॥
जिऊं संसार मांय सुण पदवी, खांण पीण की होई। भोग बिना प्राक्रम नर में, यूं निरगुण गुण जोई ॥ ३ ॥
रिध प्रताप मांय की भक्ति, सिद्ध गुण पिता कहावे। सतस्वरूप आनन्द पद घट में, सतगुरु शरणे पावे ॥ ४ ॥
माता के सुण रह घर मांही, सब सुख आनन्द होई। निरभै ज्ञान भेद नहीं पावे, बिन संता कहूं तोई ॥ ५ ॥
ज्यूं कुल मांय द्रव बहो तेरो, ईऊं निरगुण लग करणी। कुल कूं छाड संत जब हुवा, वह विध दूरी धरणी ॥ ६ ॥
ज्युं कुल छोड हुवो बैरागी, अब जगत फंद रयो न कोई। एक ही ध्यान साहिब सुं मिलणा, हार जीत नहीं होई ॥ ७ ॥
यूं सुरगुण निरगुण भक्ति मांही, परचा जन के होवे। सतगुरु रूप आनन्द पद गहिया, परचा दिशा न जोवे ॥ ८ ॥
कह सुखराम समझ बिन ज्ञानी, माया फंद सरावे। आनन्द पद भेद नियारो, बिन सतगुरु नहीं पावे ॥ ९ ॥
Harjas Pad Rāg Āsā (30)
Keval mat to nyārī. Bed bhed kā mat sab ulā, Pārabrahm lag sārī. ṭer ॥
Santo surguṇ bhakt kare nar koī, jā̃re viśvās kuvāve. Kāyā mā̃ kuch nahī̃ vyāpe, bāhir parcho pāve. ॥ 1 ॥
Jī̃ū mā̃ bāp pūt ko kāraj, byāv birad kar radeve. Yū̃ surguṇ mẽ bāhir parchā, ānand pad nahī̃ leve. ॥ 2 ॥
Jī̃ū sansār mā̃ suṇ padvī, khā̃ṇ pīṇ kī hoī. Bhog binā prakram nar mẽ, yū̃ nirguṇ guṇ joī. ॥ 3 ॥
Ridh pratāp mā̃ kī bhakti, siddh guṇ pitā kahāve. Satswarūp ānand pad ghaṭ mẽ, Satguru śarne pāve. ॥ 4 ॥
Mātā ke suṇ rah ghar mā̃hī, sab sukh ānand hoī. Nirabhai gyān bhed nahī̃ pāve, bin santā kahū̃ toī. ॥ 5 ॥
Jyũ kul mā̃ drav baho tero, īū̃ nirguṇ lag karṇī. Kul kõ chhāḍ sant jab huvā, vah vidh dūrī dharaṇī. ॥ 6 ॥
Jyũ kul chhōḍ huvo bairāgī, ab jagat fand rayo na koī. Ek hī dhyān sāhib sũ milṇā, hār jīt nahī̃ hoī. ॥ 7 ॥
Yū̃ surguṇ nirguṇ bhakti mā̃hī, parchā jan ke hove. Satguru rūp ānand pad gahiyā, parchā disha na jove. ॥ 8 ॥
Kah Sukhārām samajh bin gyānī, māyā fand sarāve. Ānand pad bhed nyāro, bin Satguru nahī̃ pāve. ॥ 9 ॥
संतों से महाराज फ़रमाते हैं कि केवल का ज्ञान सबसे अलग है। वेदों का व योग ज्ञान उली तरफ का है, यानी पारब्रह्म तक का है। विश्वास के साथ सगुण भक्ति करते हैं। उनके शरीर में शब्द के चैन नहीं होते हैं। बाहर परचे होते रहते हैं। जिस प्रकार माता-पिता लड़के का शादी-ब्याह कर देते हैं, उसी प्रकार सगुण भक्ति में बाहर परचे होते रहते हैं। आनंद पद की प्राप्ति नहीं होती। जिस प्रकार संसार में खाने-पीने की पदवी है, लेकिन आप तो खाने-पीने का सुख भोगते नहीं हैं, लेकिन दूसरों को सिद्धियों के द्वारा देते हैं। यही निर्गुण का गुण है। रिद्धियाँ माया की भक्ति में हैं। सिद्धियाँ ब्रह्म की भक्ति में हैं। सतगुरु से भेद लेकर भक्ति करने पर सतस्वरूप आनंद पद की प्राप्ति होती है, लेकिन निरभै ज्ञान संतों के, यानी सतशब्द के भेद के बिना नहीं मिलता है। जिस प्रकार घर में बहुत धन हो, लेकिन संत बनना हो तो उन सब को छोड़ना पड़ता है। ऐसे ही निर्गुण की करनी में रिद्धियाँ-सिद्धियाँ रूपी धन है, लेकिन जब सतगुरु पद की भक्ति करनी हो तो निर्गुण की करनी व ऋद्धि-सिद्धि व वहाँ तक के साधन को भी त्यागना पड़ता है। कुल को छोड़कर बैरागी होने पर कुटुम्ब की तरफ से कोई काम नहीं करना पड़ता है। उसको तो एक ही ध्यान रहता है कि कब परमात्मा पद की प्राप्ति करूँ। कुटुम्ब की तरफ का कोई सुख-दुख नहीं रहता है। यही हार-जीत नहीं होई है। सगुण-निर्गुण की भक्ति करने वालों के परचे होते हैं। इसी तरह सतस्वरूप आनंद पद की भक्ति करने वाले परचे नहीं चाहते। महाराज फ़रमाते हैं कि बिना समझ के ज्ञानी माया की करणियों व माया के परचे की ही सराहना करते हैं, लेकिन सतस्वरूप आनंद पद का भेद अलग है। सतगुरु, यानी संतों के अणभै ज्ञान की विधि साँस-उसाँस में राम रटने के बिना प्राप्त नहीं होता।
Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)
म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ। म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥ आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। म्हारे आंगणिये ओ साधां र...
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हेली ए आज पूनम वाली रात, चालोनी सतसंग में ।।टेर।। हेली ए सतगुरु मिलिया दयाल, भिगोय दिनी रंग में। हेली ए चालोनी गुरांसा री हाट, ज्ञ...
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