Thursday, November 20, 2025
Santō aisā bhēv sambhāvo संतो ऐसा भेव संभावो_ हरजस पद राग मिश्रीत (४)
संतो ऐसा भेव संभावो, ज्यां सूं आवागमण न आवो ।। टेर ।।
तुम मेरा स्वामी मैं तेरा चेला, जे ओ अरथ बतावो। ने करमी सूं किस बिद मिलिये, रेत कोण घर लावो ।। १ ।।
ररो ममो दोय मात पिता है, रिद्ध सिद्ध बोह घर होई। नवला ब्याव करो नित साधो, गरभ टले नहीं कोई ।। २ ।।
ओऊं सोऊं दादो दादी, पारब्रह्म पड दादो। तीन लोक रचा उनकी ईच्छा, उलट उसी ने खादो ।। ३ ।।
रेत राज की किया चाकरी, करम न दुरा जावे। इनकी टेल करम ही करना, करमा की पदवी पावे।|4||
कुल बैराग दोय है रस्ता, परापरी सूं आवे। कुल में त्याग पलक नहीं रेवे, गरह त्याग नहीं चावे ।। ५ ।।
नां वे उरे परे भी नांही, ना कोई बीच कहावे। त्यागी पुरूष बिराजे न्यारा, कोटा मधे पावे ।। ६ ।।
कुल में तो निरभै मत नांही, भावे सा जन होई। कह सुखराम त्याग जब निसरियो, करम रयो नहीं कोई ।। ७ ।।
Harjas Pad Rāg Mishrīt (4)
Santō aisā bhēv sambhāvo, jyā̃ sū̃ āvāgaman na āvo. ṭer ॥
Tum merā swāmī main terā chelā, je o arth batāvo. Ne karmī sū̃ kis bid miliye, ret kon ghar lāvo. ॥ 1 ॥
Raro mamō doy māt pitā hai, riddh siddh boh ghar hoī. Navlā byāv karo nit sādhō, garbh ṭale nahī̃ koī.॥2 ॥
Oū̃ sōū̃ dādō dādī, pārabrahm paḍ dādō. Tīn lok rachā unki īchchhā, ulṭ usī ne khādo. ॥ 3 ॥
Ret rāj kī kiyā chākrī, karm na durā jāve. Inkī ṭel karm hī karnā, karmā kī padvī pāve. ॥ 4 ॥
Kul bairāg doy hai rastā, parāparī sū̃ āve. Kul mẽ tyāg palak nahī̃ revē, garh tyāg nahī̃ chāve. ॥ 5 ॥
Nā̃ ve ure parē bhī nā̃hī̃, nā koī bīch kahāve. Tyāgī purūṣ birāje nyārā, koṭā madhē pāve. ॥ 6 ॥
Kul mẽ to nirabhai mat nā̃hī̃, bhāve sā jan hoī. Kah Sukharām tyāg jab nisarīo, karm rayo nahī̃ koī. ॥ 7 ॥
संतों से महाराज फरमाते हैं कि ऐसा ज्ञान बताओ जिससे आत्मा को बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में न आना पड़े। यदि तुम उस अर्थ (परमात्मा प्राप्ति का रहस्य) को बता सको, तो मैं तुम्हारा शिष्य हूँ और तुम मेरे गुरु हो।जिस पद (स्थिति) में शुभ-अशुभ क्रियात्मक कर्म नहीं होते, वहाँ जाने का साधन कौन-सा है — यह बताओ, जिससे जीव उस परमपद में जाकर एकाकार हो जाए।"ररा", "ममा" अर्थात माया और ब्रह्म — ये आत्मा के माता-पिता समान हैं। इनकी भक्ति से रिद्धियाँ-सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और सांसारिक सुखों की भी प्राप्ति होती है। यही सांसारिक सुखों में लिप्त होकर नवला ब्याह करना कहलाता है, पर इससे जन्म-मरण का चक्र नहीं मिटता।"ओऊं", "सोऊं" (ओंकार, सोऽहं आदि) का जाप—अजपा जाप—दादा-दादी की भक्ति के समान है, जबकि पारब्रह्म की भक्ति परदादा (पूर्वजन) की तरह दुर्लभ है।पारब्रह्म की इच्छा से ही यह तीनों लोकों की सृष्टि होती है और महाप्रलय के समय यही सृष्टि उसी पारब्रह्म में लीन हो जाती है। यही रचना और लय उसी की इच्छा से होती है — "रचना उसी की और अंत में उसे ही निगल जाना है।"जैसे प्रजा को राजा के आदेशों का पालन करना पड़ता है, वैसे ही माया-ब्रह्म की भक्ति भी शुभ-अशुभ कर्मों से जुड़ी होती है, जिससे कर्मों का फल बार-बार मिलता रहता है।
अनादि काल से दो मार्ग हैं —एक है "कुल" (सामान्य सामाजिक जीवन) का,दूसरा है "बैराग" (त्याग) का।कुल में, अर्थात सांसारिकता में रहते हुए त्याग नहीं हो सकता। "केः पद" और "आः पद" को ही त्यागी पुरुष प्राप्त करता है। उसे करोड़ों में कोई बिरला ही प्राप्त कर पाता है।वह पद माया-ब्रह्म और पारब्रह्म के पद से भी अलग है। वहाँ "ऊरे", "परे" या "बीच" कुछ भी नहीं होता — अर्थात कोई द्वैत या भेद नहीं रहता।जब तक माया-ब्रह्म के साधनों में फंसे रहते हैं — चाहे गृहस्थ हों या संन्यासी — तब तक निरभय पद की प्राप्ति नहीं हो सकती।
महाराज कहते हैं कि जब जीव माया-ब्रह्म के पद से अलग होकर, "केः पद" और "आः पद" की प्राप्ति की ओर बढ़ता है — तब वह वास्तव में त्याग करके निकलता है। उस परमपद में कोई शुभ-अशुभ करणी या कर्म नहीं रहता। वहां कर्मों का विधान समाप्त हो जाता है।
संतो से महाराज फरमाते हैं कि ऐसा ज्ञान बतावो जिससे आवागमण में नहीं आना पडे। अगर आप यह अरथ याने परमात्मा मिलने का भेद बताते हो तो मैं आपका शिष्य हूं और आप मेरे गुरु है। जिस में शुभ अशुभ करणिये करम नहीं है उस पद में जाने का कौनसा साधन है, जिससे उस पद पद में जाकर मिल जावे। ररा ममा माता पिता याने माया ब्रह्म की भक्ति है। उनसे रिद्धियो और सिद्धियो की प्राप्ति होती है। माया ब्रह्म की प्राप्ति करने से सुखो की प्राप्ति होती है। यही नवला ब्याह करना है, लेकिन इससे जन्मना मरना नहीं मिटता। ओऊं सोऊं का जपा अजपा दादा दादी के जैसे है तथा पारब्रह्म की भक्ति पड दादा की जैसे है। पारब्रह्म की ईच्छा से ही तीन लोक की रचना होती है और महाप्रलय में यह सृष्टि पारब्रह्म में लय हो जाती है। यही इनकी इच्छा से रचना और उलट उसी को खाना है। प्रजा को राजा का काम करने से करणिये करनी पडती है। ऐसे ही माया ब्रह्म की भक्ति शुभ अशुभ करणियो से होती है। करमो के फल मिलते रहते है। अनादि से एक कुल का दूसरा बैराग याने त्याग ये दो रास्ते है। कुल में व गृहस्थ में त्याग नहीं रहता है। केः पद आः पद को त्यागी पुरूष कहा है। उसको कोई करोडो में बिरले ही प्राप्त करते है। वो पद माया ब्रह्म पारब्रह्म के पद से अलग है, यही उरे परे बीच नहीं होना है। कुल याने माया ब्रह्म का साधन करते है तब तक निरभय पद की प्राप्ति नहीं होती है, चाहे गृहस्थ हो या घर छोडने वाले हो, कोई भी जन हो। महाराज फरमाते हैं कि जब माया ब्रह्म के पद से अलग होकर केः पद आः पद की प्राप्ति करना ही त्याग कर निकलना है तब कोई भी करम नहीं रहता। क्योंकि उस पद में न शुभ अशुभ करणी है न करम है।
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