Thursday, November 20, 2025
Santō main aisā satguru chāhū̃. संतो मैं ऐसा सतगुरु चाहूं_हरजस पद राग मिश्रीत (३)
संतो मैं ऐसा सतगुरु चाहूं। आवागमण मिटे दुख भारी, माहा परम सुख पाऊं ।। टेर ।।
पाप करूं तो दोजख देवे, धरम किया भुगतावे। तपस्या किया राज गल फंद में, जन्म जन्म दुख पावे ।। १ ।।
साजन किया सिधाई जागे, करामात फल पावे। बूरो रे भलो काहू को बंछे, यूं कर नरका जावे ।। २ ।।
किरिया तो किया करम सिर बंधे, गरह आव दम तुटे। त्यागन किया रह शिर बदलो, जन्म दूसरे लूटे ।। ३ ।।
भणिया सोच भरम बो उठे, तीरथ सूं तन छीजे। सेवा किया सांच नहीं आवे, यूं तो राम न रीजे ।। ४ ।।
भरम करम दोनां सूं न्यारा, ज्यां सूं रहो लिव लाई। कह सुखराम राम बिन जग में, सब ही करम ऊपाई ।। ५ ।।
Harjas Pad Rāg Mishrīt (3)
Santō main aisā satguru chāhū̃. Āvāgaman miṭe dukh bhārī, māhā param sukh pāū̃. ṭer ॥
Pāp karū̃ to dozhak deve, dharm kiyā bhugatāve.Tapsyā kiyā rāj gal phand mẽ, janm janm dukh pāve.॥1 ॥
Sājān kiyā sidhāī jāge, karāmāt phal pāve. Būrō re bhalo kāhū ko banche, yū̃ kar narkā jāve. ॥ 2 ॥
Kiryā to kiyā karam sir bandhe, garah āv dam tuṭe. Tyāgan kiyā rah sir badlo, janm dūsrē lūṭe. ॥ 3 ॥
Bhaṇiyā soch bharam bo uṭhe, tīrth sū̃ tan chīje. Sevā kiyā sā̃ch nahī̃ āve, yū̃ to Rām na rīje. ॥ 4 ॥
Bharam karam donā̃ sū̃ nyārā, jyā̃ sū̃ rahō liv lāī. Kah Sukharām Rām bin jag mẽ, sab hī karam ūpāī. ॥ 5 ॥
संतों से महाराज फरमाते हैं कि मुझे ऐसा सतगुरु चाहिए, जिसके अनुभवयुक्त (अणभै) ज्ञान से आवागमन (जन्म-मरण) का भारी दुःख मिट जाए और महापरमसुख की प्राप्ति हो — वह सुख जो एक बार मिल जाए तो फिर कभी समाप्त नहीं होता।पाप करने से नरकों का दुःख भोगना पड़ता है। तपस्या करने से राज्य या ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सकती है, परन्तु इससे जन्म-जन्मांतर तक दुखों का चक्र चलता रहता है।
कोई भी साधना करने से सिद्धियों की जागृति हो जाती है, लोग करामातें (चमत्कार) दिखाने लगते हैं — किसी को भला होता है, किसी को बुरा। लेकिन जब किसी को नुकसान होता है, तो नरकों में जाना पड़ता है।कोई भी क्रिया करने से शुभ और अशुभ कर्म बनते हैं। ग्रह-आव यानी श्वास और आयु, इन्हीं कर्मों के बंधन में जुड़ी रहती है।यदि कोई घर को छोड़ता है, तो इस जन्म में किया गया कर्म अगले जन्म में चुकाना पड़ता है।कई शास्त्रों का अध्ययन करने से भी अनेक भ्रम पैदा हो जाते हैं। तीर्थयात्रा करने से शरीर कमजोर हो जाता है। सेवा करने मात्र से सतशब्द की जागृति नहीं होती। इस तरह के साधनों से परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती।जो 'केवल पद' है — वह भ्रम और कर्म से अलग है। उसमें 'लिव' (ध्यान) बंधती है, और वह लिव है — साँस-उसाँस में 'राम भजन' करना।महाराज फरमाते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए यदि सही साधन नहीं अपनाया गया, तो बाकी सब कुछ केवल कर्मों के उपाय बनकर रह जाते हैं।
संतो से महाराज फरमाते हैं कि मुझे ऐसे सतगुरु चाहिये जिनके अणभै ज्ञान से आवागमन का जो भारी दुख है वो मिटकर महा परम सुख की प्राप्ति हो जाय, जो सुख मिलकर कभी खत्म नहीं होता। पाप करने से नरको का दुख भोगना पडता है। तपस्या करने से राज मिल जाता है। जिससे जन्म जन्म तक दुख पाना पडता है। कोई भी साधन करने से सिद्धियो की जागृति हो जाती है। करामात बताने लग जाते है। किसी का बुरा हो जाता है, किसी का भला हो जाता है। इस तरह बुरा होने पर नरको में जाना पडता है। कोई भी क्रिया करने से शुभ अशुभ करम बंधते है। गरह आव याने स्वांसा व आयु करम बन्धन में ही लगती है। घर को छोडने से इस जन्म का बदला अगले याने दूसरे जन्म में चुकाना पडता है। कई शास्त्रों के अध्ययन करने से अनेक भरम उठते है। तीरथ करने से शरीर कमजोर होता है। सेवा करने से सतशब्द की जागृति नहीं होती। इस तरह करने से परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। जो के पद भरम करम से अलग है उसका लिव बंध सांस ऊसांस में राम भजन होना ही लिव लगाना है। महाराज फरमाते हैं कि परमात्मा प्राप्ति के साधन के बिना सब ही करमो के ऊपाय है।
Mhaare paavna paramguru aaj म्हारे पावणा परमगुरु आज_ हरजस पद राग बधावा (१)
म्हारे पावणा परमगुरु आज, संया आवो ओ। म्हारे आया ओ हरि का जन आज, संया आवो ओ ॥ टेर ॥ आवो ओ गावो संया, आणंद बधावा। म्हारे आंगणिये ओ साधां र...
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हेली ए आज पूनम वाली रात, चालोनी सतसंग में ।।टेर।। हेली ए सतगुरु मिलिया दयाल, भिगोय दिनी रंग में। हेली ए चालोनी गुरांसा री हाट, ज्ञ...
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नमो नमों गुरूदेव, परम निज भेव बताया। निर्गुण ज्ञान विचार, हंस परम हंस कुवाया ॥ नमों नमों गुरूदेव, समुद्र में डुबत तारया । नमों न...